Saturday, 14 October 2017

वैश्या- कहानी


रात के तकरीबन बारह बज रहे होंगे ,जंहा  दिन भर ट्रैफिक के कारण इंच इंच जगह घिरी होती थी  वंही इस समय सड़के लगभग सून-सान सी थी , इक्का- दुक्का ट्रैफिक ही रहा होगा  वे भी जल्दी अपने गंतव्य पहुँच जाना चाहते थे । दिल्ली  बसअड्डे से थोड़ी  दूर यह ट्रैफिक लाइट जंहा दिन में भी कम लोग रुकते थे रात में गुलज़ार थी। जरा सी दूरी में लगभग आधा दर्जन किन्नर और  वेश्याएं खड़ी थीं जो अपने अपने ग्राहकों से मोल भाव करने में मशगूल थीं।

  क्या चार्ज है ? " सुनील ने  पूछा।
 " सिंगल शॉट का पांच सौ और फुल नाइट सर्विस का पंद्रह सौ, अगर दो लोग है तो ढाई हजार ...  दो लोगो से ज्यादा नहीं  ... " रूबी ने हाथ घुमातें हुए एक साँस में समझाने वाले लहजे में कहा ।
" नहीं मैं सिंगल ही हूँ .....पूरी रात का  कुछ कम होगा क्या ?" सुनील ने मुस्कुराते हुए कहा।
" नही .... रेट में कोई हेर फेर नहीं .... और हाँ !पैसा एडवांस  देना होगा " रूबी ने सर हिला के मना करते  हुए  रूखेपन से कहा ।

" अच्छा..अच्छा!! चलो बैठो " सुनील ने रूबी को मोटरसाइकिल पर बैठने का इशारा किया ।

रूबी मोटरसाइकिल पर उचक के सुनील के पीछे जा बैठी।

सुनील मोटरसाइकिल स्टार्ट कर तेजी से दौड़ाने लगा, पीछे बैठी रूबी ने दुपट्टे से अपना चेहरा ढँक लिया।शायद वह चाहती थी की कोई उसे पहचाने न।

" क्या नाम है तुम्हरा? " थोड़ी देर मोटरसाइकिल चलाते रहने के बाद  सुनील ने पीछे मुड़ते हुए रूबी से पूछा।
" रूबी...." रूबी ने ठन्डे लहजे में उत्तर दिया।
" रहती कँहा हो?" सुनील ने फिर प्रश्न किया ।
" क्या करेगा जान के ? नाम - गाँव जान के क्या करेगा? तू जिस काम के लिए ले जा रहा है वह काम होना चाहिए बस ... बाकी क्या करना है तुझे? " रूबी ने कुछ तीखे अंदाज में कहा तो सुनील झेंप के चुप हो गया ।

"और कितनी दूर है तेरा घर? " रूबी ने कुछ देर बाद  पूछा शायद वह बोर होने लगी थी या ज्यादा  दूर जाने से डर लग रहा था।
" बस .... अगले कट से दो गली बाद "सुनिल मुस्कुराते हुए कहा ।

दो- तीन मिनट बाद  एक गली के सामने गली में पहुँचने के बाद सुनील ने मोटरसाइकिल रोक ली और  रूबी को  मोटरसाइकिल से उतारते हुए  कहा की वह पहले वह घर का ताला खोलेगा  और उसके पांच मिनट बाद रूबी आये ताकि अगर पडोसी उसकी मोटरसाइकिल की आवाज़ से जग भी जाएँ तो उसे अकेला ही देखें।

रूबी ने ऐसा ही किया , सुनील ने पहले जा के अपने घर का ताला खोला और बाइक पार्क कर आधा गेट खोले रखा। कुछ क्षण बाद रूबी चुप चाप घर के अंदर आ गई तो सुनील ने तेजी से दरवाज़ा बंद कर दिया ।

कमरे के अंदर पहुँच सुनील ने रूबी को सोफे पर बैठने का इशारा किया और खुद फ्रिज से बोतल निकाल कर एक गिलास में पानी उड़ेल पीने लगा ।
पानी पी लेने के बाद उसने एक गिलास और भरा और रूबी की तरफ बढ़ा दिया ।

रूबी ने कुछ संकुचाते हुए पानी का गिलास थामा और एक सांस में खाली कर दिया । पानी पीने के बाद गिलास मेज पर रखते हुए उसने सुनील की तरफ देखा और कहा- तो! शुरू करें?

सुनील रूबी की बात सुन उसके पास आ के बैठ गया और उसका दुपट्टा हटा के उसके स्तनों को निहारते हुए बोला-रिलैक्स! अभी सारी रात बाकी है... कुछ इंजॉय करते हैं पहले"

फिर वह उठा और कपड़े बदलने लगा,कपडे बदल के वह फिर फ्रिज के पास जा पहुंचा और फ्रिज में रखी सिग्नेचर की बोतल निकाल के वापस फ्रिज को बंद कर दिया । दो गिलास  पानी की बोतल और नमकीन - काजू से भरी कटोरी ले के रूबी के पास जा बैठा।

दो पैग बना के एक रूबी की तरफ बढ़ाते हुए बोला- लो ....कुछ मूड बनाओ यार... मजा दुगना आएगा"

"मैं शराब नहीं पीती .... " रूबी ने हाथ से गिलास हटाते हुए कहा।
"एक पैग तो ले लो...तुम तो शरमा रही हो.. इस काम में तो यह चलता है... मूड बन जायेगा " सुनील ने थोड़ा जिद करते हुए कहा।

सुनील के बार बार जिद और आग्रह करने पर आख़िर रूबी मान ही गई , उसने गिलास उठाया और होठो से लगा एक सिप ले लिया ।

"तुम इस धंधे में कब आईं?" सुनील ने नमकीन की प्लेट रूबी की तरफ सरकाते हुए पूछा।

सुनील का प्रश्न सुन रूबी का खिला हुआ चेहरा एक दम से मुरझा सा गया , कई दबे हुए दर्द एकाएक उभर आये ।जैसे ऊपर से ठंडी पड़ चुकी  राख को कोई कुरेद के दबी आग को फिर से हवा दे दे।

"देखो तुम बताना नहीं चाहती हो तो कोई बात नहीं .... मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा था ...तुम धंधे वाली लगती नहीं हो न " सुनील ने रूबी को ख़मोश देख कहा।
"क्या बताऊँ!कुछ बताने लायक है ही कँहा... कौन अपनी खुशी से बनना चाहता है वैश्या!.... यह सब इश्क़ का नतीजा है"रूबी ने एक साँस में पूरा गिलास खाली कर दुःख भरे किन्तु व्यंग वाले अंदाज में  कहा ।
" इस शराब से भी कड़वी जिंदगी की कहानी है मेरी"रूबी ने छत की तरफ देखा और आँखे बंद करते हुए बोली।

उसके बाद रूबी ने अपनी कहानी बतानी शुरू की , कैसे वह एक लड़के के प्यार के चक्कर में फंस के बंगाल से  दिल्ली आ गई थी। दिल्ली में उन्होंने शादी भी कर ली , एक बच्ची भी पैदा हो गई । एक दिन लड़के ने अचानक बताया  कि  लड़के के पिता जो इस शादी के खिलाफ थे उन्होंने लड़के की शादी कंही और तय कर दी थी, अगर वह उनकी बात नहीं मानेगा तो उसे जायजाद से बेदखल कर देंगे , जायजाद काफी थी जिसे लड़का छोड़ने की हिम्मत नही कर पाया । फिर एक दिन तलाक़- तलाक़ बोल के हमेशा के लिए छोड़ के चला गया। लड़के को कँहा खोजती? वह कभी अपने घर लेके ही नहीं गया बस इतना सुना था उसके मुंह से की वह राजस्थान का रहने वाला था ,उस पर विश्वास कर घर छोड़ के भाग आई थी।वापस अपने घर जा नहीं सकती थी, मैं अपने घर वालो के लिए मर चुकी थी।

सुनील ख़ामोशी से रूबी की बात सुन रहा था ।

" मैंने पहले तो आत्महत्या करने की सोची पर फिर सोचा की बच्ची का क्या कसूर! कई जगह नौकरी भी करने की कोशिश की पर अकेली जान के हर कोई मेरे जिस्म को ही पाना चाहता था  ... इसलिए सोचा की जब वही करना है तो खुल के क्यों न किया जाए .... अपनी मर्जी से ग्रहाक और अपनी मर्जी से पैसा" यह कहते हुए रूबी के गालों से दो आंसू लुढ़क गएँ।
"और बच्ची को कँहा छोड़ के आती हो?" सुनील ने पूछा।
" आया के पास ...."रूबी ने आँखे बंद किये ही उत्तर दिया..

सुनील का मूड कुछ ऑफ सा हो गया था रूबी की कहानी सुन के पर कुछ शराब का शुरुर और कुछ रूबी को दिए पैसे का ख्याल कर उसने रूबी को आलिंगन किया और उसे वस्त्रहीन कर दिया।

तभी जोर से डोरबैल बजने की आवाज़ सुनाई दी।
"कौन होगा? " रूबी ने सुनील से घबराते हुये पूछा ।
सुनील को खुद नही समझ आया की इतनी रात को कौन आ सकता है । उसने तौलिया लपेटी और अजमंजस में दरवाजें को खोला । दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गएँ, काटो तो खून नहीं। सामने उसकी पत्नी चंद्रिका खड़ी थी , साथ में उसका भाई और माँ भी ।
"अच्छा! मैं दो दिन के लिए मायके क्या गई तुम घर में रंडी लाके गुलछर्रे उड़ाने लगे.... घर को कोठा बना दिया" चन्द्रिका ने आग उगलते हुये शब्दो में कहा और सुनील को धक्का देते हुए अंदर दाखिल हो गई। उसके पीछे उसकी मां और भाई भी। किसी पडोसी ने सुनील ने देख लिया था रूबी को घर लाते हुए और उसने चंद्रिका को फोन कर दिया  था ।


" वो...वो... तुम गलत समझ रही हो" सुनील ने घबराए और लड़खड़ाई हुई आवाज़ में कहा ।
" मैं क्या समझ रही हूँ यह अभी बताती हूँ " चंद्रिका चीखती हुई उस कमरे में प्रवेश कर गई जंहा रूबी थी।रूबी ने जब शुरगुल सुना तो वह कपडे पहने लगी किन्तु अर्धनशे होने के कारण उसका दिमाग और हाथ-पाँव सही के काम नहीं कर रहे थे , शरीर का ऊपरी भाग अब भी खुला था ।

चंद्रिका ने रूबी को जब इस हालत में देखा तो वह क्रोध में लगभग विक्षिप्त हो गई।
"कुतिया... रंडी...#$%…..&%$.... मेरे घर को कोठा बना दिया ....तेरी आग आज शांत करुँगी ...." और बहुत सी गालियों बकती हुई चंद्रिका ने रूबी के बाल पकड़ अपने हाथ में लपेट लिए। रूबी दर्द से चीख उठी और दोनों हाथों से चंद्रिका की पकड़ को छुटाने की कोशिश करने लगी । किन्तु चंद्रिका की पकड़ इतनी मजबूत थी की रूबी सिवाय चीखने के कुछ न कर पा रही थी। सुनील रूबी को छुटाने की कोशिश करने लगा पर चंद्रिका ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया की वह लड़खड़ा के दरवाजे से टकरा गया, नशे में होने के कारण वैसे ही वह सही से खड़ा नही हो पा रहा था।

चंद्रिका रूबी को गालियां बकती हुई किसी विक्षिप्त की तरह उस पर लात घूसे बरसा रही थी। रूबी दर्द के मारे सिर्फ चीख रही थी कुछ बोल न पा रही थी।

चंद्रिका ने रूबी का सर कांच की मेज पर इतनी जोर से मारा की 12 mm का मोटा कांच चकना-चूर हो उठा । कांच के  कई टुकड़े  रूबी के गले और चेहरे पर अंदर तक धंस गए थे जिनमें से खून की तेज धार बहने लगी थी । किन्तु चन्द्रिका का इस पर कुछ असर नहीं हो रहा था , वह तो रूबी को पीटे जा रही थी। कुछ देर बाद रूबी का शरीर शांत हो गया, चंद्रिका को जैसे होश आया और उसने रूबी को छोड़ दिया । चन्द्रिका ने देखा की पूरे घर में खून ही खून बिखरा हुआ था , उसके खुद के कपडे और हाथ रूबी के खून से सने हुए थे । रूबी मर चुकी थी।

बस यहीं तक थी कहानी.....


Monday, 9 October 2017

ईश्वर और आत्मविश्वास

 बहुत समय पहले एक कहानी पढ़ी थी, उस कहानी का मुख्य मात्र एक बहुत नामी वकील होता है जो कभी कोई केस नहीं हारता था। उसकी एक आदत की जब वह अदालत में किसीं केस पर जिरह करता तो अपने कोट के ऊपर वाले बटन को बाएं हाथ की उंगलियों से घुमाता रहता था ।

एक दिन एक महत्वपूर्ण केस पर जिरह करते समय वकील का हाथ आदतानुसार कोट के बटन पर जाता है ,किन्तु कोट पर बटन नहीं मिलता । वकील बेचैन हो उठता है वह बार बार अपना हाथ कोट के उस स्थान पर लेके जाता है किंतु वँहा बटन न मिलने से बहुत परेशान हो उठता है। बटन न घुमा पाने के कारण वह इतना नर्वस हो जाता है उसे लगता है कि वह केस हार जायेगा , उसके मन में यह बात बैठ गई थी बटन घुमाने से वह केस जीतता है।


घबराहट में जिरह न कर पाने के  वह केस लगभग हारने वाले ही होता है कि तभी अदालत का समय पूरा हो जाता है , जज अगले दिन की डेट दे देता है। घर आके वह सारी बात अपनी पत्नी को बताता है तो उसकी पत्नी कहती है कि कल कोट धोते समय बटन टूट गया था बाद में वह बटन टाँकना भूल गई थी । वकील की पत्नी कोट का बटन पुनः टांक देती है , अगले दिन वकील अदालत में जाता है और आदतन अनुसार कोट का बटन घुमाता रहता है जिससे उसका आंतरिक विश्वास मजबूत रहता है और हारा हुआ केस जीत जाता है।

कोट का बटन घुमाना उस वकील की आदत थी यह एक तरह से उसके आत्मविश्वास( चेतन मन) को  सबलता देता था जिससे वह खुद को केस पर केंद्रित कर पाता था , केस की बारीकियों पर अच्छी पकड़ कर पाता था। कोट का बटन न घुमा पाने के कारण वह खुद को नर्वस पाता है और केस हारने लगता है,उसका आत्मविश्वास कमजोर हो उठता है ।

आत्मविश्वास या आंतरिक विश्वास( मन की सबलता) का आभव मनुष्य में और भी कई प्रकार प्रकट होता है । इससे मनुष्य में विविध प्रकार की विचित्रता उतपन्न हो जाती है , ऊपर दिए वकील की कहानी की तरह बहुत से लोग विशेष तिथि,रंग, आभूषण, के प्रति अन्धविश्वसी हो जाते है और उन्हें शुभ या अशुभ समझने लगते है। इस  प्रकार से ऐसे भाव उसके अचेतन मन में बैठ जाते जिन्हें वह काल्पनिक ईश्वर से जोड़ देता है ,इसी भावों के आधार पर उसका आत्मविश्वास कमजोर या मजबूत होने लगता है।

कई लोग मेरी नास्तिकता को लेके मुझ से असहज रहते हैं, उन्हें लगता है कि जैसा वे ईश्वर को मानते और जानते रहें है वैसा मैं क्यों  नही मानता हूँ? उस भेड़ चाल में मैं क्यों नहीं शामिल हूँ जिसमे वे सब है। पर मुझे उन से शिकायत कम् ही रहती है क्यों की मैं जानता हूँ की उनका अचेतन मन ईश्वर की वैसी ही कल्पना स्वीकार कर चुका है जैसा उस वकील ने अपने कोट के बटन को घुमाने से केस जीतने का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। उनके आत्मविश्वास को बनाये रखने के लिए ईश्वर की परिकल्पना उनके लिए जरुरी है।

ईश्वर कल्पना ही सही किन्तु उन्हें इस कल्पना से सबलता मिलती है, मैं ऐसा मानता भी हूँ की कमजोर आत्मविश्वसियों के लिए यह जरुरी भी है अन्यथा वे टूट जायेंगे । जब तक उनका अचेतन मन स्वयं सबल हो ईश्वरीय रूपी कल्पना के पट्टे को उतार न फेंके तब तक उनका आस्तिक बने रहना अच्छा है।

Saturday, 30 September 2017

ताम्र(खनिज) और लंका पर आक्रमण-

  श्रीलंका का प्रचीन नाम ताम्रपर्णी था, ताम्रपर्णी का अर्थ होता है तांबे का पत्ता या थाल । निस्चय ही तांबे/कांस्य जैसे खनिज की अधिकतम मात्र की उपस्थित अथवा तांबे/ कांस्य को कच्चे माल को उत्पादन की प्रमुखता के कारण यह नाम दिया गया होगा।


जैसा की इतिहासकारो ने सिद्ध किया है कि सिंधु सभ्यता कांस्ययुगी सभ्यता था ।कांसा तांबे और अन्य धातुओं के मिश्रण से तैयार होता है ,सिंधु सभ्यता के लोगो ने तांबे को कांस्य के रूप में प्रयोग कर अधिक मजबूत औजार और घरेलू बर्तन बनाना सीख लिया अतः सिन्धु सभ्यता का व्यापारिक सम्बन्ध मिश्र , मेसोपोटामिया ,ईरान जैसे देशों से हो गया था । यह यह मुख्य बिंदु है कि  सिन्धु सभ्यता के उत्खनन में 'हथियार' नहीं मिले हैं जबकि मोहरे,मूर्तियां, आभूषण आदि पर्याप्त मात्रा में मिले हैं अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि हड़प्पाई संस्कृति हथियारों और युद्ध से अनभिज्ञ थी।

ऋग्वेद में वैदिक प्रमुख इंद्र ऐसे लोगो से संघर्ष करता है है जो अवैदिक हैं और नगरों में रहते हैं। राजा शंबर के सौ नगरों को आसानी से नष्ट कर देता है, ठीक ऐसे जैसे किसी मिट्टी के घर को । डी डी कोसंबी जी एक टिप्पणी गौर करने लायक है "ऋग्वेद में इंद्र द्वारा शत्रुओ के नगरों को नष्ट करना और आसानी से शत्रुओं को मार देना बिना किसी विशेष संघर्ष के यह ओजस्वी भाषा हड़प्पा में घटित किसीं वास्तविक संघर्ष का परिचारक है"।

ऐसा क्या हुआ की हड़प्पाई लोग अपने हमलावर  शत्रुओं  आसानी से हार जाते हैं? ऐसा इसलिये हुआ होगा की हमलावरों के मुकावले उनके हथियार बेकार और अत्यंत कमजोर साबित हुए होंगे। ठीक ऐसे समझिये की जैसे बाबर के तोप के  गोलों और बंदूकों के आगे पुरातन ज़माने के तीर - धनुष और भाले लिए भारतीय सेना हार जाती है।


 हड़प्पा संस्कृति पर आक्रमण केवल राज्य विस्तार भर न था बल्कि खनिजों पर आधिपत्य जमाना था । खनिज भंडारों पर अपना कब्जा जमाने के साथ साथ व्यापार को भी अपने कब्जे में लेना था। यूँ समझिये की जैसे आज भी सरकारे आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अपने कब्जे में कर खनिज पदार्थो के लिए आदिवासी लोगो को उनकी जमीनों से भगा देती आ रही हैं।

तो प्रबल संभवना रही  होगी की ताम्रपर्णी यनीं लंका अपने तांबे जैसे खनिज पादर्थो के निर्यात के कारण बहुत  समृद्ध हो गई थी  और इन्ही खनिज भंडारों पर अधिकार करने के लिए लंका पर चढ़ाई की गई हो ?  ऋषि लोग इन्ही खनिजों की तलाश में अपनी  कुटिया और आश्रम जंगलो में बनाते रहे होंगे और खनिजों के भंडार मिलने पर राजाओं को सूचना देते होंगे।
चुकी तांबे को गलाने पर यह सोने के पीले रंग से मिलता जुलता हो जाता है और नगर बनाने में इसका प्रयोग बहुतायत किया गया हो अतः लंका को ' स्वर्ण नगरी' कहा जाता रहा होगा। ठीक ऐसे ही जैसे जयपुर  के भवनों पर गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग करने के कारण इसको गुलाबी नगर/पिंक सिटी भी कहा जाता है ।

रावण उसी तरह अपने खनिज संपदा की रक्षा कर रहा हो जैसे आदिवासी लोग अपने जंगलो की करते हैं। वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में लंका को जींतने के बाद राम जी कहते हैं कि उन्होंने यह युद्ध सीता जी को जींतने के लिए नहीं किया है, यदि सीता जी के लिए युद्ध नहीं था तो किसके लिए युद्ध किया था? जाहिर सी बात थी लंका पर आधिपत्य के लिए , लंका पर आधिपत्य का अर्थ था वँहा के तांबे जैसे विशाल खनिजों के स्रोतों पर अधिकार करना। अतः रामायण का काल चाहे कुछ भी रहा हो किन्तु हम कह सकते हैं कि वह इसका युद्ध का मुख्य कारण खनिजों पर अधिकार के लिए रहा होगा?

Thursday, 14 September 2017

जानिए हिंदी का इतिहास- हिंदी दिवस विशेष

 हिंदी ....प्यारी हिंदी, कभी कभी सोचता हूँ की यदि हिंदी न होती तो क्या होता? इस मीठी सी ज़बान जिसमे खड़ी बोली भी है...उर्दू की नज़ाकत भी है ...पालि / प्रकृत के अपभ्रंश भी है  संस्कृत / अरबी के कठिन शब्द भी है अर्थात प्राचीन से लेके नवीन सभी भाषाओं को एक साथ पिरोने वाली  हिंदी न होती तो हम आज अपने विचारों को शब्दो का वह धरताल न दे पाते जो आज हम आसानी से दे पाते हैं।

तो चलिए, आज हिंदी दिवस के मौके पर हम अपनी प्यारी भाषा हिंदी के बारे में ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा ही सही जानने का प्रयास करते है ।

हिंदी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में बहुत सी धारणाएं प्रचलित है जिसमे से  अधिकतर भाषा वैज्ञानिकों का दावा  है कि हिंदी का उद्भव दसवीं सदी के आस पास का है । अपभ्रंश शब्द की व्युत्पति और धम्म/ जैन रचनाकारो की अपभ्रंश रचनाओं से हिंदी के इतिहास का सम्बन्ध बताया जाता है । इसलिए, प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से हिंदी भाषा का उद्भव स्वीकार किया जाता है । प्राकृत के अपभ्रंश से सातवीं -आठवी सदी में पद्य रचनाये प्रारम्भ हो गई थीं।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह निर्णय करना कठिन है कि हिंदी भाषा का निश्चित तौर पर  प्रयोग कब किस जगह हुआ परन्तु इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में इसका प्रयोग खुसरो जैसे  मुसलमानो कवियो ने किया , हिंदी शब्द का अर्थ उनके लिए भारतीय भाषा था । आज हिंदी भाषा लगभग पूरे उत्तर भारत की मुख्य भाषा बन चुकी है।

वैसे यह कहा जाता है कि उर्दू हिंदी की जननी है किन्तु यह पूर्णतः गलत है, उर्दू का जन्म भी नहीं हुआ था तब से हिंदी प्रचलन में रही है। हिंदी की तीन शैलियां है , पहली ब्रजभाषी (शौरसेनी) शैली, दूसरी राजस्थनी और तीसरी खड़ी बोली।

हरिषेण ने अपनी' धम्म परिक्खा ' प्रकृत के अपभ्रंश के तीन कवि माने है ,  चतुर्मुख,स्वंभू और पुष्पदन्त हलाकि की स्वंभू के छोड़ के अन्य का कोई ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है । स्वंभू ने अपनी प्रकृत अपभ्रंशिय रचनो को 'पद्वडिया' कहा था  , स्वंभू दसवीं सदी के राजा कर्ण सभा में कवि थे ।

दसवीं सदी में धनपाल नामक जैन कवि हुए जिन्होंनेअपनी अपभ्रंश रचनाओं को 'भविसयत्त ' कहा । उसके बाद कई जैन कवि हुए चरित काव्य प्रसिद्ध हुए जैसे सुदर्शनचिरायु ।


आठवीं - दसवीं सदी  में बौद्ध परम्परा से निकले सिद्धों और नाथों का बोलबाला रहा , यह वक्त था जब सिद्ध/ नाथ परम्परा से निकले मछेंद्रनाथ( मत्स्येन्द्र) और गोरक्खनाथ( गोरखनाथ ) का समय था । सिद्धों /नाथों काव्य की शैली सहजयानी की शैली रही है जिससे लगता है कि सिद्ध और सहजयानी कभी एक ही परम्परा से निकले थे। दसवीं सदी के  कश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त ने मच्छनाथ विभु की वंदना की है ,गोरखबानी प्रकृत अपभ्रंशसिय रही।

नरपति नाल्ह की बीसलदेवरासो ,हम्मीर रासो, पृथ्वीराज रासो जैसे काव्य बेशक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक न हो किन्तु हिंदी के उद्भव में महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

इतिहासकारो के अनुसार हिंदी के वास्तविक जनक अमीर खुसरो कहे जाते हैं,उनकी रचनो में तात्कालिक प्रचलित  खड़ी बोली को हिंदीकाव्य भाषा में  प्रयोग किया गया जिससे हिंदी प्रतिष्ठित हो पाई।सबसे पहले ख़ुसरो ने दिल्ली के आस पास प्रचलित खड़ी बोली को साहित्यक सर्जन का काम किया । उस समय मुसलमान अपनी कवितायेँ फ़ारसी में तो हिन्दू अपनी संस्कृत में सिद्ध / नाथ संत  अथवा जैन डिंगल या अपभ्रंश में । अमीर खुसरो ने इनसे इतर प्रचलित जन भाषा हिंदी में अपनी रचनाएं की और उर्दू के लिए रहा खोल दी।

यही नहीं ख़ुसरो के सच्चे भारतीय थे उस का उल्लेख अपनी मसनवी में 'नुहे- सिपह्न' ( नौ आकाश) में भारत की प्रशंसा की है जो की उस समय सल्तनत की साम्प्रदायिक नीतियां भारत के खिलाफ थी पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की । मुसलमान भारत के प्रति अपनी भक्ति अर्पित करें यह बात उस समय मुस्लिम समाज में अच्छी नहीं समझी जाती थी। उस समय भारत को दारुल -हरब कहा जाता था।
ख़ुसरो की दोहे, मुकरनियां , पहेलियां खूब प्रसिद्ध हुए , ख़ुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । जब निजामुद्दीन की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी पीड़ा एक दोहे में व्यक्त की जो आज तक प्रसिद्ध है-

गोरी सोवत सेज पर ,मुख पर डाले केस।
चल ख़ुसरो घर आपनो, रैन भई सब देस।।

हिंदी को आगे ले जाने में निर्गुण और सगुण काव्यधाराओं ने भी बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। निर्गुनिया संतो ने तो ख़ासकर क्यों की कबीर ,रैदास जैसे संतो की भाषा ही जनभाषा थी । कहा यह जाता है की निर्गुणसंत काव्य धारा सिद्धों/ नाथों और जोगियो से निकली है जो कभी बौद्ध थे ।

हिंदी निर्गुण संत काव्यधारा के प्रमुख संत कबीर हुए,
कबीर जुलाहा जाति के थे , कबीर सिद्ध परम्परा से आते थे जिनके पूर्वज निम्न जाति के थे और हाल ही में मुसलमान बने थे । इतिहासकारो का मानना है कि कबीर के पूर्वज अस्पृश्य कोरी जाति के थे , कोरी जाति ही मुस्लिम जुलाहे बनते थे।

अपनी रचनाओं से पाखण्ड, अंधविश्वास , जातीय भेद भाव , ब्रहामणिक विधानों या मज़हब के आडम्बरो पर जितना कबीर ने प्रहार कियाहै  उतना किसी ने नहीं किया । यह दिगर की बात थी की अनपढ़ कबीर के ज्ञान के आगे बड़े बड़े मुल्ला पंडित कंही नहीं ठहरते थे। कबीर कहते हैं-

हिन्दू कहत है राम हमारा ,मुसलमान रहमाना
आपस में दोउ लड़े मरत है भेद न कोई जाना।।

प्रेम सिर्फ ईश्वर भक्ति नहीं है बल्कि वह अपने आप में स्वतंत्र मूल्य रखता है इस अनुभूति की पहली हिंदी कविता कबीर ने ही लिखी है-

प्रेम न बारी उपजै, प्रेम न हाट बिकाये,
राजा परजा जेहि ,सीस देई ले जाए।
यह तो घर है प्रेम का ,खाला का घर नाहि,
सीस काटि भुइयां धरो, तब पैठो घर माहिं।
सीस काटि भुइयाँ धरो, ता पर राखों पाँव,
दास कबीरा यों कहैं, ऐसा हो तो आव।

प्रेम की इतनी पीड़ा की अनुभूति की जो भंगिमा कबीर सहज भाव से कहते हैं उतनी अनुभूति आज तक नहीं रची गई।हाँ , मीरा कुछ वँहा तक पहुँचती हैं मीरा कहती हैं-

बिरिहन भुअंगम तन डसा ,किया करेजे घाव
बिरिहिन् अँग न मोडिया ,जित चाहो तित खाव।

यंहा थोड़ा दक्खिनी हिंदी का जिक्र करना जरुरी होगा,दक्खिनी हिंदी का अर्थ दक्षिण की हिंदी नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि से इतिहास में इस क्षेत्र को दखन कहा जाता रहा है और इसके अंतर्गत महारास्ट्र , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कई क्षेत्र आते हैं।भाषा शास्त्रियों के अनुसार खड़ी बोली को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया है । राहुल सांस्कृतयायन के अनुसार खड़ी बोली हिंदी के कवि सबसे पहले दक्खिनी कवि ही थे ,दक्खिनी कवियों में अधिकतर सूफ़ी मत के कवि रहे हैं जिनमे की जानम( 1582) गेसू दराज( 1343) जैसे प्रमुख रहे हैं । डाक्टर सुनीत कुमार चाटुजर्या लिखते हैं कि 1690 में औरंगजेब दक्खिन में था तब बंगाल के एक मुसलमान प्रवास करता हुआ उससे मिलने आया । उसने बादशाह से कहा कि वह उसे अपना मुरीद बना लें तब औरंगजेब ने देशज पद्य की पंक्तियां कह के उसे फटकारा-

टोपी लेंदे, बावरी देंदे , खरे निलज्ज।
चूहा खान्दा बावली, तू कल बंधे छज्ज।।

औरंगजेब घोर साम्प्रदायिक है किंतु उसके मुंख से हिंदी शब्द निकलते हैं ।

दोस्तों,हिंदी का एक लंबा आए समृद्ध  इतिहास रहा है जिसको इस छोटे से लेख में वर्णन करना नामुमकिन है इसके लिए पोथियाँ कम् पड़ जाएँगी ।अतः इतने पर ही विराम देना चाहूंगा।

हिंदी का इतिहास बौद्धों, जैनियों, सिद्धों/ नाथों / जोगियो से होता हुआ हम्मीर,ख़ुसरो, रासो, विद्यापति, कबीर, रविदास, मीरा ,गुरुनानक, धर्मदास, मुहम्मद जायसी, उस्मान, रसखान, रहीम, तुलसीदास, हरिदासी(सखी संप्रदाय) , सूरदास,गोबिंदस्वामी, नरहरि, मुबारक, भूषण, भिखारीदास, खुमान, दरिया साहिब, पलटू दास, तथा आधुनिक काल के हिंदी साहित्यकारों / नाटककारों तक पहुंचा जिन्होंने इसे नई ऊंचाइयां दी ।जिनमे कुछ आधुनिक हिंदी साहित्यकारों के नाम इस प्रकार है -

भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्ववेदी,मैथलीशरण गुप्त, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, हरी शंकर परसाई, राहुल सांस्कृत्यायन, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य हजारी प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, डी डी कौशाम्बी, अमृतलाल नागर, मुक्ति बोध, धर्म वीर भारती, नागार्जुन, रेणु, भीष्म साहनी, रामव्रक्ष बेनी पुरी, मुद्राराक्षस, रंगेय राघव, पुष्पा मैत्रीय,रामविलास शर्मा,उषा प्रिवन्दा,  ओमप्रकाश वाल्मीकि,माधव मुक्तिबोध, शिवदान सिंह चौहान, हमीदुल्ला, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शरद जोशी, तुलसी राम( मुर्दहिया) , राजेंद्र प्रसाद सिंह( सासाराम कालेज) , कँवल भारती जैसे अनगिनत हिंदी साहित्यकार शामिल हैं। जिनका नाम याद नहीं रहा उन से विनम्र क्षमा चाहता हूँ, यदि पाठक गण चाहे तो नाम वे अन्य नाम सुझाव कर सकते हैं।


आप सभी को हिंदी दिवस की ढेरों बधाइयाँ...आशा है कि हिंदी यूँ ही बढ़ती रहेगी और जन जन तक फैलती रहेगी ...



Saturday, 26 August 2017

धंधा- कहानी


शहर से दूर एक निर्जन और वीरान जगह पर एक मंदिर और एक मजार थी, जिस रास्ते पर यह मजार और मंदिर था उस के आस पास बहुत घना जंगल था जिस कारण लोग बाग़ बहुत कम उधर से गुजरते थे केवल चरवाहे जंगल में अपने पशु चराने सुबह शाम उधर से जाते थे वीरान मंदिर को देख कर कई साल पहले वंहा एक बाबा ने अपना डेरा जमा लिया था । बाबा दिन भर गाँव गाँव और शहर जाके भीख मांगता था , उसे पैसे के अलावा आंटा दाल तेल आदि भी खूब मिलता था जिसे वह अपने खाने के लिए बचा के बाकी का बेंच देता था जिससे अच्छे पैसे भी मिल जाते थे ।

मंदिर के साथ जो मज़ार थी उसमे भी एक फ़कीर ने अपना डेरा जमा लिया था , वह भी गाँव गाँव- शहर  जाके भीख मांगता और अच्छी आमदनी करता ।
शाम को बाबा और फ़कीर दोनों मिलते पर एक दूसरे से बोलते नहीं थे , फ़कीर जब बाबा को देखता तो अल्लाह तौबा कह के मुंह फेर लेता और जब बाबा फ़कीर को देखता तो राम राम किसका मुंह देख लिया कह के मुंह फेर लेता। यह क्रिया कई  सालो तक चलती रही , बाबा और फ़कीर दोनों भीख मांगते और अपने लिए बचा के शेष बेंच देते ।
पर बीते कुछ सालो से दोनों को भीख मिलना कम हो गया था , दिन बहुत कठिनाई से गुजर रहे थे दोनों के पर अब भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं करते थे ।
कुछ महीने और बीत गए , अब दोनों को भीख मिलनी लगभग बंद सी हो गई थी ।

बाबा शरीर सूख के काँटा हो गया था , एक दिन शहर से भीख मांगते हुए वापस आते हुए बहुत थक गया पर झोली खाली थी । थक के वह मंदिर के चबूतरे पर सुस्ताने के लिए बैठ गया, तभी मज़ार पर रहने वाला फ़क़ीर भी शहर से भीख मांग कर वापस आ गया , उसके भी गाल पिचके हुए और शरीर पतला हो गया था लगता था की कई रोज से भरपेट खाना नहीं मिला था। झोला उसका भी खाली था ।
दोनों ने एक दूसरे को देखा पर इस बार पता नहीं क्या समझ के फ़कीर ने बाबा से ' आदाब' कह दिया और उसी चबूतरे पर बैठ गया । बाबा ने भी प्रतिउत्तर में राम राम कहा । जंहा सम्पनता में वे दोनों एक दूसरे का मुंह तक नहीं देखना पसंद करते थे वंही भूख और लाचारी ने दोनों को पास ला दिया था ।


फ़क़ीर ने बाबा की तरफ देखते हुए कहा" क्या बात है ? बहुत कमजोर लग रहे हो "
बाबा ने फ़कीर की बात सुन के एक ठंडी आह भरी और कहा " क्या बताऊँ भाई , कई दिनों से आधे पेट खा के गुजरा कर रहा हूँ । गाँव गांव भटकने के बाद भी भीख नहीं मिलती है , शहर में भी अब कोई एक रुपया भी नहीं देता,  बड़ी मुश्किल से दस बीस रूपये हो पाते हैं और मुट्ठी भी आंटा । जाने लोगो को क्या हो गया है ,कोई भी भगवान् के नाम पर भीख देने को राजी नहीं है ।

फ़कीर ने कहा - यह बात तुम बिलकुल सही कह रहे हो , अपना भी ऐसा ही हाल है । कोई भी अल्लाह के नाम पर पैसा देने को तैयार नहीं । गाँव में जाओ तो लोग बच्चों के हाथो से आधी कटोरी आंटा भेज देते हैं जिससे खाने भर का भी पूरा नहीं हो पाता।

बाबा ने आगे कहना जारी रखा- हाँ,लगता है की सभी नास्तिक हो गए हैं । पहले कितना मिलता था , कितना दान करते थे लोग की खाने के अलावा बहुत सा बेंच भी देते थे जिससे नगद पैसा भी बहुत आ जाता था , शाम के लिए शराब का  इंतेजाम भी आराम से हो जाता था ।

फ़क़ीर ने कहा - सही कहा , मैंने भी कई दिनों से चिलम नहीं लगाई , महंगाई इतनी हो गई है की लोगो ने खैरात देना बंद सा कर दिया है ।
बाबा ने कहा - ऐसे तो हम भूखे मर जायेंगे
फ़क़ीर ने कहा - हाँ कुछ उपाय करना पड़ेगा ताकि आमदनी आये
बाबा बहुत देर तक गंभीर मुद्रा में आँख बंद कर के सोचता रहा , फिर उसने आँखे खोली तो कहा की हम थक गए हैं लोगो के दरवाजे दरवाजे जा जा के अब उपाय ऐसा करना पड़ेगा की लोग हमारे पास आये । फ़क़ीर ने सहमति से सर हिलाया।
बाबा ने फ़कीर के कान में बहुत देर तक कुछ समझता रहा , फ़कीर बीच बीच में सहमति में  सर हिलाता रहा।

दो दिन बाद चरवाहे जब अपने पशु को लेके उस मंदिर के पास से गुजरे तो उन्हें बहुत अच्छी खुसबू हवा मे महकती हुई महसूस हुई ,वे जिज्ञासा वश खुसबू के स्रोत की तरफ चल दिए । उन्होंने देखा की मंदिर के परिसर में एक लंगोटी पहने बाबा ध्यान मुद्रा में बैठा है । उसके चारो तरफ धुनि जल रही है और खुसबू उसी में से आ रही है । चरवाहो ने सोचा की कोई बड़ा साधू है और वे श्रद्धा वश वंही बैठ । थोड़ी देर बाद बाबा ने आँखे खोली और सब पर जल छिड़कता हुआ मन्त्र बुदबुदाने लगा । बाबा ने जल की कुछ बुँदे सामने बने ताजाबने  कुण्ड में रखी टुकड़े की हुई लकडियो पर डाला ।

जल पड़ते ही कुण्ड की लकडियो में आग लग गई । चरवाहों ने जब यह दृश्य देखा तो वे बाबा को कोई सिद्ध पुरुष समझ के उसके कदमो में लोट गए । चरवाहों ने बाबा से पूछा की आप कौन हैं ?
बाबा ने उत्तर दिया की वह अब से पहले हिमालय की गुफाओ में तपस्या कर रहा था और कल ही यंहा आया है ,लोगो की मन की मुरादे पूरी करने के लिए ही वह अपनी तपस्या छोड़ के आया है "

चरवाहे बाबा की जय जयकार करने लगे और तुरंत अपनी गाय से दूध दुह के बाबा को भेंट कर दिया । बाबा ने दूध पीते हुए कहा की पास वाले मजार पर भी एक पंहुचा हुआ औलिया आया है जा के उसके भी दर्शन कर लो । जाते वक्त चरवाहों ने श्रद्धा वश एक दो रुपया बाबा को चढ़ा दिया ।

बाबा की बात सुन के सब चरवाहे मजार पर पहुच गए , उन्होंने देखा की एक हरे कपड़ो में बाबा बैठ है जिसके सामने रखे एक कटोरे में  लोबान जल रही है । लोबान से मनमोहक सुगंध आ रही है । फ़क़ीर ने भी चरवाहों को देखा तो अपने पास पड़े लौटे से पानी की अंजलि भरी और लोबान वाले कटोरे में कुछ बड़बड़ाते हुए छिड़क दिया । लोबान की आग  बुझने की वजाय और भड़क गई । चरवाहों का आस्चर्य का ठिकाना न रहा उन्हें फ़कीर के पैर छूते हुए परिचय पूछा । फ़कीर ने बताया की वह शिरडी से सीधा यंहा आया है और लोगो के ऊपर से जिन्न ,भूत प्रेत आदि की बाधा दूर कर के उन्हें धन दौलत से मालामाल कर देता है।
बस फिर क्या था फ़कीर के लिए भी तुरंत दूध का इंतेजाम हो गया और चरवाहों ने एक रूपये दो रूपये अपनी समर्थता के अनुसार फ़क़ीर के चरणों में रखते गए ।

अगली सुबह पास के गाँव के  दर्जनों लोग बाबा और फ़कीर के दर्शनों के लिए पहुच चुके थे , सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार फल,मिठाइयां  और कुछ दान दक्षिणा दे रहे थे ।
एक सप्ताह भी नहीं बीता ही दसियों गाँवो के लोग बाबा के मंदिर और फ़कीर के माजर पर मत्था टेक चुके थे । हिन्दू लोग मंदिर में भजन कीर्तन करते तो मुस्लिम लोग मजार पर चादर चढ़ा के और कब्बाली गाते । बड़ी संख्या में लोग मंदिर और बाबा की सेवा में लगे रहते ।
इधर मुस्लिम लोग मजार और फ़कीर की सेवादारी नहीं करते थकते ।

कुछ ही महीनो में मंदिर और मज़ार शहर तक प्रसिद्ध हो गए , बड़ी बड़ी गाडियो में लोग बाबा और फ़कीर के दर्शन करने आते और मन्नते मांगते। खूब चढ़ाव आने लगा मंदिर और मजार में , प्रशासन को जब पता चला तो उसने वंहा बिजली का इंतेजाम करवा दिया मंदिर और मजार तक जाने के लिए पक्की रोड बन गई थी । बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से सवारी ढोने वाले वहां सीधा मंदिर और मजार तक जाने लगे । जंहादिन में भी लोग जाने से कतराते थे अब उस वीरान मंदिर मजार के आस पास बड़ी संख्या में  तरह तरह के समान की दुकाने खुल गई थी । हर दुकान से बाबा और फ़कीर का कमीशन बंधा हुआ था ।


पुरुष ही नहीं अब स्त्रियां भी बाबा और फ़कीर की सेवा में लग गई थीं , बाबा के पास हिन्दू औरतो की लाइन लगती जो सौतन से छुटकारा, पति काउनके प्रति  अप्रेम, बच्चा होने जैसी समस्याओ का निबटारा चाहती थी। तो दूसरी तरह मुस्लिम औरते भी यही समस्याएं लेके फ़क़ीर के पास आती।
बाबा और फ़कीर ने दान चढावे, दुकान का कमिशन  आदि का हिसाब किताब रखने के लिए तीन तीन मुनीम रख लिए थे । पचास साल के बाबा फ़कीर अब 30-35 साल के जवान लगने लगे थे ।

दिन ब दिन मंदिर और मज़ार के भक्तो की संख्या बढ़ती जा रही थी , एक दो कंस्ट्रक्शन कंपनिया अब मंदिर और मज़ार के आस पास की जमीनों पर फलैट बना के बेचने का विचार कर रहे थे और इसके लिए बाबा और फ़कीर को मोटी रकम कमीशन के तौर पर  अड्वान्स दे दी गई थी तथा तीन तीन फ्लेट्स मुफ़्त देने का वादा अलग से।

बस यूँ ही कहानी आगे बढ़ती रही ...



Thursday, 17 August 2017

पकवान- कहानी



माथे पर चन्दन का लम्बा तिलक लगाएं स्वामी जी ऊँचे मंच पर बैठे लोगो को आत्मा- परमात्मा पर प्रवचन दे रहे थे । कुछ क्षण रुक पास पड़े मिश्री और इलाइची के पात्र से कुछ मिश्री के टुकड़े और इलाइची उठा मुंह में डालते हुए फिर से प्रवचन देने लगे- भक्तो! कलियुग युग में जो व्यक्ति गुरुओं की सेवा करेगा, धर्म पुरुषो की सेवा करेगा, ब्राह्मण- गाय की सेवा करेगा , दान- पुण्य करेगा वह अपने समस्त पापो से मुक्त हो बैकुंठ धाम जायेगा...... वह स्वर्ग जा सभी सुखों का भोग करेगा.....जो यंहा जितना दान-पुण्य करेगा , धर्म पुरुषो की सेवा करेगा वह स्वर्ग में आन्नद ही आनंद का भोग करेगा उसकी आत्मा वंहा सभी सुख भोगेगी "

उनके प्रवचन पर जनता झूम झूम जा रही थी ,चारो तरफ भक्तिमय माहौल के साथ स्वामी जी के जयकारे गूंज रहे थे।

इसी तरह आत्मा द्वारा  स्वर्ग में अनगिनत  परालौकिक सुखो  के भोगने का आश्वासन दे स्वामी जी ने कुछ घंटे बाद अपने प्रवचन का समापन किया।

घुरहू हाथ जोड़े उठा और स्वामी जी से अपने घर भोजन के लिए आग्रह करने लगा।
घुरहू ने कहा -" महाराज! मेरी पत्नी ने आज  रसगुल्ले, इमरती, शुद्ध दूध की रबड़ी, बर्फी , देशी घी की पूड़ी- कचौड़ी, मोतीचूर के लड्डू, बादाम की खीर, पनीर की सब्जी ...और न जाने क्या क्या बनाया है ... आपस आग्रह है कि आज रात का भोजन मेरे घर कर मुझे कृतज्ञ करें"

स्वामी जी वैसे शायद मना कर देते किन्तु इतने सारे पकवानों का नाम सुन उनके मुंह में पानी आ गया अतः घुरहू का आग्रह ठुकरा न पाएं और चल दिए घुरहू के घर रात का भोजन करने।

घुरहू ने स्वामी जी के  भोजन के लिए साफ- सुधरा आसन बिछा दिया । स्वामी जी घुरहू की श्रद्धापूर्वक आव भगत देख के गदगद हुए जा रहे थे ।

स्वामी जी को आसन पर बैठाने के बाद घुरहू बोला -"महाराज ! जब तक भोजन नहीं आता तब तक कुछ वार्तालाप ही हो जाए....मैं भोजन के बारे में ही बता दूं" और इतना कह घुरहू आने वाले भोजन के बारे में बताने लगा ।
"कढ़ाई में छन-छन करता हूआ शुद्ध देशी घी जिसकी सुगंध ही व्यक्ति का मन मोह ले ,उसमे सिंकती हुई कचौड़ियां जिसमे भरे हुए है  बादाम- काजू , मुन्नका... आहा!... वो सफ़ेद शुद्ध चासनी में डूबे तेज भूरे रंग के गुलाब जामुन.... वाह!... वह गाय के खोये से बनी पिस्ता वाली बर्फी...... जिसपर करीने से काजू कात के लगाये गएँ हैं.... वाह!"

घुरहू स्वाद लेके खाने में एक एक व्यंजन की तारिफ कर रहा था ,तारीफ़ सुन स्वामी जी बेकाबू हो रहे थे  भूंख कंट्रोल से बाहर हुई जा रही थी। आँखों के सामने घुरहू के बताये व्यंजनो के दृश्य सजीव हो उनके इर्द - गिर्द नाचने लगे थे।

तकरीबन आधी रात होने वाली थी किन्तु घुरहू ने अब तक स्वामी जी के सामने भोजन नहीं परोसा था बस व्यंजनो की प्रसंसा किये जा रहा था-
" पहले धार के दूध की गाढ़ी खीर , खीर में केसर, बादाम से हल्का सुनहरा रंग .… वाह .. जैसे अमृत हो... और पनीर की सब्जी..." घुरहू पनीर की सब्जी के बारे में बताने वाला ही था कि उसकी पत्नी एक थाली में चटनी रोटी लेके आई और स्वामी जी के सामने रख चली गई।

 सुखी रोटी और चटनी देख स्वामी जी क्रोध मे खड़े होते हुए बोले-"मुर्ख....अधर्मी ....पापी... कितने घण्टे से तू मुझे  यंहा भूँखा बैठाये हुए है , व्यंजनो के नाम बता बता उसकी तारीफ किये जा रहा है और खाने को यह सुखी रोटी और चटनी !!"

घुरहू हाथ जोड खड़ा हो गया और  बोला- महाराज! जिस तरह से सुबह आप हमें सारा दिन स्वर्ग में मिलने वाले अद्धभुत और वैभवशाली वस्तुओ को बता के खुश कर रहे थे वैसे ही मैं भी आपको स्वादिष्ट व्यंजनो के बारे में बता के खुश कर रहा था .... आप हमें खुश कर रहे थे और मैंने आप को खुश कर दिया .... आप को ये सब व्यंजन मैं स्वर्ग में अवश्य खिला दूंगा.... अभी तो आप चटनी रोटी  खाइये " इतना कह घुरहू के चेहरे पर एक व्यंगात्मक मुस्कान छा गई।

स्वामी जी  घुरहू की बात सुन अवाक रह गए  , उन्हें आशा न थी घुरहू जैसा अनपढ़ उनसे ऐसी बात कर सकता है । वे किंकर्तव्यविमूढ़  हो कुछ क्षण खड़े रहे फिर मुड़े और तेजी से घुरहू के घर से निकल गएँ।

सुबह पता चला  की स्वामी जी वापस अपने धाम चले गए हैं।



Sunday, 23 July 2017

'ओम मणि पद्मे हुम्'

'ओम मणि पद्मे हुम्'

इस मन्त्र के विषय में यह मान्यता फैली है कि संस्कृत का यह मंत्र बौद्ध धर्म शाखा या तिब्बती बौद्ध में प्रचलित है ,यह मंत्र अवलोकितेष्वर यानि करुणा बोधिसत्व का द्योतक है।

 ओम का अर्थ ओम है , मणि का अर्थ गहना( माणिक या रौशनी -चमक) है , पद्मे का अर्थ कमल का फूल है जिसका अर्थ चेंतना किया और हुम् का सत/ आंनद अर्थ है।

यह भी आश्चर्य है कि संस्कृत के विद्वान तो इसे बुद्ध का मंत्र तो मानते ही है पर बौद्ध विद्वान भी इसे बुद्ध का मन्त्र मानते हैं।
जबकि सत्य है कि बुद्ध के समय संस्कृत थी ही नहीं।

संस्कृतवादियों का इस मंत्र को बुद्ध का मंत्र बताने का आशय यह रहता है कि बुद्ध को संस्कृत के बाद का सिद्ध किया जा सके ।

किन्तु यह मंत्र बुद्ध वचन नहीं है बल्कि यह मन्त्र  वज्रयान के तंत्रवाद का है।

ओम मणि पद्मे हुम् का अर्थ करते हुए देवीप्रसाद जी कहते है कि इसका सीधा अर्थ है 'ओम वह मणि जो पद्म पर विराजमान है'।

तंत्रवाद की योगसाधना को शत-चक्र भेद कहा जाता है । तांत्रिकों के अनुसार  इस का सैद्धांतिक आधार शरीर रचना के बारे में है ।
तंत्रवाद के अनुसार दो नाड़ियां हैं जो सुषुम्ना नाड़ी के दोनों ओर समान्तर चलती हैं, सुषुम्ना नाड़ी नितम्ब से लेकर मस्तिष्क तक जाती है और इसी लिए सामान्यतः इसी को रीड की हड्डी माना जाता है।

सुषुम्ना के अंदर एक और नाड़ी मानी जाती है जिसे वज्रख्या कहते हैं इसके बीच एक और नाड़ी है जिसे चित्रिणी कहते हैं। सीधे शब्दों में चित्रिणी सुषुम्ना नाड़ी का अंतरिम भाग है ।

तंत्रवाद में ऐसा माना जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी के सात अलग अलग स्थानों पर सात पद्म (कमल) है ।आधुनिक तांत्रिक इसे स्नायुजाल कहते है किंतु प्राचीन तंत्रवाद के जानकार पद्म या कमल को योनि या भग का प्रतीक मानते है। प्राचीन तंत्रवाद में योनि या भग को पद्म से ही दर्शाते थे ।

प्राचीन तंत्रवाद के जानकार एल. डिलवालपोलियो ने कहा  "वज्र जिसका दूसरा नाम मणि है वह पुरुष के लिंग का रहस्यमय नाम है  ठीक उसी प्रकार जैसे योनि या भग का साहित्यिक नाम पद्म है"

प्रचीन कई सभ्यताओं में भी कमल को योनि का प्रतीकात्मक महत्व दिया गया था , इसलिए सुषुम्ना नाड़ी पर सात कमल नारीत्व के साथ स्थान हैं और तंत्रवाद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के अंदर हैं ।
विभिन्न तंत्रों के अनुसार सात पद्मो के निश्चित आकार के चित्र होते हैं , इन चित्रों में अधिकाँश पद्मो में त्रिकोण चित्र बने होते हैं । तंत्रवाद में त्रिकोण अनिवार्य भग या योनि का प्रतीक होते हैं ।

शत-चक्र भेद के इन पद्मो पर सात शक्तियों जैसे कुलकुण्डलिनी , वाणिनी, लाकिनी आदि उल्लेख होता है।ये सातों शक्तियां प्रत्येक पद्म पर विरजमान होती हैं।

तंत्र साधना में कुण्डलनी शक्ति(सुप्त पड़े नारीत्व) को नितम्बो के पास  सुष्मन्ना नाड़ी के अंतरिम केंद्र में जाग्रत किया जाता है और एक एक पद्म पर कर इसे मस्तिष्क तक लाया जाता है । सुषुम्ना के सबसे ऊपरी कमल को सहस्त्र- दल- पद्म कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है हजार पंखुड़ियों वाला कमल । कई विद्वान इसे हजार पिण्डको( अंडों) वाला ऊपरी मस्तिष्क कहते हैं जिसमे सभी पिंडक कुंडली के रूप में पड़े हैं। तांत्रिकों के अनुसार यह चेतना का सबसे उच्चतम निवास है।

तंत्रवाद के अनुसार पुरुषतत्व सहस्त्र-दल- पद्म में नारीत्व के साथ ही विरजमान है और कुण्डलनी शक्ति जब वँहा तक पहुँच जाती है तो पुरुषतत्व के साथ मिल के एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं। उनका कोई अलग अस्तित्व नहीं रहता ,सब कुछ नारीत्व में विलीन हो जाता है और चेतना का उच्चतम अवस्था अन्तरतल में जाग्रत हो चुकी होती है।

अब आपकेमस्तिष्क में शायद यह प्रश्न भी आ सकता है कि ओम तो संस्कृत का शब्द है तो बौद्ध धर्म में क्या कर रहा है?
पर यह सत्य नहीं है ओम बौद्ध शाखा के तंत्रवाद का शब्द है जो तांत्रिक क्रियाओं में प्रयोग होता था ।

ठीक ऐसे समझिये की तंत्रवाद के इस मन्त्र 'ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' में नारी शक्ति को जाग्रत किया जा रहा है । अब कोई  ऐं ह्रीं क्लीं ' का संस्कृत अर्थ बताये ?

अतः यह कहना की 'ओम मणि पद्मे हुम्' बुद्ध वचन है तो सर्वदा गलत है। बल्कि यह वज्रयान का मंत्र है ।
चित्र-शत-चक्र भेद(सप्त कमल)

क्रमशः