Tuesday, 3 April 2018

आरक्षण क्यों और कैसे-

आरक्षण क्या, क्यों, किसके लिए और कैसे? साथ मे पढ़े अन्य संवैधानिक उपाय, जिनका उद्देश्य है देश -समाज मे शोषितों और वंचितों के लिए समानता के स्तर को प्राप्त करना….

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सामाजिक स्तर मे सुधार के लिए संविधान में त्रि-आयामी (त्रि-स्तरीय) रण नीति बनाई गयी, जो इस प्रकार हैं।

1. सामाजिक सुरक्षा प्रदान करके:

न्यायिक/नियमन साधनों द्वारा समानता के सिद्धांतको लागू करके और सामाजिक बाधाओं को दूर करके,दलितों पर होने वाली शारीरिक हिंसा के अपराधियों को कठोर दंड का प्रावधान करके,
ऐसे परंपरागत नियमों, प्रबंधों को बंद करके, जो दलितों की डिग्निटी ( गरिमा )और आत्म सम्मान को ठेस पहुँचाते हैं।

उनके परिश्रम की उचित कीमत और फल की प्राप्ति सुनिश्चित करके,-प्राकृतिक संसाधनों पर किसी खास वर्ग का ही अधिपत्य कम करके,
दलितों को उपलब्ध कराई गयी सुविधा, अधिकार, लाभ आदि की देखभाल के लिए स्वतंत्र आयोगो का गठन करके।

2. कमपेनसेटरी डिस्क्रिमिनेशन (प्रति पूरक भेदभाव ): सार्वजनिक सेवाओं, प्रतिनिधि संगठनों/ निकायों, शैक्षिक संस्थानों मे आरक्षण लागू करके व अन्य सहायता प्रदान करके।

3. विकास:- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अन्य समुदायों के बीच पैदा हुई खाई को पाटने के लिए लाभ और संसाधनों का पुनरवितरण करके.
ये नीति राज्य (भारत) द्वारा कार्यान्वित की गयी और तब से इस नीति के प्रति प्रतिबद्धता, भारत राज्य की विशेषता रही है. समय समय पर ये नीति ज़रूरत पड़ने पर और ज़्यादा मजबूत बनाई गयी और साथ ही ज़रूरत के मुताबिक इसका दायरा भी बढ़ाया गया है.  जहाँ तक सुरक्षा संबंधी प्रायोजनों की बात है, तो खुद संविधान मे काफ़ी विस्तृत रूप से उन परंपराओं, नियम क़ानूनों, सामाजिक संस्थागत प्रबंधों और दलितों पर थोपी गयी किसी भी अन्य प्रकार की अमानवीय  और भेदभावी स्थिति को ख़तम करने की ढाँचागत रूपरेखा दी गयी है जो अस्पृश्यता को समाज मे लागू करते हैं, उसका अनुमोदन करते हैं या इस हीन परंपरा के पालन को प्रोत्साहित करते हैं।

इन संवैधानिक प्रबंधों को लागू करने के लिए क़ानून बनाए गये. उदाहरण के लिए:-

The Untouchability Practices Act,  1955 संविधान के आर्टिकल 17 को लागू करने के लिए बनाया गया.  इस क़ानून को फिर से सख़्त बनाया गया और 1976 मे सन्सोधित करके इसे Protection of Civil Rights Actके नाम से ज़्यादा प्रभावी रूप मे लागू किया गया. बाद मे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लगातार बढ़ते गये जघन्य अत्याचारों और हिंसा, जैसे सामूहिक नर संहार, बलात्कार, आगज़नी, गंभीर हमलो द्वारा शारीरिक क्षति आदि के फलस्वरूप राज्य को एक बार फिर गंभीर फ़ैसले लेने पड़े और दलितों को सुरक्षा के लिए विशेष क़ानून बनाना पड़ा जिसे

 “Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989

के नाम से जाना गया और इसमे पहले से अधिक  कठोर सजाओं का प्रावधान किया गया ताकि ये क़ानून दलित के लिए प्रतिरक्षक ढाल का कार्य कर सके. इसी क़ानून का शोषक समाज ने जमकर विरोध किया. यही क़ानून वर्ग विशेष द्वारा “हरिजन एक्ट” के नाम से प्रचारित किया गया.  समाज मे स्थापित परंपराओं और क़ायदे क़ानूनों द्वारा दलितों को परंपरागत कार्यों में धकेलने के विरुद्ध और उनके अपने सामाजिक स्तर मे सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों में सहयोग के लिए समय समय पर अतिरिक्त क़ानूनों को भी प्रभाव मे लाया गया।

The Employment of Manual scavengers and Construction of Dry Latrines (Prohibition) Act, 1993  नामक क़ानून, जो दलितों द्वारा हाथ से अन्य नागरिकों के मानव मल को साफ करने की अतिहीन कुप्रथा को ख़तम करने के लिए बना था, इन नियमों मे सबसे महत्वपूर्ण है.  जो एक अन्य कुप्रथा रोकी जानी थी, वो थी दलित लड़कियों का मंदिरों मे देवदासी के नाम पर यौन शोषण. आंध्रा प्रदेश और कर्नाटक ने देवदासी नाम की इस प्रथा को तत्काल प्रभाव से ख़त्म करने के लिए क़ानून पास किए. इस प्रथा के द्वारा जवान दलित लड़कियाँ स्थानीय देवता को देवदासी के नाम पर भेंट चढ़ा दी जाती थीं, जिनका मंदिर के पुजारियों द्वारा यौन शोषण होता था।

 देवता के नाम पर मंदिर के पुजारी/पुरोहित, दलित लड़कियों का शोषण करते रहे थे.  महाराष्ट्र मे 1934 मे ही इस घटिया परंपरा को बंद करने का क़ानून बन चुका था. कुछ क़ानून जो, इस उच्च वर्ग द्वारा शुरू की गयी दलित बालिकाओं के शारीरिक शोषण इस नीच धार्मिक परंपरा को गैर क़ानूनी घोषित करके इसके उन्मूलन और प्रतिबंध के लिए पास किए गये, वो इस प्रकार हैं:-

Andhra Pradesh Devdasi (Prohibition of Dedication) Act, 1988
Karnataka Devdasi (Prohibition of Dedication) Act, 1992
Hindu Religious and Charitable Endowment Act, 1927 of Mysore.
The Bombay Devdasi Protection Act, 1934
(उपरोक्त क़ानूनों का बनाया जाना इस परंपरा के वजूद, उसके प्रचलन और पुरोहित वर्ग के दलित वर्ग के प्रति घृणित और अमानवीय नज़रिए का सेल्फ़ एक्सप्लनेटरी और लीगल प्रूफ है)

रोज़गार प्रदाता/नियोक्ता द्वारा अपने यहाँ नियुक्त काम गारों/श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिए भी क़ानून बनाया गया. इस क़ानून का मकसद मालिक द्वारा मजदूरों की सही मज़दूरी का भुगतान पक्का करना, कार्य के चुनाव की स्वतंत्रता दिलाना, ताकि नियोक्ता दावरा श्रमिकों पर अमानवीय और श्रमिकों की इच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता लादना बंद करना सुनिश्चित किया जा सके, अपने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने की स्वतंत्रता आदि आदि का ध्यान रखा गया. हालाँकि ये क़ानून अनुसूचित जाति और अनुसूचित/जन जाति के लिए ही विशेष रूप से न होकर, हर वर्ग के श्रमिक पर लागू होता है, पर इसका सबसे बड़ा प्रभावित वर्ग दलित वर्ग ही था क्योंकि सबसे ज़्यादा मजदूर और श्रमिक इसी वर्ग से आते थे और आते हैं।


इस उद्देश्य के लिए बने क़ानून इस प्रकार हैं:

Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976, बंधुआ मज़दूरी प्रणाली(निषेध) एक्ट, 1976
Minimum Wages Act, 1948, मिनिमम वेजस आक्ट,
Equal Renumiration Act, 1976, 1948, ईक्वल रीम्यूनरेशन आक्ट, 1976
Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986, चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन आंड रेग्युलेशन) आक्ट, 1986
Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act, 1979, इंटर-स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन (रेग्युलेशन ऑफ एंप्लाय्मेंट आंड कंडीशन्स ऑफ सर्वीसज़) आक्ट, 1979

दलित समुदाय को समाज की मुख्य धारा से निकल दिए जाने और समाज से बहिष्कृत रखे जाने के फलस्वरूप सभी प्रकार के लाभकारी और उत्पादन के साधनों पर उच्च वर्ग का ही अधिकार रहा, जिसके  कारण आज़ादी के समय भी लबभग सभी प्राकृतिक और बौद्धिक संसाधन इस उच्च वर्ग के ही पास अत्यधिक घनत्व के साथ केंद्रित थे, और दलित समुदाय इनसे सभ्याता के समय से ही वंचित रखा गया. आर्थिक संसाधनों और लाभकारी संपदा के कथित सवर्ण समाज के पास ही भारी मात्रा मे एकत्रित पाए जाने पर भी चोट की गयी. इस विषय के अंतर्गत “लैंड रिफॉर्म लॉ” (भूमि शुधार क़ानून), जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति व जनजाति के साथ साथ गाँव मे अन्य ग़रीब तबके के लोगों को भूमि का पुनरवितरण शामिल था, लागू किया गया।

डेट रिलीफ लेजिस्लेशन्स (ऋण राहत कानून) साहूकारों और सूद खोरों के हाथों ग़रीब लोगों के शोषण को रोकने और पैसे के लेन देन को नियमित करने के उद्देश्य से लागू किए गये.
सामाजिक सुधार की इस  रणनीति का दूसरा भाग कमपेनसेटरी डिस्क्रिमिनेशन (प्रति पूरक भेदभाव / क्षतिपूर्ति भेदभाव या सकारात्मक कार्यवाही) से संबंधित है जो निम्न लिखित प्रायोजन लागू करता है:

सार्वजनिक सेवा की नियुक्ति और प्रमोशन मे आरक्षण लागू करके,विधायिका की सीटों मे आरक्षण लागू करके (केंद्रीय, राज्य, पंचायत राज, मुनिसिपल बॉडीस आदि),शैक्षिक और प्रोफेशनल कॉलेजस की सीट मे आरक्षण लागू करके,निर्धारित योग्यता मापदंडो मे छूट प्रदान करके,फीस मे छूट या माफी प्रदान करके, आदि आदि।

ये सब उपाय यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य के साथ किए गये की दलित समुदाय के लोग भी देश के सार्वजनिक तंत्र की शक्ति और निर्णयों मे अपना हिस्सा ले सके, साथ ही उनको उच्च शिक्षा प्राप्त करने के भी अवसर उपलब्ध हो सकें. ये महसूस किया गया था की यह वर्ग जन्म जन्मान्तर और सदियों की अर्जित की गयी कमज़ोरी, व्यापक रूप में प्रचलित सामाजिक शोषण और सामाजिक अपंगता के कारण खुली प्रतियोगिता मे अपना ज़रूरी हिस्सा नहीं ले पाएगा।

इन प्रायोजनों का उद्देश्य दलितों और उस क्षेत्र मे रह रहे अन्य वर्गों के बीच पैदा हुई सामाजिक अंतर की गहरी खाई को पाटना था।
सामाजिक सुधार की इस रण नीति का तीसरा पहलू दलितों के व्यापक और बहुदिशीय विकास पर फोकस करता है. इस विषय के अंतर्गत लाभो का सीमांकन करके व तरह तरह की योजनाओं के अंतर्गत धनराशि जारी करके दलितों की आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास किया गया है ताकि समाज मे दलितों का उन्नयन (उपर की और गमन) हो सके. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रायोजन था की योजना के अंतर्गत जारी राशि का एक निश्चित प्रतिशत अनिवार्य रूप से दलितों के लाभ वाली योजनाओं पर ही खर्च किया जाए।

 अनुसूचित जाति के केस मे इस प्रकार के प्रबंध को “स्पेशल कॉंपोनेंट प्लान” के नाम से जाना जाता है और इसके अंतर्गत ज़िम्मेदार एजेंसी दलितों के हित के लिए योजना बनाकर धन राशि पास करती है जो कम से कम उस राज्य मे दलितों की जनसंख्या के प्रतिशत के बराबर होती है और केंद्रीय योजनाओं मे देश की कुल आबादी मे दलितों के प्रतिशत के बराबर होती है. (उत्तर प्रदेश की राज्य योजना मे  = 21%, केंद्रीय योजना मे= 15%). ये संसाधन दलित समुदाय के लिए ऐसे प्रोग्राम और गतिविधियों मे खर्च किए जाते हैं जो सीधे तौर  पर दलितों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने मे मददगार साबित होते हों।


इसी नियम के समानांतर, स्टेट पॉलिसी द्वारा प्रावधान किए गये की विभिन्न विकास कार्यक्रमों, जिनसे आम आबादी के लाभ जुड़े हों, उनमें लाभ प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या या की एक निश्चित प्रतिशत अनुसूचित जाति व जन जाति से होना सुनिश्चित किया जाएगा और किसी भी स्थिति मे उनकी उस राज्य मे जनसंख्या मे हिस्से के प्रतिशत से कम नहीं होगा. ऐसा इसलिए करना पड़ा ताकि संस्थाएँ लाभों का एक तरफ़ा वितरण करके दलितों को उनके हिस्से से वंचित न कर दें, जैसा की परंपरागत तौर पर समाज मे होता आया।


कुछ विशेष कार्यक्रमों के अंतर्गत, जहाँ दलितों और शेष समाज के बीच अत्यधिक विशाल अंतर पाए गये, वहाँ विशेष संस्थागत कार्यक्रमों द्वारा इस खाई को पाटने के लिए अतिरिक्त संसाधन जारी किए गये, जिसके अंतर्गत साक्षरता का विस्तार, ग़रीबी-उन्मूलन कार्यक्रम, घर और खेती के लिए ज़मीन का आवंटन आदि शामिल हैं.

दलित समुदाय की बहुदिशीय सुरक्षा के उपाय करने के साथ साथ इस बात की निगरानी रखनी भी बहुत आवश्यक थी कि दलितों के लिए किए गये उपाय सही मे ज़मीनी हक़ीकत बन भी रहे हैं या नहीं और इस समुदाय के हिस्से के लिए जारी की गयी सुविधा उन तक पहुँच भी रही है या नहीं. इस उद्देश्य के साथ चार निगरानी संस्थाएँ / आयोग बनाए गये.

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग की स्थापना स्वयं संविधान के अंतर्गत की गयी,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना Proctection of Human Rights Act, 1993 के अंतर्गत हुई,
राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना National Commission for Women Act, 1990 के अंतर्गत हुई,
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की स्थापना National Commission for Safai Karmacharis Act, 1993 के अंतर्गत हुई है.
मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग, किसी विशेष जाति के लिए ना होकर देश के हर एक नागरिक के लिए स्थापित हुए हैं, लेकिन इनके कार्यक्षेत्र हमेशा ही दलित समुदायसे सबसे ज़्यादा जुड़े रहे, जिनका अधिकार हनन सबसे ज़्यादा होता आया।

उपरोक्त संवैधानिक प्रबंधों से स्पष्ट है की राज्य, दलितों के प्रति होने वाली हिंसा और इसके कारणों की जड़ को सामाजिक व्यवस्था और परंपरागत पदानुक्रमित संबंधों मे पाता है और इन तथ्यों को क़ानूनी रूप से स्वीकार करता है, जो दलितों को सामाजिक आधीनता और इनडिग्निटी से भरी जिंदगी मे झोंक कर अवसाद भरा जीवन जीने को मजबूर करते हैं।

यहाँ बताई गयी त्रि-स्तरीय पॉलिसी धीरे धीरे उन कारकों को ख़त्म करने मे सहायता करेगी जो दलितों के प्रति हिंसा के रूप में परिणत हो जाते हैं या कारण बनते हैं और इस तरह समय के साथ साथ समाज मे समानता का आगमन और प्रसार होगा, जो समय लेगा. बड़े सोच विचार के बाद सामाजिक समानता लाने के लिए बनाया गया ये मॉडेल, समय के साथ साथ अनुभवों के आधार पर और सुदृढ़ किया गया और सोशियल इंजिनियरिंग के द्वारा सुधार के लिए देशभर मे प्रयासरत है।

यह बात भी स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है की सामाजिक संबंधों को बंद करने की इस प्रक्रिया मे राज्य की भूमिका न केवल बेहद महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक रूप मे रही है. इसमे कोई शंका नहीं की राज्य को ये भूमिका, जागरूकता के साथ साथ एक सकारात्मक झुकाव से इन हाशिए पर रखे गये और वंचित (सुविधा विहीन और अधिकारहीन) समुदायों के पक्ष मे प्रयोग करनी थी, जब भी दुर्जेय और अभेद्य उच्च वर्ग इस वंचित समुदाय के सामने रुकावट बना खड़ा हो. राज्य के सामने स्पष्ट था की ये वंचित और शक्तिहीन समुदाय उच्च और शक्तिशाली (सुविधा संपन्न और अधिकार संपन्न) वर्ग के सामने लंबी समयावधि तक भी अपने दम पर अपने हक की लड़ाई लड़ने मे सक्षम नहीं हो पाएगा. इसलिए ऐसी उम्मीद की गयी थी की राज्य कार्यकारिणी, विधायिका और न्यायपालिका के संस्थान न्यायिक  और संवैधानिक भावना का सम्मान करते हुए, राज्य की इस नीति का पालन करेंगे और उचित और आवश्यक प्रतिक्रिया देंगे।

कहीं ऐसा ना हो कि सरकारी तंत्र एक उदासीन या पक्षपात पूर्ण तरीके से कार्य करने लगें, इस पर निगरानी रखने के लिए विशेष निगरानी तंत्रों की स्थापना की गयी ताकि नीतिगत प्रतिबद्धता और इसके पालन के उद्देश्य से बनाई गयी व्यवस्था अपने नियत रास्ते से भटके नहीं।

इस रण नीति में ये भी आशा और आदर्शवादी दृष्टिकोण संजोया हुआ थी की बहुसंख्यक हिंदू समाज भी स्वयं अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर एक उदार और मानवीय नीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाते हुए ज़रूरी सहयोग देगा और स्वयं को इन आधारों पर खुद को बदलकर एक संपूर्ण और सकारात्मक सामाजिक बदलाव मे अपना सहयोग प्रदान करेगा. इस प्रकार ये उम्मीद की गयी थी की सोशियल इंजिनियरिंग के इस प्रयास द्वारा अन्य समुदायों के दलित, उत्पीड़ित और शोषित समुदायों के प्रति चले आ रहे रवैये और व्यावहारिक प्रतिक्रिया मे व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेंगे।


मानवाधिकार आयोग की इस रिपोर्ट के आगे के भागों मे विस्तार से इस बात की जाँच की गयी है और कारण बताए हैं कि इस त्रि-आयामी रणनीति के  अभीष्ट उद्देश्य संपादित/कार्यान्वित हुए, ज़मीनी हक़ीकत बने भी कि नहीं या फिर अनुसूचित जातियों के खिलाफ परंपरागत जारी हिंसा, जो कि धीरे धीरे और चुपचाप अस्पृश्यता के पालन द्वारा, तरह तरह की बाधाएँ लादकर और निर्योग्यताएँ थोप कर, भेदभाव करके, पक्षपातो और छुवा छूत आधारित परंपराएँ जारी रखकर तथा प्रत्यक्ष रूप से शारीरिक हिंसा करके और उनके प्रति जघन्य अपराध जैसे हत्या, नरसंहार, बलात्कार, आगज़नी आदि द्वारा सतत रूप से अन्य समुदायों द्वारा जारी रहती है। ताकि जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था को लागू रखा जा सके और इसमे होने वाले परिवर्तनों के खिलाफ बहुत ही सख़्त प्रतिरक्षा दलितों के मन मे भय बैठाकर स्थापित रखी जा सके, वो वैसे ही जारी रही या कम हुईं.

अगर इस पॉलिसी का पालन नहीं हुआ है तो कभी आगे ये भी बताया जाएगा की राज्य की इस त्रि-आयामी पॉलिसी के कार्यान्वयन और इसे समाज मे लागू करने के रास्ते मे कौन सी बाधाएँ आई और इनके पालन मे क्या कुछ सही नहीं रहा. समय मिला तो इस विषय पर भी बात की जाएगी की संविधान और राज्य की पॉलिसी मे निहित इस प्रकार की आशा को बहुसंख्यक हिंदू समाज ने अपनी इन घ्रिणित परंपराओं को छोड़कर उदारवादी और मानवतावादी और जनतांत्रिक सामाजिकता को अपनाने मे कितनी उत्सुकता दिखाई ताकि भारतीय सभ्यता भी दुनिया की विकसित सभ्यताओं के स्तर को प्राप्त कर सके और यह भी चर्चा की जाएगी कि क्या “राज्य -नागरिक समाज इंटरफेस” ने इस मुद्दे पर सकारात्मक सामाजिक बदलाव के लिए ज़रूरी सदभाव दर्शाया या नहीं!!

धन्यवाद!

Source: Human Right Commission Report by K. B. Saxena (For Govt. of India)

Sunday, 25 March 2018

स्त्री ,तंत्रवाद और ईश्वर

इतिहासकार जोसेफ नीधम ने यह सिद्ध किया है कि विश्व के प्राचीनतम इतिहास में धार्मिक कार्यो और पूजा अर्चना या जादू टोना का कार्य पुरुषो की वजाय स्त्रियों की थी और बाद में यह काम पुरुष पुजारिओं ने हथिया लिया।

इस ऐसे कार्य के लिए जोसेफ, डुइड लोगो का उदहारण देते हैं, इस बात का ताजा प्रमाण की डुइड लोगो ने जादू- टोने के काम से स्त्रियों को हटा दिया और स्वयं यह कार्य करने लगे ।

चुकी कृषि की खोज स्त्रियों ने की थी और कृषि से ही जादू टोने का आरम्भ हुआ था इसलिए जैसे जैसे कृषि पर पुरुषो का आधिकर होता गया वैसे वैसे अनुष्ठानों पर भी पुरुषो का आधिकर होता गया।
देवियों की तुलना में देवता हावी होने लगे और पुरुष भी महान ओझा या जादूगर बन गएँ।

कुछ उदहारण देते हुए जोसेफ कहते हैं, पातागोनिया में पुरोहिताई के कार्य करने वाले लोगो को एक प्रकार से अपना लिंग त्याग देना पड़ता है और स्त्रियों जैसे कपडे पहनने होते हैं।

बोर्निया की डायाक जनजाति के पुरुष जो जादू टोने या धार्मिक अनुष्ठान करते थे स्त्रियों के कपडे पहनने के लिए बाध्य होते थे।

जुलू सरदार वर्षा लाने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते है तो वे स्त्रियों के पेटीकोट पहनते हैं।

मेडागास्कर में पुजारी स्त्रियों के कपडे पहनते हैं।

अमेरिका में यह नियम रेड इंडियंस और मैस्को की जनजातियों में पाया जाता है।

भारत के तेलगुभाषी प्रदेश में ग्विचिवाड़ में जब कोई पुजारी धार्मिक क्रिया करने लगता है तो वह स्त्रियों के कपडे पहनता है।

बंगाल में जादू- टोने / धार्मिक अनुष्ठान  क्रियाये महिलाओं द्वारा सम्पन्न होते हैं।

पुष्टि के लिए यह खबर पढ़िए-

http://m.indiatoday.in/story/in-a-unique-tradition-men-dressed-up-as-women-in-kerala-for-a-religious-celebration/1/306710.html

कृषि के आरम्भ में इसे करने वाली स्त्रियों को यह पता नहीं था कि धरती से पौधे वास्तव में कैसे उगते हैं, उनके लिए बुआई से लेके कटाई तक की सारी प्रक्रिया बहुत रहस्यपूर्ण थी । इसके अलावा उनके पास कृषि तकनीक बिलकुल नहीं थी जिससे अच्छी फसल होने की सम्भवना अनिश्चित थी , इसलिए कृषि कार्य के लिए बहुत धैर्य, दूरदर्शिता और विश्वास की जरूरत होती थी और यही सब कारक थे जादू टोने और धार्मिक अनुष्ठानों की उत्पत्ति के ।

जादू टोना या धार्मिक अनुष्ठान उनकी मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएं पूरी करता था ,यह विश्वास उत्पत्न करता था बेशक वह विश्वास काल्पनिक और भ्रमपूर्ण था ।

वे अपने मनोरथ की काल्पनिक सृष्टि करते थे किंतु वास्तव में इसका प्रभाव वास्तविक परिस्थियों पर नहीं पड़ता था परंतु काल्पनिक सृष्टि करने वालो को यह काफी प्रभावित कर सकता था और आज भी करता है।

जादू टोना, धार्मिक अनुष्ठान एक तरह से अज्ञान ही थे ,किन्तु इतना अवश्य था कि ये सब कार्ता को मनोवैज्ञानिक काल्पनिक सबलता देते थे । अच्छी फसल का विश्वास बढ़ाते थें , इच्छापूर्ति का काल्पनिक विश्वाश दिलाते थें।

और आज भी दिला रहे हैं....ईश्वर के अस्तित्व का कारण भी वही काल्पनिक मनोवैज्ञानिक विश्वास थे....है...




Friday, 23 March 2018

सम्राट अशोक और बौद्ध धम्म-

अधिकतर भारतीय इतिहासकारो (?) का यह मानना है की सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की विभीषिका से दुखी होके बौद्ध धर्म ग्रहण किया था, इस घटना पर कई फ़िल्म और सीरियल
भी बन चुके हैं जिस कारण आम धारणा भी यही बन गई ।
पर क्या यह घटना सत्य है? क्या वास्तव में अशोक ने युद्ध की विभीषिका से दुखी होके बौद्ध धर्म अपनाया था ? क्या वास्तव में वह बौद्ध बना था ?
जी नहीं , ये कहानी झूठ है की सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था क्यों की वह तो शुरू से ही बौद्ध था । उसका पिता बिन्दुसार और उसके पूर्वज पहले से ही बौद्ध थे अत: अशोक का बाद में बौद्ध धर्म अपनाने की कहानी झूठी साबित होती है , देखें कैसे –
हम अधिक पीछे न जाके अपनी बात बिन्दुसार से शुरू करते हैं , सम्राट बिन्दुसार का जन्म 299 ईसा पूर्व हुआ और मृत्यु 269 ईसा पूर्व । ग्रीक लेखको ने इन्हें ‘ अमित्रघातक’ कहा जिसका अर्थ होता है शत्रुओ का नाश करने वाला । इन्होंने मगध का साम्राज्य दक्षिण भारत के कोंकण, मदुरई, कर्णाटक तक को जीत कर विस्तार किया । बिन्दुसार ने बौद्ध धर्म को दक्षिण तक फैलाया और कई शीला लेख लिखवाएं , उनके राज्य में बौद्ध धर्म राज धर्म बना रहा ।
कहा जाता है की बिन्दुसार के कई ( लगभग 16) रानियां थीं और 101 पुत्र थे और 99 को मार के अशोक राजगद्दी पर बैठा , परन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता । लामा तारनाथ ने अपने ग्रन्थ ‘ बौद्ध धर्म का इतिहास’ के पेज नम्बर 18 पर लिखा है बिन्दुसार की केवल तीन रानियां थी और 6 सौतले भाई और 4 बहने थी ।
अशोक का युद्ध केवल सुसीम से हुआ था जो की बिन्दुसार की पहली पत्नी से हुआ था और अशोक से बड़ा था । सुसीम बिन्दुसार की मृत्यु के उपरांत मगध का राजा बनाना चाहता था परन्तु दरबारी और जनता उसे नहीं चाहते थे अत: जब अशोक का राज्याभिषेक होना था तब सुसीम और अशोक का युद्ध हुआ जिसमें सुसीम मारा गया ।
शिलालेख 5 जो की अशोक ने अपने राज्यभिषेक के 13 साल बाद लिखवाया था उसमें उसने अपने भाई बहनो का जिक्र किया है जो अलग अलग प्रान्तों की राजधानियों में रह रहें थे और अशोक ने उन्हें धम्म महापात्र नियुक्त किया हुआ था । अत: अशोक का 99 भाइयो का मार के गद्दी प्राप्त करने की बात झूठ है ।
वह कहानी जो अशोक के बारे में प्रचलित है की उसने बौद्ध धर्म अपनाया था वह कपोल कल्पित है , जब अशोक के पिता और पूर्वज पहले से ही बौद्ध थे तो अशोक तो स्वयं ही बौद्ध था , उसे बौद्ध धर्म अपनाने की क्या जरूरत थी?
अशोक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधकारी मौर्य राजा लगभग 52 साल तक मगध में शासक रहें ।
बिम्बिसार से लेके अशोक के पुत्र कुणाल और उसके वंसज ब्रहद्रथ ( जिसे शुंग ने छल से मारा था ) सभी बौद्ध राजा रहें ।
सम्राट अशोक कलिंग विजय से पूर्व एक साम्राज्यवादी थे , लेकिन विजय के पश्चात वे एक आदर्श मानव बने , इनके वयक्तित्व में विशेष गुणों का विकास हो गया था । सत्य, दया, उदारता आदि विशेष गुण उन्होंने अपना लिए थे । कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने दिग्विजय की नीति त्याग दी और अपने पूर्वजो की तरह बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में मन लगाया । उन्होंने प्रचारको और उपदेशकों का विशाल दल तैयार किया जिसने विश्व के लगभग आधे भाग को अपने धम्म से जीत लिया । उन्होंने पशु बलि , मदिरा आदि व्यसनों पर रोक लगाई ।
दरसल उस समय बहुसंख्यक समाज जो की बौद्ध रहा था उसमे में शांति, नैतिकता आदि की भावना और आचरण प्रबल रही होगी जिससे समाज के बड़े वर्ग ने अशोक के अनावश्यक युध्द का विरोध किया होगा ।चुकी कोई भी सत्ताधारी बहुसंख्यक समाज की भावनाओ को कुचल कर ज्यादा दिन राज नहीं कर पाता है तो यही डर की भावना अशोक में भी होगी क्यों की अशोक प्रजा के खिलाफ नहीं जा सकता था ।
उस समय के समाज में बौद्ध धर्म भली भांति प्रचलित और स्वीकार था अत: जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को राज धर्म बनाया तो समाज में उसका स्वागत हुआ और इसी के चलते वह चीन, जापान, कोरिया आदि दूर देशो तक बौद्ध धर्म का विस्तार कर पाया ।
सम्राट अशोक ने 14 शीला लेख ( पेशवर, जूनागढ़, देहरादून, मानसेहरा, पुरी, जैगढ़, करनाल, आदि ) लिखवाये जिसमें धम्मोपदेश लिखवाये। सात स्तम्भ लेख लिखवाये ( दिल्ली, मेरठ, इलाहाबाद , रामपुरवा, सारनाथ, लौरिया, साँची). कई गुहा लेख लिखवाये जिसमें की गया के निकट की पहाड़ी के गुहा लेख प्रसिद्ध हैं ।




Thursday, 22 March 2018

बिहारी- कहानी

"ओ!! बिहारी!!....भो@# के साइड में चल ले" कार वाले ने कार का  हॉर्न मारने के साथ मुंह से गालियों का हॉर्न बजाया ।

 चिलचिलाती धूप की भीषण गर्मी में जिस सड़क पर पैदल चलना भी बड़ी मुश्किल हो रहा था दिल्ली वालों के लिए ,उस सड़क पर मुन्नालाल पसीने से भीगा और हांफता हुआ किसी तरह अपने रिक्शे को खींच रहा था। मुन्नालाल ट्रान्सपोर्ट से अपने  रिक्शे पर माल की भारी भारी तीन पेटियों को लोड किये हुए था जिसे जल्द ही सेठ के सदर बाजार वाले गोदाम पर पहुँचाना था , सेठ ने उसे इसी शर्त पर काम दिया था कि वह माल टैंपो से जल्दी पहुंचा देगा। अब  टैम्पो तो शाम चार बजे के बाद 'नो एंट्री', खुलने के उपरांत ही पहुंचा सकता था चुकी सेठ को माल जल्दी चाहिये था अतः उसने मुन्नालाल को यह जिम्मेदारी दी ।

"अबे ओ..... बिहारी ... मादर@# सुने ना...के!! परे नै कर ले या रिक्सा नै...." कार वाले की कर्कश आवाज़ फिर गूंजी ,इस बार आवाज़ कार के हॉर्न से भी तेज थी ।
"कर तो रहे हैं....साइड मिलेगी तब न करेंगे " मुन्नालाल खीजता हुआ बोला।
"तेरी भैण की $# ...जबान लड़ा रहा है ...बिहारी ...मादर@#." मुन्नालाल की खीज भरा उत्तर सुन कार वाला आपे से बहार हो गया ।

" भैण चो#.... दिल्ली नै अपने बाप की समझ के आ जाऊ थम , हरामजद्दो नै पूरी दिल्ली नास कर राखी है" माँ- बहन की सैकड़ो गालींयां देता हुआ वह कार से बाहर निकल आया। कार से उतरते ही  उसने मुन्नालाल पर गालियॉ के साथ थप्पड़ों ,लात- घूसों की बरसात कर दी।
मुन्ना लाल पहले से ही थका हुआ था ,यूँ अचानक हमला हो जायेगा यह उसने सोचा न थी । फिर दुबला पतला शरीर लिए वह अपना बचाव भी ठीक से नहीं कर पा रहा था ।
"छोड़ दीजिए .... छोड़ दीजिए.... हमारी गलती नहीं है...." कहता हुआ मुन्नालाल नीचे गिर गया । उसकी मैली कमीज फट के तार तार हो गई , थप्पड़ पड़ने के कारण मुंह से खून निकलने लगा था ।वह लगभग अचेत हो सड़क पर ही धम्म से बैठ गया । कर वाले का गुस्सा मुन्नालाल को मारने भर से ही शांत नहीं हुआ उसने एक जोरदार लात रिक्शे के अगले पहिये में मारी जिससे रिम टेढ़ा हो गया।

भीड़ बढ़ने लगी तो कार वाला कार में बैठा और तेजी से निकल गया।

मुन्नालाल बहुत देर तक वंही बैठा रहा । मुंह से खून निकलना बंद तो हो गया था पर लात -घूसों का असर अब तक था। सारा शरीर दर्द कर रहा था। मुन्ना लाल उठा और रिक्शे से पानी की बोतल निकाल पानी पिया और मुंह धोया। रिक्शे के पहिये को टेढ़ा देख उसको बहुत  गुस्सा आया, उसने गुस्से में कार वाले को बीसियों गाली दीं ।मुन्नालाल को अपनी मार पर इतना दुःख नहीं था जितना रिम के टेढ़े होने का था,आखिर माल समय पर पहुँचाना था वर्ना पैसे नहीं देगा सेठ।

किसी तरह रिम को कामचलाऊ करने के बाद मुन्नालाल दर्द भरे बदन से रिक्शा खींचते हुए  सदर बाजार सेठ के गोदाम पर पहुंचा । तब तक  शाम के छः बज गए थे , सेठ गुस्से में उसका इंतेजर कर रहा था ।

" साले बिहारी.... कँहा मर गया था ? तेरे चक्कर में ग्रहाक चला गया मेरा...कितना बड़ा नुकसान हो गया मेरा!!... कौन भरेगा ... भो@#$ के तेरा बाप!!" सेठ ने मुन्नालाल को देखते ही गुस्से में आग बबूला हो उठा और मारने दौड़ा।
मुन्नालाल ने हाथ जोड़ के सारी बात बतानी चाही पर सेठ कुछ कुछ सुनने को तैयार न था। मुन्नालाल ने माल गोदाम में उतार भाड़ा मांगने सेठ के पास पहुंचा तो सेठ ने उसे सौ रूपये पकड़ा दिए।
" सेठ जी बात तो तीन सौ रूपये की हुई थी" मुन्नालाल ने पूछा ।
" हुई थी पर वह टाइम पर आने के लिए था .... तेरे चक्कर में मेरा बहुत नुकसान हो गया ....लेना हो तो ले नहीं तो भाग यंहा से ... आज से साले बिहारियों पर भरोसा करना ही नहीं"सेठ ने दो टूक कहा ।

निराश मुन्नालाल ने सौ का नोट पकड़ा और चुपचाप वँहा से चल दिया। आखिर रिक्शा मालिक को  रिक्शे का किराया भी तो देना ही था ,अस्सी रूपये प्रति दिन। वह रिक्शा लेके धीरे धीरे रिक्शा मालिक के गैराज की तरफ चल दिया ।

"आज तो दिहाड़ी भी नहीं बनी, रिक्शे का रिम और टेढ़ा हो गया , अब रिक्शा मालिक इसके अलग पैसे काटेगा। आज क्या खाऊंगा ? होटल वाला उधार देगा की नही? "यही सब उसके मस्तिष्क में चल रहा था। मुन्नालाल बिहार के छपरा जिले का रहने वाला था , दसवीं तक किसी तरह पढाई की पर गरीबी ने आगे पढ़ने नहीं दिया । बिहार में रोजगार नहीं मिला तो दिल्ली आ गया था पिछले साल । अकेला कमाने वाला , बाप खेतिहर मजदूर छोटी दो बहनें जिनकीं शादी करनी थी । रिक्शा चला के पैसे घर भेजता हर महीने जिससे परिवार का पेट भरता था।

मुन्नालाल मन में  चिंता और उधेड़ -बुन लिए रिक्शा मालिक के गैराज पर पहुंचा । रिक्शा जमा कर किराया देके जैसे ही जाने लगा तभी रिक्शा मालिक की नजर रिक्शे के टेढ़े रिम पर पड़ी। उसने मुन्नालाल को आवाज लगाते हुए कहा
" इधर बे बिहारी..... साले फुद्दू बना के भाग रहा था ... रिम टेढ़ा कर लाया और बता भी नहीं रहा....निकाल इसके बीस रुपये "

मुन्नालाल ने चुप-चाप बिना कुछ कहे बचे हुए बीस रुपये निकाल के रिक्शा मालिक के हाथ में रख दिए और चलाने लगा।

" साले ये बिहारी चोर होते हैं..... ध्यान राखियों इसके रिक्शे का कंही कुछ गड़बड़ न कर के खड़ा कर जाए" रिक्शा मालिक ने पीछे से जोरदार आवाज में अपने लड़के को समझाते हुए कहा जिसे मुन्नालाल ने सुन लिया था।

"साले ये बिहारी चोर होते हैं....." ये शब्द मुन्नालाल के कानों में पिघले सीसे की तरह घुसते जा रहे थे। बिहारी शब्द एक गाली बन गई थी उसके लिए ..यही गाली तो दिन भर सुनता रहता है वह।
"बिहारी होना इतना बड़ा गुनाह है क्या?...मैं बिहार का हूँ तो इसमें मेरी क्या गलती....मैं चोर क्या चोर हूँ? अगर बिहार में रोजगार मिलता तो मैं यंहा इतनी दूर अपने परिवार को छोड़ के क्यों आता??"गुस्से और दुःख से उसने अपने आप से पूछा ,जिसका उसके पास कोई उत्तर नहीं था।

वह अभी कुछ दूर ही चला था कि एक दीवार पर लगे एक पोस्टर  पर पड़ी जिसपर लिखा था -
" बिहार दिवस की हार्दिक बधाई'

मुन्नालाल ने जब पोस्टर पढ़ते ही जैसे विक्षिप्त हो गया हो ..... उसने वह नोच लिया।

बस यंही तक थी कहानी.....

Friday, 16 March 2018

आयुर्वेद और ब्राह्मणिक विचारधारा-

जिन लोगों ने ब्रह्मणिक ग्रन्थो को पढ़ा होगा वे जानते होंगे की चकित्सको के बारे में कितनी घृणात्मक बाते की गई हैं। ब्राह्मण को चकित्सको के हाथों का छुआ अन्न तक लेना निषेध किया गया है। मनु महाराज तो यंहा तक कह देते हैं कि चकित्सक के हाथों का अन्न राद( मवाद) के तुल्य है।

देखें मनु स्मृति अध्याय 4, श्लोक 220 -' पुयं चिकित्सकस्यान्नं .....'

ऐसा ही मनु कई बार दोहराते हैं, देखें अध्याय 4, श्लोक 212में भी निर्देश देते हैं कि चिकित्सा कर्म में लिप्त व्यक्तियों का अन्न कदापि ग्रहण न करें।

गौतम धर्म सूत्र में भी ऐसा ही निर्देश दिया गया है कि ब्राह्मण को किसी शल्य चिकित्सक का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए ( अध्याय 17, श्लोक सात) ।

चिकित्सक पेशे से इतनी घृणा क्यों थी ब्रह्मणिक व्यवथा को? जबकि आज आयुर्वेद  को ब्रह्मणिक व्यवस्था इसे वैदिक बताने पर लगी हुई है। यह जानने से पहले मैं आपका ध्यान एक और महत्वपूर्ण चीज की तरफ खींचना चाहता हूँ । वह चीज है तर्क, तर्क या बहस को ब्रह्मणिक ग्रन्थों में निषेध किया हुआ है , कठोउपनिषद घोषणा  करता है - ' नैषातर्कण मतिरापनेया ....'  अर्थात तर्क से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता । महाभारत के अनुशासन पर्व में बड़े ही कठोर शब्दो में तार्किक लोगो की निंदा की गई है , उन्हें कुत्ता कहा गया है ( अनुशासन पर्व , 37-12,13) । गीता भी तर्क - बुद्धि को निषेध करती है । गीता भी यह घोषणा करती है कि संदेह ( तर्क) करने वाले के लिए कृष्ण को नहीं प्राप्त कर सकते बल्कि उनके लिए न तो लोग में और न परलोक में ही सुख है ( देखें अध्याय 4 , श्लोक 40)

आदि शंकराचार्य जिन्होंने गीता का भाष्य सर्वप्रथम किया था वे भी तार्किकों को जम के भला बुरा कहते हैं। शंकर के अनुसार तार्किक सींग पूँछ रहित बैल है ,प्रश्नोउपनिषद में शंकर ने तार्किकों को मांसाहारी पशुओँ के समान तक बता दिया है। शंकर ने उसी तर्क की मान्यता दी है जो श्रुति यानी वेदो के वाक्यों को समझने के लिए प्रयोग हो । उनके अनुसार तर्क वह ही है जो श्रुति ( वेद) पर आधारित है, यह तत्व है वह तत्व नहीं है , यह कर्ता है वह कर्ता है जैसा तर्क करने वाले तार्किकों का घोर तिरस्कार किया है ।

अब वापस लौटते हैं अपने मूल विषय पर , आयुर्वेद के दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं , चरक संहिता और सुश्रुत संहिता ।चरक संहिता कहती है कि अपनी बुद्धि से तर्क वितर्क कर औषधियों का प्रयोग करना चाहिए या कहें कि चिकित्सा के लिए इस बात की अति आवश्यकता है कि वैध तर्क वितर्क कर के ही दवाई का प्रयोग करे। शारीरिक चिकित्सको और तकनीकी  शिल्पकारों का विश्व दृष्टिकोण ही इस बात पर टिका होता है कि वे तर्कसम्मत और  वाद-विवादी हों।

हम जानते हैं कि चिकित्सक आमजनमानस के कितने उपयोगी होते  हैं अतः निश्चय ही अतीत उनका आम जनमानस में अच्छा खासा प्रभाव भी रहा होगा । इसलिए ब्रह्मणिक  अंधविश्वास और श्रद्धा सम्मत शास्त्रों  के प्रचार प्रसार में  चिकित्सक एक बड़ी बाधा रहे होंगे  । इसी लिए चिकित्सको के प्रति  धर्मशास्त्रों,स्मृतियों  आदि में लगातार घृणा के नजरिये से देखा गया । आयुर्वेद का ज्ञान मूल रूप से स्वतंत्र तर्क- वितर्क , देह महत्व और सांसारिक परिदृश्य के उद्भव और विनाश के 'स्वभाववाद ' पर टिका हुआ था जो की अंधविष्वास, आत्मवाद, वर्ण समर्थित व्यवस्था के पैरोकारों के लिए एक दम से निषेध थीं।

पुरोहित वर्ग की समस्या यह थी की चिकित्सा कर्म में सब लोगो से मेलजोल रखना पड़ता है ,चिकित्सक सबको स्पर्श भी करेगा और और सबसे मिलेगा भी जो ब्राह्मणवाद की व्यवस्था को बिलकुल भी रास नहीं आ सकता था । यह व्यवहार सेवाकर्मियों ( शूद्र/ अछूत) को काबू करने में बाधक था इसलिए ब्रह्मणिक व्यवस्था ने सबसे पहले चिकित्सा कर्म को निषेध किया।

अब एक प्रश्न आपके दिमाग में उपज रहा होगा की यदि आयुर्वेद वैदिक व्यवस्था की खोज नहीं थी तो किसकी थी? चिकित्सा का कार्य जब ब्राह्मण के लिए निषेध था तो आयुर्वेद उनके द्वारा प्रतिपादित कैसे हो सकता है?

इसका जाबाब खोजने के लिए हमें फिर से मनु महाराज की शरण में जाना होगा । मनु महाराज अध्याय दस ,श्लोक 46-47में  कहते हैं -

ये द्विजानामपसदा ...... वनिकपथ'

अर्थात-जो द्विजातियों में नीच हैं और जो अपध्वंस (वर्णसंकर) से पैदा हुए हैं , वे द्विजो के लिए निंदित  घोषित कर्मो को कर  के अपनी जीविका करें ।सूत का काम है रथ जोतना, अश्व साधना आदि, अम्बष्टो का कर्म चिकित्सा करना, स्त्री कार्य वैदेहक, और वाणिज्य कार्य मागध करें।

आपने देखा की चिकित्सा कार्य नीच कहे जाने वाले और वर्णसंकर जाति के  अम्बुष्टो के लिए निर्धारित किया गया , जिसका अन्न भी खाना ब्राह्मण के लिए मवाद के समान था।  कई इतिहासकार बताते हैं कि अम्बुष्ट भारत की एक जनजाति थी । निश्चय ही आयुर्वेद उन्ही की खोज थी जिसका बाद में ब्रह्मनिकरण हुआ ।

किन्तु ...किन्तु... एक और आश्चर्य की बात आपको बताता हूँ, ऋग्वेद में एक देवता अश्विन कुमार है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह चिकित्सक था जिसे बाद के शास्त्रों में अपवित्र घोषित कर के उसका स्थान नीचे कर दिया गया । मंडल दस में चिकित्सको का आभार भी व्यक्त किया गया  है। तब यह कैसे हुआ की  वेद में चिकित्सा देवता को बाद के ब्रह्मणिक ग्रन्थो में अपवित्र और वर्ण संकर  घोषित कर दिया गया?

दरसल जब वैदिक यंहा आये तो उन्हें यंहा के लोगो से युद्ध करना पड़ा था , वैदिक असुरों का युद्धों से ऋग्वेद भरा पड़ा है। इंद्र ने असुर नरेश शंबर के सौ नगरों को नष्ट किया आदि युद्धों के वर्णन है । असुरों से रक्षा के लिए प्रार्थनाएं भी की गई हैं। जाहिर सी बात है युद्ध में वैदिक भी घायल होते होंगे , ऐसे में उनको भी चिकित्सा की जरूरत होती होगी। वो अपने उपचार के लिये जनजाति अम्बुष्टो आदि की सहायता लेते होंगे , अतः ऋग्वेद जो प्रारंभिक काल था उसमें उनकी प्रशंसा की गई। बाद के काल में जैसे जैसे ब्रह्मणिक व्यवस्था मजबूत होती गई होगी चिकित्सकों ( अम्बुष्टों) की जो की मूल रूप से जनजाति थे उनकी स्थिति वर्ण व्यवस्था के अनुसार नीचे गिरती गई होगी अंत में  वे अपवित्र घोषित कर दिए गए होंगे। आयुर्वेद  शुद्ध भौतिकतावाद है जिसमे देह - काया का महत्व है जिसमे आत्मा - ईश्वर का कोई स्थान नहीं होता ,  आप सब को बताने की जरूरत नहीं की भारतीय भौतिकतावादी दर्शन किसका था ।हाँ बाद में ईस
का ब्राह्मणीकरण हुआ ....

Friday, 9 March 2018

पेरियार- जानिए कुछ पहलुओं को

पेरियार कपोल कल्पित देवी देवताओं और ईश्वर को नहीं मानते थे , कई बार इस पर वे पण्डे पुजारियों से जम के बहस करते। 19 वर्ष की आयु में नागम्मई नामक कन्या से विवाह हो गया ।विवाह के बाद परिवार की अन्धविश्वसी परम्पराओं का वे खुल के विरोध करने लगे, व्रत वाले दिन वे जानबूझ के अपनी पत्नी से स्वादिष्ट पकवान बनवाते ,खुद भी खाते और अपनी पत्नी को भी खिलाते। अपनी पत्नी को मंदिर नहीं जाने देते थे , घर पर अपने अछूत कहे जाने वाले मित्रों को बुला अपने साथ भोजन करवाते। घर में इस बात को लेके बहुत बखेड़ा होता पर पेरियार अपनी आदतों को नहीं बदलते थे । एक बार उन्होंने अपनी पत्नी का मंगलसूत्र/ हँसुली/ सुहाग चिंन्ह उतरवा दिया जिससे उनके परिवार वालों और उनमे काफी कहा सुनी हो गई , नाराज पेरियार घर से भाग गयें और कलकत्ता , बनारस आदि तीर्थ स्थानों का भ्रमण करते रहें। साधू महात्माओं के साथ उन्होंने काफी समय बिताया ,जीवन के खट्टे मीठे अनुभव लेते रहें । फिर संयासी जीवन की हकीकत जान के उससे मोहभंग हुआ तो वापस घर आ गए और पिता जी के साथ व्यापार में हाथ बंटाने लगें।

इसके बाद वे नगर पालिका के चेयर मैन बने।जिस समय पेरियार इरोड नगर पालिका के चेयर मैन थे उस समय राजगोपालाचारी सलेम नगर पालिका के चेयर मैन थे । पेरियार की संगठन क्षमता को देख के राजगोपालाचारी ने उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने ने स्वीकार कर लिया क्यों उस समय कांग्रेस के घोषित उद्देश्य स्वतंत्रता प्राप्ति ,अछूतोंउद्धार , नशाबन्दी व आर्थिक सुधार उनकी विचार धारा से मेल खाते थे।

उस समय कांग्रेस का दक्षिण में प्रभाव नहीं था , पेरियार की संगठन क्षमता ने कांग्रेस को नया बल दिया । पेरियार का भाषण सुनने लाखो लोग खींचे चले आते थे। गांधी के असहयोग आंदोलन में निष्ठा से साथ दिया। उसके बाद गांधी ने जब नशाबन्दी का आंदोलन चलाया तो पेरियार ने अपनी जमीन पर लगे हजारो ताड़ के पेड़ों को कटवा दिया था क्यों की उनसे नशीली ताड़ी निकली जाती थी । अंग्रेजी अदालतों का बहिष्कार करने के लिए उन्होंने उस समय पचास हजार के प्रोनोट जला दिए थे जो की उस समय एक बड़ी राशि मॉनी जाती थी।

पेरियार के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना वाइकोम की मानी जाती है।

त्रावनकोर कोचीन के राजा ने बाइकोम में मंदिर बनवाकर  ब्राह्मण पुजारियों को दे दिया था , पुजारियों ने मंदिर के पास के रास्ते पर अछूतों के चलने पर प्रतिबंद लगा दिया तो अछूत अपने गाँव की बस्ती में नजरबंद हो गए क्यों की मुख्य सड़क मंदिर के बगल से होके ही जाती थी जिस पर उनके चलने पर प्रतिबंद लगाया जा चुका था।

उसी मंदिर में राजा की अदालत भी लगती थी ,एक।केस में इजवा जाति जो अछूत जाति थी उस जाति के वकील माधवन को एक केस के सिलसिले में राजा की अदालत में जाना पड़ गया इस पर पुजारियों ने माधवन को मारने पीटने के अलावा बहुत अपमानित करा। इस घटना को लेके केरल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के पी मेनन और उपाध्यक्ष जार्ज जोसेफ ने विरोध किया और आंदोलन आरम्भ किया तो राजा ने उन्हें जेल में डाल दिया।

अतः उन्होंने जेल से ही पेरियार को वाइकोम आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की।  पेरियार ने जब छुआछूत के विरुद्ध आंदोलन तेज किया तो उन्हें भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया । इसके बाद इस आंदोलन की कमान उनकी पत्नी और बहन कन्नमल , एस रामनाथन ने संभाली । यह आंदोलन इतना प्रचंड हुआ की राजा को घबरा के सभी लोगो को रिहा करना पड़ा। इसके बाद पेरियार जननायक बन के उभरे।

शमी देवी जिला तिरुनेवेली में आर्य पम्परा के नाम पर गुरुकुल की स्थापना हुई जिसमें पेरियार कोषाध्यक्ष थें। इस गुरुकुल का उद्देश्य था धार्मिक शिक्षा, समाज सेवा और राष्ट्रीय भावना जागृत करना। इस गुरुकुल में दान देने वाले अधितर छोटी जाति से आते थे परंतु प्रबंध सिमित में मुख्यतः उच्च वर्ण के ही लोग थें। गुरुकुल में छोटी जाति के छात्रों से बहुत भेदभाव होता था यंहा तक की उनके लिए खाना भी घटिया किस्म का बनाया जाता था जबकि उच्च जाति के छात्रों को अच्छा खाना दिया जाता ।

पेरियार  ने जब इस भेदभाव का विरोध किया तो उच्चवर्णीय समिति के प्रबंधकों को नागवार गुजरा किन्तु भेदभाव की नीति बंद नहीं हुई तो पेरियार ने सभी दानकर्ताओं से दान ना देने की अपील की ।परिणामस्वरूप गुरुकुल बंद हो गया ,इससे चिढ के उच्च वर्णीय लोगो ने  राजगोपालाचारी से पेरियार को कांग्रेस से निष्कासित करने की अपील की किन्तु  भारी समर्थन होने के कारण उनकी अपील रद्द कर दी गई ।

परन्तु उस समय कांग्रेस में जो निर्णय लिए जाते वे अधिकतर उच्च वर्ण के लोगों के हितों को ध्यान में रख के लिए जाते थे और निम्न वर्ण के लोगो के विरुद्ध होते थे। अतः उन्होंने नौकरियों और विधान सभा में निम्न जाति के लोगो के लिए आरक्षण की मांग उठाई जिसका ब्राह्मण वर्ग ने जम के विरोध किया। 1925 में जब कांचीवरम कांग्रेस अधिवेशन में पेरियार ने दुबारा यह मांग उठाई तो उन पर ईंट पत्थरो से जानलेवा हमला कर दिया गया। उसी समय पेरियार को यह अहसास हो गया था कि तमिलनाडु कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष रहने के बाद भी उनकी स्थिति क्या है ,दरसल कांग्रेस का सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता जैसी बातें झूठी थीं । उस समय कांग्रेस की आड़ में उच्च वर्णीय लोग अपना एजेंडा सेट किये हुए थें। विधवा पुनर्विवाह, बाल विवाह पर रोक, मंदिरों पर एकाधिकार समाप्त हो,छुआछूत को कानूनी अपराध माना जाए  जैसे अनेक मुद्दे थे जिनको लेके पेरियार कांग्रेस के ध्यान ने देने पर नाराज थे।

कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने रूस, जर्मनी, फ्रांस आदि देशों की यात्रा की और वँहा की राजनैतिक तथा सामाजिक संरचनाओं पर काफी रिसर्च किया।

यात्रा से वापस आने के बाद पेरियार ने निम्न जातियो / आदिवासियों / पिछड़े को ब्रह्मणिक व्यवस्था से आजाद कराने के प्रयत्न में जुट गएँ।
कई पुस्तकें लिखी जिसमे 'सच्ची रामायण ' प्रमुख रही । उनका मानना था की रामायण दरसल आर्यो(वैदिकों)  का द्रविणो पर आक्रमण की कहानी है। वे मानते थे की दलित/ आदिवासी/ पिछड़े आदि निम्न जातियों की दुर्दशा का कारण धर्म और ईश्वर की कल्पना है जिसके सहारे सदियों से उच्च वर्ण के लोग शोषण कर रहे हैं।

उनके मुख्य उद्देश्य थे-

ईश्वर नाम की कल्पना और धर्म की समाप्ति।
ब्राह्मणवाद की समाप्ति।
कांग्रेस और गांधीवाद की समाप्ति ।
सामजिक बुराइयों की जड़ से समाप्ति और एक आदर्श समाज की स्थापना ।


उच्च जाति के लोगो द्वारा निम्न जाति पर हो रहे अत्याचार और हमलों को रोकने के लिए पेरियार ने स्वाभिमान अन्दोलन चलाया था जो बाद में द्रविण कजगम पार्टी के नाम से जाना गया।

वे हमेशा काली कमीज पहनते थे ,इसलिए कई पत्रकारों ने उनके आंदोलनों को ' काली कमीज आंदोलन' भी कहते थे। उनकी काली कमीज व्यवस्था परिवर्तन का सूचक थी।


Sunday, 21 January 2018

शिव और सींग-

 डाक्टर तुलसीराम जी ने अपनी आत्मकथा ' मुर्दहिया' में अपनी दादी व गाँव की कुछ अन्य बुजुर्ग महिलाओं द्वारा एक पुरानी परम्परा का उल्लेख किया है। उनकी दादी व गाँव की अन्य बुजुर्ग दलित महिलाओं के पास मरे हुए बैलों आदि डांगरो के खाली सींग होते थे जिसमें वे सुई धागा, बटन, रेजगारी, जड़ी- बूटी  आदि छोटी छोटी वस्तुओं को संभाल के  रखती थीं।  पशुओँ के मरने के बाद उन्हें जंगली पशुओँ,गिद्धों आदि के खाने से पहले काट लिया जाता था और अच्छी तरह साफ कर के उनमे छोटी छोटी वस्तुओं को रखने के काम में लिया जाता था।


तुलसीराम जी ने बताया कि उन्हें बाद में पता चला की सींगों में सामान रखने की परंपरा की शुरुआत बौद्ध धम्म में हुई थी । त्रिपिटक में वर्णन है कि गोतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के करीब सौ साल बाद वैशाली में  विद्वान भिक्षुओं की दूसरी महासंगीति अर्थात बुद्ध के उपदेशों का संगायन हुआ तो उसमें बुद्ध के दस उपदेशों में संसोधन किये गए थे । जिसमें से की पहला ही संसोधन की भिक्षा के समय जानवरन की एक खाली सींग में नमक ले जाना । विनय पिटक में किसी भी बौद्ध भिक्षु को किसी प्रकार की खाद्य सामग्री या धन संचय करना निषेध था । इस संसोधन का मूल कारण यह था कि भिक्षा में अकसर नमक नहीं मिलता था, अतः भिक्षु लोगो को बिना नमक के ही खाना बना के खाना पड़ता था । इस व्यवहारिक समस्या से बचने के लिए यह संसोधन किया गया था । ताकि भिक्खु नमक मांग कर या खरीद कर सींग में रख  सके , सींग में संचय कर के रखने के पीछे भी यह कारण था कि वह मूल्यवान नहीं होती थी जिससे  भिक्खु उसे रख सकता था । तभी से सींग में संचय करने की यह बौद्ध परम्परा जारी हुई। तुलसीराम जी अपनी दादी द्वारा सींग में दवाइयाँ, सुई धागा , बटन आदि संचय करने की परंपरा से यह दावा करते हैं कि निश्चय ही  सदियों पूर्व उनके पूर्वज बौद्ध रहे होंगे।

जब तुलसीराम जी द्वारा वर्णित यह घटना पढ़ रहा था तो मेरे भी मस्तिष्क में बचपन की  कुछ पुरानी यादें ताज़ा हो गईं जिसको मैंने अपने गाँव में  देखा था। गाँव में कई घर थे जिनके यंहा सींग टंगे होते थे , एक सींग हमारे घर भी था जिसमे सुई धागा या दवाइयां तो नहीं नीम की पत्तियों की डंठले सुखा के रखी रहती थी । ये सूखी डंठले दांत खोदने( टूथपिक) के काम में लाई जाती थीं।
अतः, निश्चय ही हमारे पूर्वज भी कभी बौद्ध ही रहे होंगे और सींगों के प्रयोग की परंपरा उन्ही से आई होगी। यह बात मुझे अब पता चली है, अब यह परम्परा लुप्त हो गई है ।

अच्छा! अब एक महत्वपूर्ण बात , शिव तथाकथित हिन्दू देवता कहलाये जाते हैं किंतु वे काल्पनिक  हिन्दू देवता नहीं रहे होंगे बल्कि कभी बौद्ध परम्परा के रहे होंगे जिनका बाद में ब्रह्मणिकरण किया गया , शायद ऐसा उनकी आम जनमानस में पूजनीय मान्यता के कारण करना पड़ा होगा ब्राह्मणों को । ऐसा हुआ होगा की बौद्ध से हिन्दू बन जाने के बाद भी बड़ी संख्या में खासकर शूद्रों और निचली जातियों में' सिउ' यानी बौद्ध शिव को पूजना जारी रहा होगा , तभी शिव का वैदिकरण किया गया।

आप सब सोच रहे हैं कि मेरे इस दावे का स्रोत क्या है ? मैं ऐसा  दावा क्यों कर रहा हूँ की शिव  अर्थात 'सिउ' बौद्ध रहे होंगे?

मेरे इस दावे का कारण है शिव के गले में लटका सींग, बैसे ही सींग जैसा बौद्ध भिक्खु द्वितीय महासंगीति में हुए नियमो के संसोधन के बाद अपने पास नमक को संचय करने के लिए रखते थे । बाद में यह परम्परा हमारे पूर्वजो तक में रही।

शिव के गले में लटका नमक संचय करने वाला खाली सींग इस बात का प्रमाण है कि वे बौद्ध परम्परा से रहे होंगे जिनका बाद में ब्राह्मणीकरण हुआ ।

नोट- आप शिव के गले में लटका सींग देख सकते हैं।