Thursday, 14 September 2017

जानिए हिंदी का इतिहास- हिंदी दिवस विशेष

 हिंदी ....प्यारी हिंदी, कभी कभी सोचता हूँ की यदि हिंदी न होती तो क्या होता? इस मीठी सी ज़बान जिसमे खड़ी बोली भी है...उर्दू की नज़ाकत भी है ...पालि / प्रकृत के अपभ्रंश भी है  संस्कृत / अरबी के कठिन शब्द भी है अर्थात प्राचीन से लेके नवीन सभी भाषाओं को एक साथ पिरोने वाली  हिंदी न होती तो हम आज अपने विचारों को शब्दो का वह धरताल न दे पाते जो आज हम आसानी से दे पाते हैं।

तो चलिए, आज हिंदी दिवस के मौके पर हम अपनी प्यारी भाषा हिंदी के बारे में ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा ही सही जानने का प्रयास करते है ।

हिंदी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में बहुत सी धारणाएं प्रचलित है जिसमे से  अधिकतर भाषा वैज्ञानिकों का दावा  है कि हिंदी का उद्भव दसवीं सदी के आस पास का है । अपभ्रंश शब्द की व्युत्पति और धम्म/ जैन रचनाकारो की अपभ्रंश रचनाओं से हिंदी के इतिहास का सम्बन्ध बताया जाता है । इसलिए, प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से हिंदी भाषा का उद्भव स्वीकार किया जाता है । प्राकृत के अपभ्रंश से सातवीं -आठवी सदी में पद्य रचनाये प्रारम्भ हो गई थीं।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह निर्णय करना कठिन है कि हिंदी भाषा का निश्चित तौर पर  प्रयोग कब किस जगह हुआ परन्तु इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में इसका प्रयोग खुसरो जैसे  मुसलमानो कवियो ने किया , हिंदी शब्द का अर्थ उनके लिए भारतीय भाषा था । आज हिंदी भाषा लगभग पूरे उत्तर भारत की मुख्य भाषा बन चुकी है।

वैसे यह कहा जाता है कि उर्दू हिंदी की जननी है किन्तु यह पूर्णतः गलत है, उर्दू का जन्म भी नहीं हुआ था तब से हिंदी प्रचलन में रही है। हिंदी की तीन शैलियां है , पहली ब्रजभाषी (शौरसेनी) शैली, दूसरी राजस्थनी और तीसरी खड़ी बोली।

हरिषेण ने अपनी' धम्म परिक्खा ' प्रकृत के अपभ्रंश के तीन कवि माने है ,  चतुर्मुख,स्वंभू और पुष्पदन्त हलाकि की स्वंभू के छोड़ के अन्य का कोई ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है । स्वंभू ने अपनी प्रकृत अपभ्रंशिय रचनो को 'पद्वडिया' कहा था  , स्वंभू दसवीं सदी के राजा कर्ण सभा में कवि थे ।

दसवीं सदी में धनपाल नामक जैन कवि हुए जिन्होंनेअपनी अपभ्रंश रचनाओं को 'भविसयत्त ' कहा । उसके बाद कई जैन कवि हुए चरित काव्य प्रसिद्ध हुए जैसे सुदर्शनचिरायु ।


आठवीं - दसवीं सदी  में बौद्ध परम्परा से निकले सिद्धों और नाथों का बोलबाला रहा , यह वक्त था जब सिद्ध/ नाथ परम्परा से निकले मछेंद्रनाथ( मत्स्येन्द्र) और गोरक्खनाथ( गोरखनाथ ) का समय था । सिद्धों /नाथों काव्य की शैली सहजयानी की शैली रही है जिससे लगता है कि सिद्ध और सहजयानी कभी एक ही परम्परा से निकले थे। दसवीं सदी के  कश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त ने मच्छनाथ विभु की वंदना की है ,गोरखबानी प्रकृत अपभ्रंशसिय रही।

नरपति नाल्ह की बीसलदेवरासो ,हम्मीर रासो, पृथ्वीराज रासो जैसे काव्य बेशक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक न हो किन्तु हिंदी के उद्भव में महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

इतिहासकारो के अनुसार हिंदी के वास्तविक जनक अमीर खुसरो कहे जाते हैं,उनकी रचनो में तात्कालिक प्रचलित  खड़ी बोली को हिंदीकाव्य भाषा में  प्रयोग किया गया जिससे हिंदी प्रतिष्ठित हो पाई।सबसे पहले ख़ुसरो ने दिल्ली के आस पास प्रचलित खड़ी बोली को साहित्यक सर्जन का काम किया । उस समय मुसलमान अपनी कवितायेँ फ़ारसी में तो हिन्दू अपनी संस्कृत में सिद्ध / नाथ संत  अथवा जैन डिंगल या अपभ्रंश में । अमीर खुसरो ने इनसे इतर प्रचलित जन भाषा हिंदी में अपनी रचनाएं की और उर्दू के लिए रहा खोल दी।

यही नहीं ख़ुसरो के सच्चे भारतीय थे उस का उल्लेख अपनी मसनवी में 'नुहे- सिपह्न' ( नौ आकाश) में भारत की प्रशंसा की है जो की उस समय सल्तनत की साम्प्रदायिक नीतियां भारत के खिलाफ थी पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की । मुसलमान भारत के प्रति अपनी भक्ति अर्पित करें यह बात उस समय मुस्लिम समाज में अच्छी नहीं समझी जाती थी। उस समय भारत को दारुल -हरब कहा जाता था।
ख़ुसरो की दोहे, मुकरनियां , पहेलियां खूब प्रसिद्ध हुए , ख़ुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । जब निजामुद्दीन की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी पीड़ा एक दोहे में व्यक्त की जो आज तक प्रसिद्ध है-

गोरी सोवत सेज पर ,मुख पर डाले केस।
चल ख़ुसरो घर आपनो, रैन भई सब देस।।

हिंदी को आगे ले जाने में निर्गुण और सगुण काव्यधाराओं ने भी बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। निर्गुनिया संतो ने तो ख़ासकर क्यों की कबीर ,रैदास जैसे संतो की भाषा ही जनभाषा थी । कहा यह जाता है की निर्गुणसंत काव्य धारा सिद्धों/ नाथों और जोगियो से निकली है जो कभी बौद्ध थे ।

हिंदी निर्गुण संत काव्यधारा के प्रमुख संत कबीर हुए,
कबीर जुलाहा जाति के थे , कबीर सिद्ध परम्परा से आते थे जिनके पूर्वज निम्न जाति के थे और हाल ही में मुसलमान बने थे । इतिहासकारो का मानना है कि कबीर के पूर्वज अस्पृश्य कोरी जाति के थे , कोरी जाति ही मुस्लिम जुलाहे बनते थे।

अपनी रचनाओं से पाखण्ड, अंधविश्वास , जातीय भेद भाव , ब्रहामणिक विधानों या मज़हब के आडम्बरो पर जितना कबीर ने प्रहार कियाहै  उतना किसी ने नहीं किया । यह दिगर की बात थी की अनपढ़ कबीर के ज्ञान के आगे बड़े बड़े मुल्ला पंडित कंही नहीं ठहरते थे। कबीर कहते हैं-

हिन्दू कहत है राम हमारा ,मुसलमान रहमाना
आपस में दोउ लड़े मरत है भेद न कोई जाना।।

प्रेम सिर्फ ईश्वर भक्ति नहीं है बल्कि वह अपने आप में स्वतंत्र मूल्य रखता है इस अनुभूति की पहली हिंदी कविता कबीर ने ही लिखी है-

प्रेम न बारी उपजै, प्रेम न हाट बिकाये,
राजा परजा जेहि ,सीस देई ले जाए।
यह तो घर है प्रेम का ,खाला का घर नाहि,
सीस काटि भुइयां धरो, तब पैठो घर माहिं।
सीस काटि भुइयाँ धरो, ता पर राखों पाँव,
दास कबीरा यों कहैं, ऐसा हो तो आव।

प्रेम की इतनी पीड़ा की अनुभूति की जो भंगिमा कबीर सहज भाव से कहते हैं उतनी अनुभूति आज तक नहीं रची गई।हाँ , मीरा कुछ वँहा तक पहुँचती हैं मीरा कहती हैं-

बिरिहन भुअंगम तन डसा ,किया करेजे घाव
बिरिहिन् अँग न मोडिया ,जित चाहो तित खाव।

यंहा थोड़ा दक्खिनी हिंदी का जिक्र करना जरुरी होगा,दक्खिनी हिंदी का अर्थ दक्षिण की हिंदी नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि से इतिहास में इस क्षेत्र को दखन कहा जाता रहा है और इसके अंतर्गत महारास्ट्र , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कई क्षेत्र आते हैं।भाषा शास्त्रियों के अनुसार खड़ी बोली को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया है । राहुल सांस्कृतयायन के अनुसार खड़ी बोली हिंदी के कवि सबसे पहले दक्खिनी कवि ही थे ,दक्खिनी कवियों में अधिकतर सूफ़ी मत के कवि रहे हैं जिनमे की जानम( 1582) गेसू दराज( 1343) जैसे प्रमुख रहे हैं । डाक्टर सुनीत कुमार चाटुजर्या लिखते हैं कि 1690 में औरंगजेब दक्खिन में था तब बंगाल के एक मुसलमान प्रवास करता हुआ उससे मिलने आया । उसने बादशाह से कहा कि वह उसे अपना मुरीद बना लें तब औरंगजेब ने देशज पद्य की पंक्तियां कह के उसे फटकारा-

टोपी लेंदे, बावरी देंदे , खरे निलज्ज।
चूहा खान्दा बावली, तू कल बंधे छज्ज।।

औरंगजेब घोर साम्प्रदायिक है किंतु उसके मुंख से हिंदी शब्द निकलते हैं ।

दोस्तों,हिंदी का एक लंबा आए समृद्ध  इतिहास रहा है जिसको इस छोटे से लेख में वर्णन करना नामुमकिन है इसके लिए पोथियाँ कम् पड़ जाएँगी ।अतः इतने पर ही विराम देना चाहूंगा।

हिंदी का इतिहास बौद्धों, जैनियों, सिद्धों/ नाथों / जोगियो से होता हुआ हम्मीर,ख़ुसरो, रासो, विद्यापति, कबीर, रविदास, मीरा ,गुरुनानक, धर्मदास, मुहम्मद जायसी, उस्मान, रसखान, रहीम, तुलसीदास, हरिदासी(सखी संप्रदाय) , सूरदास,गोबिंदस्वामी, नरहरि, मुबारक, भूषण, भिखारीदास, खुमान, दरिया साहिब, पलटू दास, तथा आधुनिक काल के हिंदी साहित्यकारों / नाटककारों तक पहुंचा जिन्होंने इसे नई ऊंचाइयां दी ।जिनमे कुछ आधुनिक हिंदी साहित्यकारों के नाम इस प्रकार है -

भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्ववेदी,मैथलीशरण गुप्त, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, हरी शंकर परसाई, राहुल सांस्कृत्यायन, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य हजारी प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, डी डी कौशाम्बी, अमृतलाल नागर, मुक्ति बोध, धर्म वीर भारती, नागार्जुन, रेणु, भीष्म साहनी, रामव्रक्ष बेनी पुरी, मुद्राराक्षस, रंगेय राघव, पुष्पा मैत्रीय,रामविलास शर्मा,उषा प्रिवन्दा,  ओमप्रकाश वाल्मीकि,माधव मुक्तिबोध, शिवदान सिंह चौहान, हमीदुल्ला, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शरद जोशी, तुलसी राम( मुर्दहिया) , राजेंद्र प्रसाद सिंह( सासाराम कालेज) , कँवल भारती जैसे अनगिनत हिंदी साहित्यकार शामिल हैं। जिनका नाम याद नहीं रहा उन से विनम्र क्षमा चाहता हूँ, यदि पाठक गण चाहे तो नाम वे अन्य नाम सुझाव कर सकते हैं।


आप सभी को हिंदी दिवस की ढेरों बधाइयाँ...आशा है कि हिंदी यूँ ही बढ़ती रहेगी और जन जन तक फैलती रहेगी ...



Saturday, 26 August 2017

धंधा- कहानी


शहर से दूर एक निर्जन और वीरान जगह पर एक मंदिर और एक मजार थी, जिस रास्ते पर यह मजार और मंदिर था उस के आस पास बहुत घना जंगल था जिस कारण लोग बाग़ बहुत कम उधर से गुजरते थे केवल चरवाहे जंगल में अपने पशु चराने सुबह शाम उधर से जाते थे वीरान मंदिर को देख कर कई साल पहले वंहा एक बाबा ने अपना डेरा जमा लिया था । बाबा दिन भर गाँव गाँव और शहर जाके भीख मांगता था , उसे पैसे के अलावा आंटा दाल तेल आदि भी खूब मिलता था जिसे वह अपने खाने के लिए बचा के बाकी का बेंच देता था जिससे अच्छे पैसे भी मिल जाते थे ।

मंदिर के साथ जो मज़ार थी उसमे भी एक फ़कीर ने अपना डेरा जमा लिया था , वह भी गाँव गाँव- शहर  जाके भीख मांगता और अच्छी आमदनी करता ।
शाम को बाबा और फ़कीर दोनों मिलते पर एक दूसरे से बोलते नहीं थे , फ़कीर जब बाबा को देखता तो अल्लाह तौबा कह के मुंह फेर लेता और जब बाबा फ़कीर को देखता तो राम राम किसका मुंह देख लिया कह के मुंह फेर लेता। यह क्रिया कई  सालो तक चलती रही , बाबा और फ़कीर दोनों भीख मांगते और अपने लिए बचा के शेष बेंच देते ।
पर बीते कुछ सालो से दोनों को भीख मिलना कम हो गया था , दिन बहुत कठिनाई से गुजर रहे थे दोनों के पर अब भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं करते थे ।
कुछ महीने और बीत गए , अब दोनों को भीख मिलनी लगभग बंद सी हो गई थी ।

बाबा शरीर सूख के काँटा हो गया था , एक दिन शहर से भीख मांगते हुए वापस आते हुए बहुत थक गया पर झोली खाली थी । थक के वह मंदिर के चबूतरे पर सुस्ताने के लिए बैठ गया, तभी मज़ार पर रहने वाला फ़क़ीर भी शहर से भीख मांग कर वापस आ गया , उसके भी गाल पिचके हुए और शरीर पतला हो गया था लगता था की कई रोज से भरपेट खाना नहीं मिला था। झोला उसका भी खाली था ।
दोनों ने एक दूसरे को देखा पर इस बार पता नहीं क्या समझ के फ़कीर ने बाबा से ' आदाब' कह दिया और उसी चबूतरे पर बैठ गया । बाबा ने भी प्रतिउत्तर में राम राम कहा । जंहा सम्पनता में वे दोनों एक दूसरे का मुंह तक नहीं देखना पसंद करते थे वंही भूख और लाचारी ने दोनों को पास ला दिया था ।


फ़क़ीर ने बाबा की तरफ देखते हुए कहा" क्या बात है ? बहुत कमजोर लग रहे हो "
बाबा ने फ़कीर की बात सुन के एक ठंडी आह भरी और कहा " क्या बताऊँ भाई , कई दिनों से आधे पेट खा के गुजरा कर रहा हूँ । गाँव गांव भटकने के बाद भी भीख नहीं मिलती है , शहर में भी अब कोई एक रुपया भी नहीं देता,  बड़ी मुश्किल से दस बीस रूपये हो पाते हैं और मुट्ठी भी आंटा । जाने लोगो को क्या हो गया है ,कोई भी भगवान् के नाम पर भीख देने को राजी नहीं है ।

फ़कीर ने कहा - यह बात तुम बिलकुल सही कह रहे हो , अपना भी ऐसा ही हाल है । कोई भी अल्लाह के नाम पर पैसा देने को तैयार नहीं । गाँव में जाओ तो लोग बच्चों के हाथो से आधी कटोरी आंटा भेज देते हैं जिससे खाने भर का भी पूरा नहीं हो पाता।

बाबा ने आगे कहना जारी रखा- हाँ,लगता है की सभी नास्तिक हो गए हैं । पहले कितना मिलता था , कितना दान करते थे लोग की खाने के अलावा बहुत सा बेंच भी देते थे जिससे नगद पैसा भी बहुत आ जाता था , शाम के लिए शराब का  इंतेजाम भी आराम से हो जाता था ।

फ़क़ीर ने कहा - सही कहा , मैंने भी कई दिनों से चिलम नहीं लगाई , महंगाई इतनी हो गई है की लोगो ने खैरात देना बंद सा कर दिया है ।
बाबा ने कहा - ऐसे तो हम भूखे मर जायेंगे
फ़क़ीर ने कहा - हाँ कुछ उपाय करना पड़ेगा ताकि आमदनी आये
बाबा बहुत देर तक गंभीर मुद्रा में आँख बंद कर के सोचता रहा , फिर उसने आँखे खोली तो कहा की हम थक गए हैं लोगो के दरवाजे दरवाजे जा जा के अब उपाय ऐसा करना पड़ेगा की लोग हमारे पास आये । फ़क़ीर ने सहमति से सर हिलाया।
बाबा ने फ़कीर के कान में बहुत देर तक कुछ समझता रहा , फ़कीर बीच बीच में सहमति में  सर हिलाता रहा।

दो दिन बाद चरवाहे जब अपने पशु को लेके उस मंदिर के पास से गुजरे तो उन्हें बहुत अच्छी खुसबू हवा मे महकती हुई महसूस हुई ,वे जिज्ञासा वश खुसबू के स्रोत की तरफ चल दिए । उन्होंने देखा की मंदिर के परिसर में एक लंगोटी पहने बाबा ध्यान मुद्रा में बैठा है । उसके चारो तरफ धुनि जल रही है और खुसबू उसी में से आ रही है । चरवाहो ने सोचा की कोई बड़ा साधू है और वे श्रद्धा वश वंही बैठ । थोड़ी देर बाद बाबा ने आँखे खोली और सब पर जल छिड़कता हुआ मन्त्र बुदबुदाने लगा । बाबा ने जल की कुछ बुँदे सामने बने ताजाबने  कुण्ड में रखी टुकड़े की हुई लकडियो पर डाला ।

जल पड़ते ही कुण्ड की लकडियो में आग लग गई । चरवाहों ने जब यह दृश्य देखा तो वे बाबा को कोई सिद्ध पुरुष समझ के उसके कदमो में लोट गए । चरवाहों ने बाबा से पूछा की आप कौन हैं ?
बाबा ने उत्तर दिया की वह अब से पहले हिमालय की गुफाओ में तपस्या कर रहा था और कल ही यंहा आया है ,लोगो की मन की मुरादे पूरी करने के लिए ही वह अपनी तपस्या छोड़ के आया है "

चरवाहे बाबा की जय जयकार करने लगे और तुरंत अपनी गाय से दूध दुह के बाबा को भेंट कर दिया । बाबा ने दूध पीते हुए कहा की पास वाले मजार पर भी एक पंहुचा हुआ औलिया आया है जा के उसके भी दर्शन कर लो । जाते वक्त चरवाहों ने श्रद्धा वश एक दो रुपया बाबा को चढ़ा दिया ।

बाबा की बात सुन के सब चरवाहे मजार पर पहुच गए , उन्होंने देखा की एक हरे कपड़ो में बाबा बैठ है जिसके सामने रखे एक कटोरे में  लोबान जल रही है । लोबान से मनमोहक सुगंध आ रही है । फ़क़ीर ने भी चरवाहों को देखा तो अपने पास पड़े लौटे से पानी की अंजलि भरी और लोबान वाले कटोरे में कुछ बड़बड़ाते हुए छिड़क दिया । लोबान की आग  बुझने की वजाय और भड़क गई । चरवाहों का आस्चर्य का ठिकाना न रहा उन्हें फ़कीर के पैर छूते हुए परिचय पूछा । फ़कीर ने बताया की वह शिरडी से सीधा यंहा आया है और लोगो के ऊपर से जिन्न ,भूत प्रेत आदि की बाधा दूर कर के उन्हें धन दौलत से मालामाल कर देता है।
बस फिर क्या था फ़कीर के लिए भी तुरंत दूध का इंतेजाम हो गया और चरवाहों ने एक रूपये दो रूपये अपनी समर्थता के अनुसार फ़क़ीर के चरणों में रखते गए ।

अगली सुबह पास के गाँव के  दर्जनों लोग बाबा और फ़कीर के दर्शनों के लिए पहुच चुके थे , सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार फल,मिठाइयां  और कुछ दान दक्षिणा दे रहे थे ।
एक सप्ताह भी नहीं बीता ही दसियों गाँवो के लोग बाबा के मंदिर और फ़कीर के माजर पर मत्था टेक चुके थे । हिन्दू लोग मंदिर में भजन कीर्तन करते तो मुस्लिम लोग मजार पर चादर चढ़ा के और कब्बाली गाते । बड़ी संख्या में लोग मंदिर और बाबा की सेवा में लगे रहते ।
इधर मुस्लिम लोग मजार और फ़कीर की सेवादारी नहीं करते थकते ।

कुछ ही महीनो में मंदिर और मज़ार शहर तक प्रसिद्ध हो गए , बड़ी बड़ी गाडियो में लोग बाबा और फ़कीर के दर्शन करने आते और मन्नते मांगते। खूब चढ़ाव आने लगा मंदिर और मजार में , प्रशासन को जब पता चला तो उसने वंहा बिजली का इंतेजाम करवा दिया मंदिर और मजार तक जाने के लिए पक्की रोड बन गई थी । बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से सवारी ढोने वाले वहां सीधा मंदिर और मजार तक जाने लगे । जंहादिन में भी लोग जाने से कतराते थे अब उस वीरान मंदिर मजार के आस पास बड़ी संख्या में  तरह तरह के समान की दुकाने खुल गई थी । हर दुकान से बाबा और फ़कीर का कमीशन बंधा हुआ था ।


पुरुष ही नहीं अब स्त्रियां भी बाबा और फ़कीर की सेवा में लग गई थीं , बाबा के पास हिन्दू औरतो की लाइन लगती जो सौतन से छुटकारा, पति काउनके प्रति  अप्रेम, बच्चा होने जैसी समस्याओ का निबटारा चाहती थी। तो दूसरी तरह मुस्लिम औरते भी यही समस्याएं लेके फ़क़ीर के पास आती।
बाबा और फ़कीर ने दान चढावे, दुकान का कमिशन  आदि का हिसाब किताब रखने के लिए तीन तीन मुनीम रख लिए थे । पचास साल के बाबा फ़कीर अब 30-35 साल के जवान लगने लगे थे ।

दिन ब दिन मंदिर और मज़ार के भक्तो की संख्या बढ़ती जा रही थी , एक दो कंस्ट्रक्शन कंपनिया अब मंदिर और मज़ार के आस पास की जमीनों पर फलैट बना के बेचने का विचार कर रहे थे और इसके लिए बाबा और फ़कीर को मोटी रकम कमीशन के तौर पर  अड्वान्स दे दी गई थी तथा तीन तीन फ्लेट्स मुफ़्त देने का वादा अलग से।

बस यूँ ही कहानी आगे बढ़ती रही ...



Thursday, 17 August 2017

पकवान- कहानी



माथे पर चन्दन का लम्बा तिलक लगाएं स्वामी जी ऊँचे मंच पर बैठे लोगो को आत्मा- परमात्मा पर प्रवचन दे रहे थे । कुछ क्षण रुक पास पड़े मिश्री और इलाइची के पात्र से कुछ मिश्री के टुकड़े और इलाइची उठा मुंह में डालते हुए फिर से प्रवचन देने लगे- भक्तो! कलियुग युग में जो व्यक्ति गुरुओं की सेवा करेगा, धर्म पुरुषो की सेवा करेगा, ब्राह्मण- गाय की सेवा करेगा , दान- पुण्य करेगा वह अपने समस्त पापो से मुक्त हो बैकुंठ धाम जायेगा...... वह स्वर्ग जा सभी सुखों का भोग करेगा.....जो यंहा जितना दान-पुण्य करेगा , धर्म पुरुषो की सेवा करेगा वह स्वर्ग में आन्नद ही आनंद का भोग करेगा उसकी आत्मा वंहा सभी सुख भोगेगी "

उनके प्रवचन पर जनता झूम झूम जा रही थी ,चारो तरफ भक्तिमय माहौल के साथ स्वामी जी के जयकारे गूंज रहे थे।

इसी तरह आत्मा द्वारा  स्वर्ग में अनगिनत  परालौकिक सुखो  के भोगने का आश्वासन दे स्वामी जी ने कुछ घंटे बाद अपने प्रवचन का समापन किया।

घुरहू हाथ जोड़े उठा और स्वामी जी से अपने घर भोजन के लिए आग्रह करने लगा।
घुरहू ने कहा -" महाराज! मेरी पत्नी ने आज  रसगुल्ले, इमरती, शुद्ध दूध की रबड़ी, बर्फी , देशी घी की पूड़ी- कचौड़ी, मोतीचूर के लड्डू, बादाम की खीर, पनीर की सब्जी ...और न जाने क्या क्या बनाया है ... आपस आग्रह है कि आज रात का भोजन मेरे घर कर मुझे कृतज्ञ करें"

स्वामी जी वैसे शायद मना कर देते किन्तु इतने सारे पकवानों का नाम सुन उनके मुंह में पानी आ गया अतः घुरहू का आग्रह ठुकरा न पाएं और चल दिए घुरहू के घर रात का भोजन करने।

घुरहू ने स्वामी जी के  भोजन के लिए साफ- सुधरा आसन बिछा दिया । स्वामी जी घुरहू की श्रद्धापूर्वक आव भगत देख के गदगद हुए जा रहे थे ।

स्वामी जी को आसन पर बैठाने के बाद घुरहू बोला -"महाराज ! जब तक भोजन नहीं आता तब तक कुछ वार्तालाप ही हो जाए....मैं भोजन के बारे में ही बता दूं" और इतना कह घुरहू आने वाले भोजन के बारे में बताने लगा ।
"कढ़ाई में छन-छन करता हूआ शुद्ध देशी घी जिसकी सुगंध ही व्यक्ति का मन मोह ले ,उसमे सिंकती हुई कचौड़ियां जिसमे भरे हुए है  बादाम- काजू , मुन्नका... आहा!... वो सफ़ेद शुद्ध चासनी में डूबे तेज भूरे रंग के गुलाब जामुन.... वाह!... वह गाय के खोये से बनी पिस्ता वाली बर्फी...... जिसपर करीने से काजू कात के लगाये गएँ हैं.... वाह!"

घुरहू स्वाद लेके खाने में एक एक व्यंजन की तारिफ कर रहा था ,तारीफ़ सुन स्वामी जी बेकाबू हो रहे थे  भूंख कंट्रोल से बाहर हुई जा रही थी। आँखों के सामने घुरहू के बताये व्यंजनो के दृश्य सजीव हो उनके इर्द - गिर्द नाचने लगे थे।

तकरीबन आधी रात होने वाली थी किन्तु घुरहू ने अब तक स्वामी जी के सामने भोजन नहीं परोसा था बस व्यंजनो की प्रसंसा किये जा रहा था-
" पहले धार के दूध की गाढ़ी खीर , खीर में केसर, बादाम से हल्का सुनहरा रंग .… वाह .. जैसे अमृत हो... और पनीर की सब्जी..." घुरहू पनीर की सब्जी के बारे में बताने वाला ही था कि उसकी पत्नी एक थाली में चटनी रोटी लेके आई और स्वामी जी के सामने रख चली गई।

 सुखी रोटी और चटनी देख स्वामी जी क्रोध मे खड़े होते हुए बोले-"मुर्ख....अधर्मी ....पापी... कितने घण्टे से तू मुझे  यंहा भूँखा बैठाये हुए है , व्यंजनो के नाम बता बता उसकी तारीफ किये जा रहा है और खाने को यह सुखी रोटी और चटनी !!"

घुरहू हाथ जोड खड़ा हो गया और  बोला- महाराज! जिस तरह से सुबह आप हमें सारा दिन स्वर्ग में मिलने वाले अद्धभुत और वैभवशाली वस्तुओ को बता के खुश कर रहे थे वैसे ही मैं भी आपको स्वादिष्ट व्यंजनो के बारे में बता के खुश कर रहा था .... आप हमें खुश कर रहे थे और मैंने आप को खुश कर दिया .... आप को ये सब व्यंजन मैं स्वर्ग में अवश्य खिला दूंगा.... अभी तो आप चटनी रोटी  खाइये " इतना कह घुरहू के चेहरे पर एक व्यंगात्मक मुस्कान छा गई।

स्वामी जी  घुरहू की बात सुन अवाक रह गए  , उन्हें आशा न थी घुरहू जैसा अनपढ़ उनसे ऐसी बात कर सकता है । वे किंकर्तव्यविमूढ़  हो कुछ क्षण खड़े रहे फिर मुड़े और तेजी से घुरहू के घर से निकल गएँ।

सुबह पता चला  की स्वामी जी वापस अपने धाम चले गए हैं।



Sunday, 23 July 2017

'ओम मणि पद्मे हुम्'

'ओम मणि पद्मे हुम्'

इस मन्त्र के विषय में यह मान्यता फैली है कि संस्कृत का यह मंत्र बौद्ध धर्म शाखा या तिब्बती बौद्ध में प्रचलित है ,यह मंत्र अवलोकितेष्वर यानि करुणा बोधिसत्व का द्योतक है।

 ओम का अर्थ ओम है , मणि का अर्थ गहना( माणिक या रौशनी -चमक) है , पद्मे का अर्थ कमल का फूल है जिसका अर्थ चेंतना किया और हुम् का सत/ आंनद अर्थ है।

यह भी आश्चर्य है कि संस्कृत के विद्वान तो इसे बुद्ध का मंत्र तो मानते ही है पर बौद्ध विद्वान भी इसे बुद्ध का मन्त्र मानते हैं।
जबकि सत्य है कि बुद्ध के समय संस्कृत थी ही नहीं।

संस्कृतवादियों का इस मंत्र को बुद्ध का मंत्र बताने का आशय यह रहता है कि बुद्ध को संस्कृत के बाद का सिद्ध किया जा सके ।

किन्तु यह मंत्र बुद्ध वचन नहीं है बल्कि यह मन्त्र  वज्रयान के तंत्रवाद का है।

ओम मणि पद्मे हुम् का अर्थ करते हुए देवीप्रसाद जी कहते है कि इसका सीधा अर्थ है 'ओम वह मणि जो पद्म पर विराजमान है'।

तंत्रवाद की योगसाधना को शत-चक्र भेद कहा जाता है । तांत्रिकों के अनुसार  इस का सैद्धांतिक आधार शरीर रचना के बारे में है ।
तंत्रवाद के अनुसार दो नाड़ियां हैं जो सुषुम्ना नाड़ी के दोनों ओर समान्तर चलती हैं, सुषुम्ना नाड़ी नितम्ब से लेकर मस्तिष्क तक जाती है और इसी लिए सामान्यतः इसी को रीड की हड्डी माना जाता है।

सुषुम्ना के अंदर एक और नाड़ी मानी जाती है जिसे वज्रख्या कहते हैं इसके बीच एक और नाड़ी है जिसे चित्रिणी कहते हैं। सीधे शब्दों में चित्रिणी सुषुम्ना नाड़ी का अंतरिम भाग है ।

तंत्रवाद में ऐसा माना जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी के सात अलग अलग स्थानों पर सात पद्म (कमल) है ।आधुनिक तांत्रिक इसे स्नायुजाल कहते है किंतु प्राचीन तंत्रवाद के जानकार पद्म या कमल को योनि या भग का प्रतीक मानते है। प्राचीन तंत्रवाद में योनि या भग को पद्म से ही दर्शाते थे ।

प्राचीन तंत्रवाद के जानकार एल. डिलवालपोलियो ने कहा  "वज्र जिसका दूसरा नाम मणि है वह पुरुष के लिंग का रहस्यमय नाम है  ठीक उसी प्रकार जैसे योनि या भग का साहित्यिक नाम पद्म है"

प्रचीन कई सभ्यताओं में भी कमल को योनि का प्रतीकात्मक महत्व दिया गया था , इसलिए सुषुम्ना नाड़ी पर सात कमल नारीत्व के साथ स्थान हैं और तंत्रवाद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के अंदर हैं ।
विभिन्न तंत्रों के अनुसार सात पद्मो के निश्चित आकार के चित्र होते हैं , इन चित्रों में अधिकाँश पद्मो में त्रिकोण चित्र बने होते हैं । तंत्रवाद में त्रिकोण अनिवार्य भग या योनि का प्रतीक होते हैं ।

शत-चक्र भेद के इन पद्मो पर सात शक्तियों जैसे कुलकुण्डलिनी , वाणिनी, लाकिनी आदि उल्लेख होता है।ये सातों शक्तियां प्रत्येक पद्म पर विरजमान होती हैं।

तंत्र साधना में कुण्डलनी शक्ति(सुप्त पड़े नारीत्व) को नितम्बो के पास  सुष्मन्ना नाड़ी के अंतरिम केंद्र में जाग्रत किया जाता है और एक एक पद्म पर कर इसे मस्तिष्क तक लाया जाता है । सुषुम्ना के सबसे ऊपरी कमल को सहस्त्र- दल- पद्म कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है हजार पंखुड़ियों वाला कमल । कई विद्वान इसे हजार पिण्डको( अंडों) वाला ऊपरी मस्तिष्क कहते हैं जिसमे सभी पिंडक कुंडली के रूप में पड़े हैं। तांत्रिकों के अनुसार यह चेतना का सबसे उच्चतम निवास है।

तंत्रवाद के अनुसार पुरुषतत्व सहस्त्र-दल- पद्म में नारीत्व के साथ ही विरजमान है और कुण्डलनी शक्ति जब वँहा तक पहुँच जाती है तो पुरुषतत्व के साथ मिल के एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं। उनका कोई अलग अस्तित्व नहीं रहता ,सब कुछ नारीत्व में विलीन हो जाता है और चेतना का उच्चतम अवस्था अन्तरतल में जाग्रत हो चुकी होती है।

अब आपकेमस्तिष्क में शायद यह प्रश्न भी आ सकता है कि ओम तो संस्कृत का शब्द है तो बौद्ध धर्म में क्या कर रहा है?
पर यह सत्य नहीं है ओम बौद्ध शाखा के तंत्रवाद का शब्द है जो तांत्रिक क्रियाओं में प्रयोग होता था ।

ठीक ऐसे समझिये की तंत्रवाद के इस मन्त्र 'ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' में नारी शक्ति को जाग्रत किया जा रहा है । अब कोई  ऐं ह्रीं क्लीं ' का संस्कृत अर्थ बताये ?

अतः यह कहना की 'ओम मणि पद्मे हुम्' बुद्ध वचन है तो सर्वदा गलत है। बल्कि यह वज्रयान का मंत्र है ।
चित्र-शत-चक्र भेद(सप्त कमल)

क्रमशः

Monday, 17 July 2017

एक शहीद ये भी-



कल दिल्ली में चार सफाई कर्मियों की मौत की खबर पढ़ी, सेफ्टिक टैंक को साफ़ करने के दौरान जहरीली गैसों से उनका दम घुटने के कारण उनकी मौत हो गई।
यह पहली घटना नहीं बल्कि ऐसा कोई दिन ही होता होगा जब देश के किसी न किसी कोने में किसी न किसी सफाई कर्मचारी की मौत होती है ।

यदि कोई सैनिक बार्डर पर दुश्मनों से लड़ता हुआ मारा जाता है तो उसके प्रति पुरे देश की आम और ख़ास जनता में शोक और संवेदनाओं की लहर दौड़ पड़ती है , ऐसा होना भी चाहिए आखिर सैनिक हमारी ही सुरक्षा के लिए शहीद होते हैं।
सफाई कर्मचारी भी हमारी ही सुरक्षा में लगा एक सैनिक ही होता है जो हमारे लिए ही शहीद होता है ,किन्तु जब वह शहीद होता है तो देश में कोई शोक और संवेदनाओं की लहर नहीं होती। उसके शहादत पर कोई चर्चा नहीं होती , शायद ऐसी जातियता की मानसिकता के कारण होता है।

सफाई कर्मचारी ....जो नंग्गे बदन बिना किसी जीवन रक्षक उपकरण के बदबूदार , जहरीली गैसों से भरे गटर में उतर जाता है बिना अपनी जान की परवाह किये ठीक वैसे ही जैसे एक सैनिक हमारी रक्षा के लिए बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के उतर जाता है मैदान में ।
ये सफाईकर्मी जो उतर जाता है गटर साफ करने ताकि शहर में गंदगी न हो ... ताकि हमारे घरो -सड़को में गंदगी न हो और देश की जनता परेशान न हो बीमार न पड़े ....स्वस्थ रहे ।
बार्डर पर दुश्मन पडोसी मुल्क का सैनिक होता है जबकि यहाँ बीमारियां और जनता की परेशानियां जिससे एक सफाई कर्मचारी बखूबी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए लड़ता है ।

सोचिये जब भरी बारिश होती है , शहर के गली मोहल्ले की सड़के पानी और कूड़े करकट से बिलकुल जाम हो जाती है जिनमे पैदल चलना भी नामुमकिन हो जाता है , हमारे घरो तक में पानी भर जाता है जीवन दूभर हो जाता है । तब ऐसे में सफाई कर्मचारी नाम का सैनिक बिना किसी जीवन रक्षक उपकरण के अपनी जान पर खेल, दिन रात जानलेवा गटर में घुस घुस के उसे साफ़ करता है ताकि हमारा जनजीवन सुगम हो सके ।

आउटलुक पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल लगभग 1000 सफाई कर्मचारी गटर साफ़ करते हुए शहीद हो जाते हैं । आउटलुक पत्रिका यह दावा करती है की उसके पास 2015 में मारे गए सफाई कर्मचारियों जिनकी मौत सैफ्टिक टैंक और गटर साफ करते हुई है उनका ब्यौरा है जिसकी संख्या 300 से अधिक है ,ये आंकड़े स्वयं पत्रिका ने एकत्रित किये है जबकि पूर्ण आंकड़े सरकार उपलब्द करवाने में असमर्थ है मृतको की संख्या सालाना 1000 से अधिक भी हो सकती है ।

आगे पत्रिका लिखती है की चैन्नई के तांबरम में रहने वाली नागम्मा अभी साफ़ सफाई का कार्य करती हैं । उनकी दो बेटियां है , उनके पति की मृत्यु 2007 में गटर साफ़ करते हुए थी जिसमें तीन अन्य सफाई कर्मचारियों की भी मौत हुई थी , सरकार ने कोई भी आर्थिक मदद नहीं की और न ही अन्य लोगो ने ।कहते कहते नागम्मा के आँखों में आंसू आ जाते हैं ।

हैदराबाद की दलित बस्ती में एक गन्दी सी झोपडी में बड़ी मुश्किल से गुजर बसर करने वाली श्रीलता बताती है उनके पति की मृत्यु सैफ्टिक टैंक साफ़ करते हुए मौत हुई उनकी 8 साल की बेटी ग्रीष्मा बताती है की वह बड़ी होके डॉक्टर बनना चाहती है क्यों की डॉक्टरों ने उसके पिता का इलाज ठीक से नहीं किया ... पापा गटर से बहार निकाले गए थे न इसलिए कोई डॉक्टर उन्हें छूने को तैयार न था ... मैं बड़ी होके अपने लोगो का ढंग से इलाज करुँगी " यह कह के ग्रीष्मा और उसकी माँ दोनों रोने लगे।

जिस समय आप मेरा लेख पढ़ रहे होंगे उस समय देश में हजारो सफाई सैनिक अपनी जान जोखिम में डाल के गटर और सीवर में उतर रहें होंगे ताकि आम जनता बीमारियो से बची रहे पर वह सैनिक खुद विषाणुओं और जहरीली गैसों से अपनी जान नहीं बचा पाता। मरने वाले सफाई सैनिको के परिवारवाले कितने दयनीय स्थिति में रहते हैं और जिन्दा रहने के लिए कितना संघर्ष करते हैं इसकी कल्पना करना मुश्किल है ।

केंद्र सरकार से लेके राज्य सरकार और जिला प्रशाशन की भयानक अवहेलना झेलते इन सफाई सैनिक परिवरो को भी देश के लोगो की सांत्वना और मदद की जरुरत है .... ठीक वैसे ही जैसे बार्डर पर मरने वाले सैनिक परिवारो को ।

एक बात और, जिस दिन गटर /टैंक  सफाई करते समय सिर्फ एक जाति विशेष के लोग न मर के अपने को उच्च जाति के कहलाने वाले भी मरने लगेंगे उसी दिन सफाई का काम मशीनों द्वारा होने लगेगा।
तब तक हम अभिशप्त हैं अपने भाइयों की मौत पर रोने के लिए ....


Sunday, 16 July 2017

शिव-


शिव की की कल्पना मुख्यतः अवैदिक थी और मूल रूप से अस्ट्रिको/ द्रविड़ संस्कृति की देन  है ।

शिव का तमिल नाम सिवन है जिसका अर्थ लाल या रक्त वर्ण होता है । ऋग्वेद में रूद्र का जिक्र है जो बहुत कुछ शिव के समान ही हैं , जटाधारी , प्रकृति रूप से भयानक ।रूद्र का अर्थ भी लाल ही होता है ।
इसी प्रकार शम्भू शब्द की तुलना तमिल के 'सेम्बू' से की जाती है जिसका अर्थ होता है तांबा या लाल धातु।

रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि वैदिकों का रूद्र कुछ कुछ अवैदिको के शिव / सिवन जैसा ही था अतः थोड़ी कठिनाई के बाद रूद्र शिव में विलीन हो गए इसकी पुष्टि शिव के विषय में कही जाने वाली एक कथा से होती है जिसमे दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शिव को स्थान नहीं दिया गया था ।शिव पार्वती का विवाह भी बेमेल सा है जिसमे पार्वती की माता शिव को दामाद के रूप में बिलकुल पसन्द नहीं करती हैं।
सम्भवतः बाद में वैदिकों और अवैदिको में विवाह संबंधों के कारण शिव को रूद्र के रूप में स्वीकृति मिली , अथवा सांस्कृतिक आदान प्रदान से शिव रूद्र बने। अतः ऑस्ट्रिको / द्रविड़ो के जो ताम्रवर्ण प्रतापी देवता थे वे वैदिकों के मारुतस्वामी रूद्र से मिल गएँ।

धीरे धीरे शिव का रूप अत्यंत विकसित हो गया जिसके एक छोर पर ऑस्ट्रिको/ द्रविड़ो के पारंपरिक शिव जो फक्कड़, दयालु, भांग पीने वाले , भयंकर रूपरंग लिए  जंगली जनजातियो के नायक ,सिंह की खाल ओढ़े ,  नृत्य करने वाले थे तो दूसरे छोर पर वैदिकों के रूद्र जो दार्शनिक रूप में दर्शाए जाने लगे।

एक बात और गौर करने लायक की सिंधु सभ्यता ताम्र सभ्यता थी ,लोहू का अर्थ तांबे के लाल रंग से ही है। सिंधु सभ्यता  में  जो ध्यानस्थ , सींगों का टोप पहने ,चारो तरफ जंगली पशुओँ का जमावड़ा आकृति मिली है वह ऑस्ट्रिको / द्रविड़ो के सिवन या सेम्बू से काफी हद तक मिलती है।

भारत में एक और जाति के लोगो का उल्लेख मिलता है वे हैं किरात , संस्कृत ग्रन्थो में इन्हें मलेच्छ कहा गया है। किरात जाति के लोग तिब्बत से लेके नेपाल,मणिपुर , असम , त्रिपुर, उत्तर प्रदेश ,बिहार तक फैले हुए हैं।
किरात लोग भारत में कब आये यह कहना तो मुश्किल है किंतु इनका अस्तित्व भारत में अति प्रचीन रहा है , आर्यो से भी पहले का ।
महभारत में जब अर्जुन का युद्ध शिव से हुआ था तो वे किरात के भेष में ही थे। चित्रगन्धा किरात राजकुमारी ही थी।
किरात जाति का मुख्य अधिपत्य हिमालय रीजन में था , शिव का भी निवास स्थान हिमालय ही बताया जाता रहा है।

गंगा के कई मैदानी इलाकों में 'कीरा'शब्द प्रसिद्ध है जिसका अर्थ 'साँप ' से लिया जाता है , कीरा शब्द किरात का अपभ्रंस है । शिव जी के गले में साँप की माला है  जो इस बात का द्योतक है कि सांप शिव के अति प्रिय रहे होंगे।
अर्थात किरात जाति कभी शिव की अनुयायी रही होगी या शिव उन्ही की जाति के कबीले के  कोई नायक रहे होंगे ।

बौद्ध ग्रन्थो में नागों को बुद्ध का अनुयाई बताया गया है, नाग जाति के लोग बुद्ध की सुरक्षा करते थे । बुद्ध के सबसे पहले अनुयाई वही लोग बने थे ,बुद्ध को भोजन कराने वाली सुजाता नाग जाति की कन्या थी। दिनकर जी जैसे इतिहासकार कहते है कि लिच्छवी और शाक्य(सक्क)  वंशीय जनजाति किरात भंडार से निकले थे । इसलिए बुद्ध के प्रति नागों में विशेष सम्मान था।

अब बुद्ध और शिव में क्या कुछ सम्बन्ध हो सकता है?



Thursday, 29 June 2017

बरसात की एक रात-


शाम  से ही घने -श्याम मेघों का जमवाड़ा आसमान में शुरू हो गया था , कई दिनों की बदन झुलसाउ गर्मी के बाद काले मेघों का दीदार  नैसर्गिक आंनद की अनुभूति करवा रहा था ।

तक़रीबन डेढ़ -दो घण्टे जी भर के उमड़ने -घुमड़ने  बाद काले मेघों ने अपने कंधे पर लादे वजन को कम करना आरंभ कर दिया , कंधे से मुक्त हुई जल की बूंदे धरा से मिलने के लिए बैचैनी  यूँ भागीं जैसे अपने प्रीतम से मिलने कोई प्रेमिका।

झमा-झम वर्षा ....

मैंने दुकान में से झांक के बाहर देखा तो भगदड़ सी मची हुई थी, लोग वर्षा से बचने के लिए इधर-उधर छुपने की जगह तलाश रहे थे। जिसको जंहा जगह वंही छुपने की कोशिश कर रहा था , मानो वर्षा की बूंदे न होके आग के गोले हों जो उन्हें जला के भस्म कर देंगे अथवा वे खुद कागज़ के बने हों बस पानी पड़ते ही गल जायेंगे।

कुछ ही देर में मेरी दुकान के शैल्टर के नीचे बारिश से बचने के लिए काफी लोग एकत्रित हो गएँ थे ।

मुझ से रुका नहीं जा रहा था  , मन कर रहा था कि भाग के बाहर जाऊं और बारिश में खूब नहाऊं। न जाने कितने दिन बीत गए थे वर्षा की बूंदों को अपनी हथेलियों से पकडे हुए । पानी में छप-छप पैर मार के किसी छोटे बच्चे की तरह उछले हुए।

कुछ देर अपने को नियंत्रित किया ,किन्तु  स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी में गिरती बूंदों की चमक ने आख़िर अपना काम कर ही दिया । मैंने तुरन्त अपने  हैल्पर से दुकान बन्द करने को कहा । पहले तो वह तैयार न हुआ ,कहने लगा की ऐसी बारिश में दुकान बंद कर के कैसे घर जाएंगे? भीग जायेंगे।

मैं मुस्कुरा के कहा  "बेवकूफ़ !आज भीगना ही तो है ..... इतना रूमानी मौसम रोज नहीं होता"।
वह मुझे आश्चर्य से देखने लगा ,फिर थोड़ा जोर देने पर दुकान का शटर डाउन कर दिया ।
मैंने अपना मोबाइल और पर्स एक प्लास्टिक की थैली में रखा और शटर का ताला लगा के सड़क पर खड़ी मोटरसाइकिल के पास आ गया।

शैल्टर के नीचे खड़े लोग मुझे देखने लगे थे ,जैसे कह रहे हों " बेटे भीग ले .... बीमार पड़ेगा तब पता चलेगा "

मैंने लोगो को चिढ़ाने वाले अंदाज में उनकी तरफ देखा जैसे कह रहा हूँ " डरपोक!" और मोटरसाइकिल में किक मार के चलता बना ।

बारिश में मोटरसाइकिल चलाते हुए भीगने का मजा ही कुछ और होता है खास कर तब जब लोग अपनी मोटरसाइकिल्स को किनारे लगा के किसी पेड़ या छज्जे के नीचे दुबके पड़े हों। आप उन पर उपहास की दृष्टि डालते हुए  उनके सामने से हुर्र- हुर्र करती हुई अपनी मोटरसाइकिल पर निकल जाएं।

लगभग एक किलोमीटर की दूरी ऐसे ही गर्व से भीगते और बारिश का जम के मजा लेते हुए निकाल गया। रास्ते में एक नाला पड़ता है , जिसकी दीवार के सहारे कई बंजारों ने अपनी अस्थाई झोपड़ियां बनाई हुई है ।

जैसे ही उन झोपड़ियों के पास पहुंचा अचानक मेरी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी। देखा तो एक स्त्री और उसके तीन छोटे छोटे बच्चे जो की दस साल से कम ही रहे होंगे बारिश में भीग के अपनी झोपडी की छत पर फटा हुआ तिपाल बिछा रहे हैं । अंदर पूरा सामान गीला हो चुका था , तेज बारिश के कारण झोपड़ी की सड़ चुकी प्लास्टिक  तिरपाल जो छत का काम करती थी बुरी तरह से टपकने लगी थी जिससे सारा सामान भीग गया । झोड़पी के बाहर कच्चा चूल्हा भी टूट चुका था। स्त्री और उसके बच्च चिंता में  भीगते हुए फ़टी हुई तिरपाल से अपने सामान को खराब होने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थें। मैं सोचने लगा की ये लोग क्या खाएंगे और कैसे सोयेंगे रात में यदि बारिश यूँ ही पड़ती रही तो? 

एक दूसरी झोपडी में सड़क का गंदा पानी घुस गया था ,जिसे पूरा परिवार गिलास और टूटे हुए कटोरों से निकालने की कोशिश कर रहा था । वे झोपडी स  जितना पानी निकालते उससे अधिक वापस अंदर जा रहा था।

ऐसा ही हाल लगभग हर झोपडी का था । मैं काफी देर तक यूँ ही खड़ा उन अस्थाई झोपडी वाले बंजारों  बारिश से लड़ने की जद्दो-जहद को देखता रहा । बारिश उनके लिए एक अभिशाप थी।

अब बारिश की बूंदे मुझे अंगारे लगने लगे थे , ये अंगारे मेरे बदन के साथ -साथ मेरे हिर्दय को भी भस्म किये जा रहे थे । अब मैं चाह रहा था कि बारिश उसी क्षण  बंद हो जाये।