Saturday, 14 October 2017

वैश्या- कहानी


रात के तकरीबन बारह बज रहे होंगे ,जंहा  दिन भर ट्रैफिक के कारण इंच इंच जगह घिरी होती थी  वंही इस समय सड़के लगभग सून-सान सी थी , इक्का- दुक्का ट्रैफिक ही रहा होगा  वे भी जल्दी अपने गंतव्य पहुँच जाना चाहते थे । दिल्ली  बसअड्डे से थोड़ी  दूर यह ट्रैफिक लाइट जंहा दिन में भी कम लोग रुकते थे रात में गुलज़ार थी। जरा सी दूरी में लगभग आधा दर्जन किन्नर और  वेश्याएं खड़ी थीं जो अपने अपने ग्राहकों से मोल भाव करने में मशगूल थीं।

  क्या चार्ज है ? " सुनील ने  पूछा।
 " सिंगल शॉट का पांच सौ और फुल नाइट सर्विस का पंद्रह सौ, अगर दो लोग है तो ढाई हजार ...  दो लोगो से ज्यादा नहीं  ... " रूबी ने हाथ घुमातें हुए एक साँस में समझाने वाले लहजे में कहा ।
" नहीं मैं सिंगल ही हूँ .....पूरी रात का  कुछ कम होगा क्या ?" सुनील ने मुस्कुराते हुए कहा।
" नही .... रेट में कोई हेर फेर नहीं .... और हाँ !पैसा एडवांस  देना होगा " रूबी ने सर हिला के मना करते  हुए  रूखेपन से कहा ।

" अच्छा..अच्छा!! चलो बैठो " सुनील ने रूबी को मोटरसाइकिल पर बैठने का इशारा किया ।

रूबी मोटरसाइकिल पर उचक के सुनील के पीछे जा बैठी।

सुनील मोटरसाइकिल स्टार्ट कर तेजी से दौड़ाने लगा, पीछे बैठी रूबी ने दुपट्टे से अपना चेहरा ढँक लिया।शायद वह चाहती थी की कोई उसे पहचाने न।

" क्या नाम है तुम्हरा? " थोड़ी देर मोटरसाइकिल चलाते रहने के बाद  सुनील ने पीछे मुड़ते हुए रूबी से पूछा।
" रूबी...." रूबी ने ठन्डे लहजे में उत्तर दिया।
" रहती कँहा हो?" सुनील ने फिर प्रश्न किया ।
" क्या करेगा जान के ? नाम - गाँव जान के क्या करेगा? तू जिस काम के लिए ले जा रहा है वह काम होना चाहिए बस ... बाकी क्या करना है तुझे? " रूबी ने कुछ तीखे अंदाज में कहा तो सुनील झेंप के चुप हो गया ।

"और कितनी दूर है तेरा घर? " रूबी ने कुछ देर बाद  पूछा शायद वह बोर होने लगी थी या ज्यादा  दूर जाने से डर लग रहा था।
" बस .... अगले कट से दो गली बाद "सुनिल मुस्कुराते हुए कहा ।

दो- तीन मिनट बाद  एक गली के सामने गली में पहुँचने के बाद सुनील ने मोटरसाइकिल रोक ली और  रूबी को  मोटरसाइकिल से उतारते हुए  कहा की वह पहले वह घर का ताला खोलेगा  और उसके पांच मिनट बाद रूबी आये ताकि अगर पडोसी उसकी मोटरसाइकिल की आवाज़ से जग भी जाएँ तो उसे अकेला ही देखें।

रूबी ने ऐसा ही किया , सुनील ने पहले जा के अपने घर का ताला खोला और बाइक पार्क कर आधा गेट खोले रखा। कुछ क्षण बाद रूबी चुप चाप घर के अंदर आ गई तो सुनील ने तेजी से दरवाज़ा बंद कर दिया ।

कमरे के अंदर पहुँच सुनील ने रूबी को सोफे पर बैठने का इशारा किया और खुद फ्रिज से बोतल निकाल कर एक गिलास में पानी उड़ेल पीने लगा ।
पानी पी लेने के बाद उसने एक गिलास और भरा और रूबी की तरफ बढ़ा दिया ।

रूबी ने कुछ संकुचाते हुए पानी का गिलास थामा और एक सांस में खाली कर दिया । पानी पीने के बाद गिलास मेज पर रखते हुए उसने सुनील की तरफ देखा और कहा- तो! शुरू करें?

सुनील रूबी की बात सुन उसके पास आ के बैठ गया और उसका दुपट्टा हटा के उसके स्तनों को निहारते हुए बोला-रिलैक्स! अभी सारी रात बाकी है... कुछ इंजॉय करते हैं पहले"

फिर वह उठा और कपड़े बदलने लगा,कपडे बदल के वह फिर फ्रिज के पास जा पहुंचा और फ्रिज में रखी सिग्नेचर की बोतल निकाल के वापस फ्रिज को बंद कर दिया । दो गिलास  पानी की बोतल और नमकीन - काजू से भरी कटोरी ले के रूबी के पास जा बैठा।

दो पैग बना के एक रूबी की तरफ बढ़ाते हुए बोला- लो ....कुछ मूड बनाओ यार... मजा दुगना आएगा"

"मैं शराब नहीं पीती .... " रूबी ने हाथ से गिलास हटाते हुए कहा।
"एक पैग तो ले लो...तुम तो शरमा रही हो.. इस काम में तो यह चलता है... मूड बन जायेगा " सुनील ने थोड़ा जिद करते हुए कहा।

सुनील के बार बार जिद और आग्रह करने पर आख़िर रूबी मान ही गई , उसने गिलास उठाया और होठो से लगा एक सिप ले लिया ।

"तुम इस धंधे में कब आईं?" सुनील ने नमकीन की प्लेट रूबी की तरफ सरकाते हुए पूछा।

सुनील का प्रश्न सुन रूबी का खिला हुआ चेहरा एक दम से मुरझा सा गया , कई दबे हुए दर्द एकाएक उभर आये ।जैसे ऊपर से ठंडी पड़ चुकी  राख को कोई कुरेद के दबी आग को फिर से हवा दे दे।

"देखो तुम बताना नहीं चाहती हो तो कोई बात नहीं .... मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा था ...तुम धंधे वाली लगती नहीं हो न " सुनील ने रूबी को ख़मोश देख कहा।
"क्या बताऊँ!कुछ बताने लायक है ही कँहा... कौन अपनी खुशी से बनना चाहता है वैश्या!.... यह सब इश्क़ का नतीजा है"रूबी ने एक साँस में पूरा गिलास खाली कर दुःख भरे किन्तु व्यंग वाले अंदाज में  कहा ।
" इस शराब से भी कड़वी जिंदगी की कहानी है मेरी"रूबी ने छत की तरफ देखा और आँखे बंद करते हुए बोली।

उसके बाद रूबी ने अपनी कहानी बतानी शुरू की , कैसे वह एक लड़के के प्यार के चक्कर में फंस के बंगाल से  दिल्ली आ गई थी। दिल्ली में उन्होंने शादी भी कर ली , एक बच्ची भी पैदा हो गई । एक दिन लड़के ने अचानक बताया  कि  लड़के के पिता जो इस शादी के खिलाफ थे उन्होंने लड़के की शादी कंही और तय कर दी थी, अगर वह उनकी बात नहीं मानेगा तो उसे जायजाद से बेदखल कर देंगे , जायजाद काफी थी जिसे लड़का छोड़ने की हिम्मत नही कर पाया । फिर एक दिन तलाक़- तलाक़ बोल के हमेशा के लिए छोड़ के चला गया। लड़के को कँहा खोजती? वह कभी अपने घर लेके ही नहीं गया बस इतना सुना था उसके मुंह से की वह राजस्थान का रहने वाला था ,उस पर विश्वास कर घर छोड़ के भाग आई थी।वापस अपने घर जा नहीं सकती थी, मैं अपने घर वालो के लिए मर चुकी थी।

सुनील ख़ामोशी से रूबी की बात सुन रहा था ।

" मैंने पहले तो आत्महत्या करने की सोची पर फिर सोचा की बच्ची का क्या कसूर! कई जगह नौकरी भी करने की कोशिश की पर अकेली जान के हर कोई मेरे जिस्म को ही पाना चाहता था  ... इसलिए सोचा की जब वही करना है तो खुल के क्यों न किया जाए .... अपनी मर्जी से ग्रहाक और अपनी मर्जी से पैसा" यह कहते हुए रूबी के गालों से दो आंसू लुढ़क गएँ।
"और बच्ची को कँहा छोड़ के आती हो?" सुनील ने पूछा।
" आया के पास ...."रूबी ने आँखे बंद किये ही उत्तर दिया..

सुनील का मूड कुछ ऑफ सा हो गया था रूबी की कहानी सुन के पर कुछ शराब का शुरुर और कुछ रूबी को दिए पैसे का ख्याल कर उसने रूबी को आलिंगन किया और उसे वस्त्रहीन कर दिया।

तभी जोर से डोरबैल बजने की आवाज़ सुनाई दी।
"कौन होगा? " रूबी ने सुनील से घबराते हुये पूछा ।
सुनील को खुद नही समझ आया की इतनी रात को कौन आ सकता है । उसने तौलिया लपेटी और अजमंजस में दरवाजें को खोला । दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गएँ, काटो तो खून नहीं। सामने उसकी पत्नी चंद्रिका खड़ी थी , साथ में उसका भाई और माँ भी ।
"अच्छा! मैं दो दिन के लिए मायके क्या गई तुम घर में रंडी लाके गुलछर्रे उड़ाने लगे.... घर को कोठा बना दिया" चन्द्रिका ने आग उगलते हुये शब्दो में कहा और सुनील को धक्का देते हुए अंदर दाखिल हो गई। उसके पीछे उसकी मां और भाई भी। किसी पडोसी ने सुनील ने देख लिया था रूबी को घर लाते हुए और उसने चंद्रिका को फोन कर दिया  था ।


" वो...वो... तुम गलत समझ रही हो" सुनील ने घबराए और लड़खड़ाई हुई आवाज़ में कहा ।
" मैं क्या समझ रही हूँ यह अभी बताती हूँ " चंद्रिका चीखती हुई उस कमरे में प्रवेश कर गई जंहा रूबी थी।रूबी ने जब शुरगुल सुना तो वह कपडे पहने लगी किन्तु अर्धनशे होने के कारण उसका दिमाग और हाथ-पाँव सही के काम नहीं कर रहे थे , शरीर का ऊपरी भाग अब भी खुला था ।

चंद्रिका ने रूबी को जब इस हालत में देखा तो वह क्रोध में लगभग विक्षिप्त हो गई।
"कुतिया... रंडी...#$%…..&%$.... मेरे घर को कोठा बना दिया ....तेरी आग आज शांत करुँगी ...." और बहुत सी गालियों बकती हुई चंद्रिका ने रूबी के बाल पकड़ अपने हाथ में लपेट लिए। रूबी दर्द से चीख उठी और दोनों हाथों से चंद्रिका की पकड़ को छुटाने की कोशिश करने लगी । किन्तु चंद्रिका की पकड़ इतनी मजबूत थी की रूबी सिवाय चीखने के कुछ न कर पा रही थी। सुनील रूबी को छुटाने की कोशिश करने लगा पर चंद्रिका ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया की वह लड़खड़ा के दरवाजे से टकरा गया, नशे में होने के कारण वैसे ही वह सही से खड़ा नही हो पा रहा था।

चंद्रिका रूबी को गालियां बकती हुई किसी विक्षिप्त की तरह उस पर लात घूसे बरसा रही थी। रूबी दर्द के मारे सिर्फ चीख रही थी कुछ बोल न पा रही थी।

चंद्रिका ने रूबी का सर कांच की मेज पर इतनी जोर से मारा की 12 mm का मोटा कांच चकना-चूर हो उठा । कांच के  कई टुकड़े  रूबी के गले और चेहरे पर अंदर तक धंस गए थे जिनमें से खून की तेज धार बहने लगी थी । किन्तु चन्द्रिका का इस पर कुछ असर नहीं हो रहा था , वह तो रूबी को पीटे जा रही थी। कुछ देर बाद रूबी का शरीर शांत हो गया, चंद्रिका को जैसे होश आया और उसने रूबी को छोड़ दिया । चन्द्रिका ने देखा की पूरे घर में खून ही खून बिखरा हुआ था , उसके खुद के कपडे और हाथ रूबी के खून से सने हुए थे । रूबी मर चुकी थी।

बस यहीं तक थी कहानी.....


Monday, 9 October 2017

ईश्वर और आत्मविश्वास

 बहुत समय पहले एक कहानी पढ़ी थी, उस कहानी का मुख्य मात्र एक बहुत नामी वकील होता है जो कभी कोई केस नहीं हारता था। उसकी एक आदत की जब वह अदालत में किसीं केस पर जिरह करता तो अपने कोट के ऊपर वाले बटन को बाएं हाथ की उंगलियों से घुमाता रहता था ।

एक दिन एक महत्वपूर्ण केस पर जिरह करते समय वकील का हाथ आदतानुसार कोट के बटन पर जाता है ,किन्तु कोट पर बटन नहीं मिलता । वकील बेचैन हो उठता है वह बार बार अपना हाथ कोट के उस स्थान पर लेके जाता है किंतु वँहा बटन न मिलने से बहुत परेशान हो उठता है। बटन न घुमा पाने के कारण वह इतना नर्वस हो जाता है उसे लगता है कि वह केस हार जायेगा , उसके मन में यह बात बैठ गई थी बटन घुमाने से वह केस जीतता है।


घबराहट में जिरह न कर पाने के  वह केस लगभग हारने वाले ही होता है कि तभी अदालत का समय पूरा हो जाता है , जज अगले दिन की डेट दे देता है। घर आके वह सारी बात अपनी पत्नी को बताता है तो उसकी पत्नी कहती है कि कल कोट धोते समय बटन टूट गया था बाद में वह बटन टाँकना भूल गई थी । वकील की पत्नी कोट का बटन पुनः टांक देती है , अगले दिन वकील अदालत में जाता है और आदतन अनुसार कोट का बटन घुमाता रहता है जिससे उसका आंतरिक विश्वास मजबूत रहता है और हारा हुआ केस जीत जाता है।

कोट का बटन घुमाना उस वकील की आदत थी यह एक तरह से उसके आत्मविश्वास( चेतन मन) को  सबलता देता था जिससे वह खुद को केस पर केंद्रित कर पाता था , केस की बारीकियों पर अच्छी पकड़ कर पाता था। कोट का बटन न घुमा पाने के कारण वह खुद को नर्वस पाता है और केस हारने लगता है,उसका आत्मविश्वास कमजोर हो उठता है ।

आत्मविश्वास या आंतरिक विश्वास( मन की सबलता) का आभव मनुष्य में और भी कई प्रकार प्रकट होता है । इससे मनुष्य में विविध प्रकार की विचित्रता उतपन्न हो जाती है , ऊपर दिए वकील की कहानी की तरह बहुत से लोग विशेष तिथि,रंग, आभूषण, के प्रति अन्धविश्वसी हो जाते है और उन्हें शुभ या अशुभ समझने लगते है। इस  प्रकार से ऐसे भाव उसके अचेतन मन में बैठ जाते जिन्हें वह काल्पनिक ईश्वर से जोड़ देता है ,इसी भावों के आधार पर उसका आत्मविश्वास कमजोर या मजबूत होने लगता है।

कई लोग मेरी नास्तिकता को लेके मुझ से असहज रहते हैं, उन्हें लगता है कि जैसा वे ईश्वर को मानते और जानते रहें है वैसा मैं क्यों  नही मानता हूँ? उस भेड़ चाल में मैं क्यों नहीं शामिल हूँ जिसमे वे सब है। पर मुझे उन से शिकायत कम् ही रहती है क्यों की मैं जानता हूँ की उनका अचेतन मन ईश्वर की वैसी ही कल्पना स्वीकार कर चुका है जैसा उस वकील ने अपने कोट के बटन को घुमाने से केस जीतने का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। उनके आत्मविश्वास को बनाये रखने के लिए ईश्वर की परिकल्पना उनके लिए जरुरी है।

ईश्वर कल्पना ही सही किन्तु उन्हें इस कल्पना से सबलता मिलती है, मैं ऐसा मानता भी हूँ की कमजोर आत्मविश्वसियों के लिए यह जरुरी भी है अन्यथा वे टूट जायेंगे । जब तक उनका अचेतन मन स्वयं सबल हो ईश्वरीय रूपी कल्पना के पट्टे को उतार न फेंके तब तक उनका आस्तिक बने रहना अच्छा है।

Saturday, 30 September 2017

ताम्र(खनिज) और लंका पर आक्रमण-

  श्रीलंका का प्रचीन नाम ताम्रपर्णी था, ताम्रपर्णी का अर्थ होता है तांबे का पत्ता या थाल । निस्चय ही तांबे/कांस्य जैसे खनिज की अधिकतम मात्र की उपस्थित अथवा तांबे/ कांस्य को कच्चे माल को उत्पादन की प्रमुखता के कारण यह नाम दिया गया होगा।


जैसा की इतिहासकारो ने सिद्ध किया है कि सिंधु सभ्यता कांस्ययुगी सभ्यता था ।कांसा तांबे और अन्य धातुओं के मिश्रण से तैयार होता है ,सिंधु सभ्यता के लोगो ने तांबे को कांस्य के रूप में प्रयोग कर अधिक मजबूत औजार और घरेलू बर्तन बनाना सीख लिया अतः सिन्धु सभ्यता का व्यापारिक सम्बन्ध मिश्र , मेसोपोटामिया ,ईरान जैसे देशों से हो गया था । यह यह मुख्य बिंदु है कि  सिन्धु सभ्यता के उत्खनन में 'हथियार' नहीं मिले हैं जबकि मोहरे,मूर्तियां, आभूषण आदि पर्याप्त मात्रा में मिले हैं अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि हड़प्पाई संस्कृति हथियारों और युद्ध से अनभिज्ञ थी।

ऋग्वेद में वैदिक प्रमुख इंद्र ऐसे लोगो से संघर्ष करता है है जो अवैदिक हैं और नगरों में रहते हैं। राजा शंबर के सौ नगरों को आसानी से नष्ट कर देता है, ठीक ऐसे जैसे किसी मिट्टी के घर को । डी डी कोसंबी जी एक टिप्पणी गौर करने लायक है "ऋग्वेद में इंद्र द्वारा शत्रुओ के नगरों को नष्ट करना और आसानी से शत्रुओं को मार देना बिना किसी विशेष संघर्ष के यह ओजस्वी भाषा हड़प्पा में घटित किसीं वास्तविक संघर्ष का परिचारक है"।

ऐसा क्या हुआ की हड़प्पाई लोग अपने हमलावर  शत्रुओं  आसानी से हार जाते हैं? ऐसा इसलिये हुआ होगा की हमलावरों के मुकावले उनके हथियार बेकार और अत्यंत कमजोर साबित हुए होंगे। ठीक ऐसे समझिये की जैसे बाबर के तोप के  गोलों और बंदूकों के आगे पुरातन ज़माने के तीर - धनुष और भाले लिए भारतीय सेना हार जाती है।


 हड़प्पा संस्कृति पर आक्रमण केवल राज्य विस्तार भर न था बल्कि खनिजों पर आधिपत्य जमाना था । खनिज भंडारों पर अपना कब्जा जमाने के साथ साथ व्यापार को भी अपने कब्जे में लेना था। यूँ समझिये की जैसे आज भी सरकारे आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अपने कब्जे में कर खनिज पदार्थो के लिए आदिवासी लोगो को उनकी जमीनों से भगा देती आ रही हैं।

तो प्रबल संभवना रही  होगी की ताम्रपर्णी यनीं लंका अपने तांबे जैसे खनिज पादर्थो के निर्यात के कारण बहुत  समृद्ध हो गई थी  और इन्ही खनिज भंडारों पर अधिकार करने के लिए लंका पर चढ़ाई की गई हो ?  ऋषि लोग इन्ही खनिजों की तलाश में अपनी  कुटिया और आश्रम जंगलो में बनाते रहे होंगे और खनिजों के भंडार मिलने पर राजाओं को सूचना देते होंगे।
चुकी तांबे को गलाने पर यह सोने के पीले रंग से मिलता जुलता हो जाता है और नगर बनाने में इसका प्रयोग बहुतायत किया गया हो अतः लंका को ' स्वर्ण नगरी' कहा जाता रहा होगा। ठीक ऐसे ही जैसे जयपुर  के भवनों पर गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग करने के कारण इसको गुलाबी नगर/पिंक सिटी भी कहा जाता है ।

रावण उसी तरह अपने खनिज संपदा की रक्षा कर रहा हो जैसे आदिवासी लोग अपने जंगलो की करते हैं। वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में लंका को जींतने के बाद राम जी कहते हैं कि उन्होंने यह युद्ध सीता जी को जींतने के लिए नहीं किया है, यदि सीता जी के लिए युद्ध नहीं था तो किसके लिए युद्ध किया था? जाहिर सी बात थी लंका पर आधिपत्य के लिए , लंका पर आधिपत्य का अर्थ था वँहा के तांबे जैसे विशाल खनिजों के स्रोतों पर अधिकार करना। अतः रामायण का काल चाहे कुछ भी रहा हो किन्तु हम कह सकते हैं कि वह इसका युद्ध का मुख्य कारण खनिजों पर अधिकार के लिए रहा होगा?

Thursday, 14 September 2017

जानिए हिंदी का इतिहास- हिंदी दिवस विशेष

 हिंदी ....प्यारी हिंदी, कभी कभी सोचता हूँ की यदि हिंदी न होती तो क्या होता? इस मीठी सी ज़बान जिसमे खड़ी बोली भी है...उर्दू की नज़ाकत भी है ...पालि / प्रकृत के अपभ्रंश भी है  संस्कृत / अरबी के कठिन शब्द भी है अर्थात प्राचीन से लेके नवीन सभी भाषाओं को एक साथ पिरोने वाली  हिंदी न होती तो हम आज अपने विचारों को शब्दो का वह धरताल न दे पाते जो आज हम आसानी से दे पाते हैं।

तो चलिए, आज हिंदी दिवस के मौके पर हम अपनी प्यारी भाषा हिंदी के बारे में ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा ही सही जानने का प्रयास करते है ।

हिंदी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में बहुत सी धारणाएं प्रचलित है जिसमे से  अधिकतर भाषा वैज्ञानिकों का दावा  है कि हिंदी का उद्भव दसवीं सदी के आस पास का है । अपभ्रंश शब्द की व्युत्पति और धम्म/ जैन रचनाकारो की अपभ्रंश रचनाओं से हिंदी के इतिहास का सम्बन्ध बताया जाता है । इसलिए, प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से हिंदी भाषा का उद्भव स्वीकार किया जाता है । प्राकृत के अपभ्रंश से सातवीं -आठवी सदी में पद्य रचनाये प्रारम्भ हो गई थीं।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह निर्णय करना कठिन है कि हिंदी भाषा का निश्चित तौर पर  प्रयोग कब किस जगह हुआ परन्तु इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में इसका प्रयोग खुसरो जैसे  मुसलमानो कवियो ने किया , हिंदी शब्द का अर्थ उनके लिए भारतीय भाषा था । आज हिंदी भाषा लगभग पूरे उत्तर भारत की मुख्य भाषा बन चुकी है।

वैसे यह कहा जाता है कि उर्दू हिंदी की जननी है किन्तु यह पूर्णतः गलत है, उर्दू का जन्म भी नहीं हुआ था तब से हिंदी प्रचलन में रही है। हिंदी की तीन शैलियां है , पहली ब्रजभाषी (शौरसेनी) शैली, दूसरी राजस्थनी और तीसरी खड़ी बोली।

हरिषेण ने अपनी' धम्म परिक्खा ' प्रकृत के अपभ्रंश के तीन कवि माने है ,  चतुर्मुख,स्वंभू और पुष्पदन्त हलाकि की स्वंभू के छोड़ के अन्य का कोई ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है । स्वंभू ने अपनी प्रकृत अपभ्रंशिय रचनो को 'पद्वडिया' कहा था  , स्वंभू दसवीं सदी के राजा कर्ण सभा में कवि थे ।

दसवीं सदी में धनपाल नामक जैन कवि हुए जिन्होंनेअपनी अपभ्रंश रचनाओं को 'भविसयत्त ' कहा । उसके बाद कई जैन कवि हुए चरित काव्य प्रसिद्ध हुए जैसे सुदर्शनचिरायु ।


आठवीं - दसवीं सदी  में बौद्ध परम्परा से निकले सिद्धों और नाथों का बोलबाला रहा , यह वक्त था जब सिद्ध/ नाथ परम्परा से निकले मछेंद्रनाथ( मत्स्येन्द्र) और गोरक्खनाथ( गोरखनाथ ) का समय था । सिद्धों /नाथों काव्य की शैली सहजयानी की शैली रही है जिससे लगता है कि सिद्ध और सहजयानी कभी एक ही परम्परा से निकले थे। दसवीं सदी के  कश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त ने मच्छनाथ विभु की वंदना की है ,गोरखबानी प्रकृत अपभ्रंशसिय रही।

नरपति नाल्ह की बीसलदेवरासो ,हम्मीर रासो, पृथ्वीराज रासो जैसे काव्य बेशक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक न हो किन्तु हिंदी के उद्भव में महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

इतिहासकारो के अनुसार हिंदी के वास्तविक जनक अमीर खुसरो कहे जाते हैं,उनकी रचनो में तात्कालिक प्रचलित  खड़ी बोली को हिंदीकाव्य भाषा में  प्रयोग किया गया जिससे हिंदी प्रतिष्ठित हो पाई।सबसे पहले ख़ुसरो ने दिल्ली के आस पास प्रचलित खड़ी बोली को साहित्यक सर्जन का काम किया । उस समय मुसलमान अपनी कवितायेँ फ़ारसी में तो हिन्दू अपनी संस्कृत में सिद्ध / नाथ संत  अथवा जैन डिंगल या अपभ्रंश में । अमीर खुसरो ने इनसे इतर प्रचलित जन भाषा हिंदी में अपनी रचनाएं की और उर्दू के लिए रहा खोल दी।

यही नहीं ख़ुसरो के सच्चे भारतीय थे उस का उल्लेख अपनी मसनवी में 'नुहे- सिपह्न' ( नौ आकाश) में भारत की प्रशंसा की है जो की उस समय सल्तनत की साम्प्रदायिक नीतियां भारत के खिलाफ थी पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की । मुसलमान भारत के प्रति अपनी भक्ति अर्पित करें यह बात उस समय मुस्लिम समाज में अच्छी नहीं समझी जाती थी। उस समय भारत को दारुल -हरब कहा जाता था।
ख़ुसरो की दोहे, मुकरनियां , पहेलियां खूब प्रसिद्ध हुए , ख़ुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । जब निजामुद्दीन की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी पीड़ा एक दोहे में व्यक्त की जो आज तक प्रसिद्ध है-

गोरी सोवत सेज पर ,मुख पर डाले केस।
चल ख़ुसरो घर आपनो, रैन भई सब देस।।

हिंदी को आगे ले जाने में निर्गुण और सगुण काव्यधाराओं ने भी बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। निर्गुनिया संतो ने तो ख़ासकर क्यों की कबीर ,रैदास जैसे संतो की भाषा ही जनभाषा थी । कहा यह जाता है की निर्गुणसंत काव्य धारा सिद्धों/ नाथों और जोगियो से निकली है जो कभी बौद्ध थे ।

हिंदी निर्गुण संत काव्यधारा के प्रमुख संत कबीर हुए,
कबीर जुलाहा जाति के थे , कबीर सिद्ध परम्परा से आते थे जिनके पूर्वज निम्न जाति के थे और हाल ही में मुसलमान बने थे । इतिहासकारो का मानना है कि कबीर के पूर्वज अस्पृश्य कोरी जाति के थे , कोरी जाति ही मुस्लिम जुलाहे बनते थे।

अपनी रचनाओं से पाखण्ड, अंधविश्वास , जातीय भेद भाव , ब्रहामणिक विधानों या मज़हब के आडम्बरो पर जितना कबीर ने प्रहार कियाहै  उतना किसी ने नहीं किया । यह दिगर की बात थी की अनपढ़ कबीर के ज्ञान के आगे बड़े बड़े मुल्ला पंडित कंही नहीं ठहरते थे। कबीर कहते हैं-

हिन्दू कहत है राम हमारा ,मुसलमान रहमाना
आपस में दोउ लड़े मरत है भेद न कोई जाना।।

प्रेम सिर्फ ईश्वर भक्ति नहीं है बल्कि वह अपने आप में स्वतंत्र मूल्य रखता है इस अनुभूति की पहली हिंदी कविता कबीर ने ही लिखी है-

प्रेम न बारी उपजै, प्रेम न हाट बिकाये,
राजा परजा जेहि ,सीस देई ले जाए।
यह तो घर है प्रेम का ,खाला का घर नाहि,
सीस काटि भुइयां धरो, तब पैठो घर माहिं।
सीस काटि भुइयाँ धरो, ता पर राखों पाँव,
दास कबीरा यों कहैं, ऐसा हो तो आव।

प्रेम की इतनी पीड़ा की अनुभूति की जो भंगिमा कबीर सहज भाव से कहते हैं उतनी अनुभूति आज तक नहीं रची गई।हाँ , मीरा कुछ वँहा तक पहुँचती हैं मीरा कहती हैं-

बिरिहन भुअंगम तन डसा ,किया करेजे घाव
बिरिहिन् अँग न मोडिया ,जित चाहो तित खाव।

यंहा थोड़ा दक्खिनी हिंदी का जिक्र करना जरुरी होगा,दक्खिनी हिंदी का अर्थ दक्षिण की हिंदी नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि से इतिहास में इस क्षेत्र को दखन कहा जाता रहा है और इसके अंतर्गत महारास्ट्र , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कई क्षेत्र आते हैं।भाषा शास्त्रियों के अनुसार खड़ी बोली को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया है । राहुल सांस्कृतयायन के अनुसार खड़ी बोली हिंदी के कवि सबसे पहले दक्खिनी कवि ही थे ,दक्खिनी कवियों में अधिकतर सूफ़ी मत के कवि रहे हैं जिनमे की जानम( 1582) गेसू दराज( 1343) जैसे प्रमुख रहे हैं । डाक्टर सुनीत कुमार चाटुजर्या लिखते हैं कि 1690 में औरंगजेब दक्खिन में था तब बंगाल के एक मुसलमान प्रवास करता हुआ उससे मिलने आया । उसने बादशाह से कहा कि वह उसे अपना मुरीद बना लें तब औरंगजेब ने देशज पद्य की पंक्तियां कह के उसे फटकारा-

टोपी लेंदे, बावरी देंदे , खरे निलज्ज।
चूहा खान्दा बावली, तू कल बंधे छज्ज।।

औरंगजेब घोर साम्प्रदायिक है किंतु उसके मुंख से हिंदी शब्द निकलते हैं ।

दोस्तों,हिंदी का एक लंबा आए समृद्ध  इतिहास रहा है जिसको इस छोटे से लेख में वर्णन करना नामुमकिन है इसके लिए पोथियाँ कम् पड़ जाएँगी ।अतः इतने पर ही विराम देना चाहूंगा।

हिंदी का इतिहास बौद्धों, जैनियों, सिद्धों/ नाथों / जोगियो से होता हुआ हम्मीर,ख़ुसरो, रासो, विद्यापति, कबीर, रविदास, मीरा ,गुरुनानक, धर्मदास, मुहम्मद जायसी, उस्मान, रसखान, रहीम, तुलसीदास, हरिदासी(सखी संप्रदाय) , सूरदास,गोबिंदस्वामी, नरहरि, मुबारक, भूषण, भिखारीदास, खुमान, दरिया साहिब, पलटू दास, तथा आधुनिक काल के हिंदी साहित्यकारों / नाटककारों तक पहुंचा जिन्होंने इसे नई ऊंचाइयां दी ।जिनमे कुछ आधुनिक हिंदी साहित्यकारों के नाम इस प्रकार है -

भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्ववेदी,मैथलीशरण गुप्त, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, हरी शंकर परसाई, राहुल सांस्कृत्यायन, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य हजारी प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, डी डी कौशाम्बी, अमृतलाल नागर, मुक्ति बोध, धर्म वीर भारती, नागार्जुन, रेणु, भीष्म साहनी, रामव्रक्ष बेनी पुरी, मुद्राराक्षस, रंगेय राघव, पुष्पा मैत्रीय,रामविलास शर्मा,उषा प्रिवन्दा,  ओमप्रकाश वाल्मीकि,माधव मुक्तिबोध, शिवदान सिंह चौहान, हमीदुल्ला, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शरद जोशी, तुलसी राम( मुर्दहिया) , राजेंद्र प्रसाद सिंह( सासाराम कालेज) , कँवल भारती जैसे अनगिनत हिंदी साहित्यकार शामिल हैं। जिनका नाम याद नहीं रहा उन से विनम्र क्षमा चाहता हूँ, यदि पाठक गण चाहे तो नाम वे अन्य नाम सुझाव कर सकते हैं।


आप सभी को हिंदी दिवस की ढेरों बधाइयाँ...आशा है कि हिंदी यूँ ही बढ़ती रहेगी और जन जन तक फैलती रहेगी ...



Saturday, 26 August 2017

धंधा- कहानी


शहर से दूर एक निर्जन और वीरान जगह पर एक मंदिर और एक मजार थी, जिस रास्ते पर यह मजार और मंदिर था उस के आस पास बहुत घना जंगल था जिस कारण लोग बाग़ बहुत कम उधर से गुजरते थे केवल चरवाहे जंगल में अपने पशु चराने सुबह शाम उधर से जाते थे वीरान मंदिर को देख कर कई साल पहले वंहा एक बाबा ने अपना डेरा जमा लिया था । बाबा दिन भर गाँव गाँव और शहर जाके भीख मांगता था , उसे पैसे के अलावा आंटा दाल तेल आदि भी खूब मिलता था जिसे वह अपने खाने के लिए बचा के बाकी का बेंच देता था जिससे अच्छे पैसे भी मिल जाते थे ।

मंदिर के साथ जो मज़ार थी उसमे भी एक फ़कीर ने अपना डेरा जमा लिया था , वह भी गाँव गाँव- शहर  जाके भीख मांगता और अच्छी आमदनी करता ।
शाम को बाबा और फ़कीर दोनों मिलते पर एक दूसरे से बोलते नहीं थे , फ़कीर जब बाबा को देखता तो अल्लाह तौबा कह के मुंह फेर लेता और जब बाबा फ़कीर को देखता तो राम राम किसका मुंह देख लिया कह के मुंह फेर लेता। यह क्रिया कई  सालो तक चलती रही , बाबा और फ़कीर दोनों भीख मांगते और अपने लिए बचा के शेष बेंच देते ।
पर बीते कुछ सालो से दोनों को भीख मिलना कम हो गया था , दिन बहुत कठिनाई से गुजर रहे थे दोनों के पर अब भी दोनों एक दूसरे से बात नहीं करते थे ।
कुछ महीने और बीत गए , अब दोनों को भीख मिलनी लगभग बंद सी हो गई थी ।

बाबा शरीर सूख के काँटा हो गया था , एक दिन शहर से भीख मांगते हुए वापस आते हुए बहुत थक गया पर झोली खाली थी । थक के वह मंदिर के चबूतरे पर सुस्ताने के लिए बैठ गया, तभी मज़ार पर रहने वाला फ़क़ीर भी शहर से भीख मांग कर वापस आ गया , उसके भी गाल पिचके हुए और शरीर पतला हो गया था लगता था की कई रोज से भरपेट खाना नहीं मिला था। झोला उसका भी खाली था ।
दोनों ने एक दूसरे को देखा पर इस बार पता नहीं क्या समझ के फ़कीर ने बाबा से ' आदाब' कह दिया और उसी चबूतरे पर बैठ गया । बाबा ने भी प्रतिउत्तर में राम राम कहा । जंहा सम्पनता में वे दोनों एक दूसरे का मुंह तक नहीं देखना पसंद करते थे वंही भूख और लाचारी ने दोनों को पास ला दिया था ।


फ़क़ीर ने बाबा की तरफ देखते हुए कहा" क्या बात है ? बहुत कमजोर लग रहे हो "
बाबा ने फ़कीर की बात सुन के एक ठंडी आह भरी और कहा " क्या बताऊँ भाई , कई दिनों से आधे पेट खा के गुजरा कर रहा हूँ । गाँव गांव भटकने के बाद भी भीख नहीं मिलती है , शहर में भी अब कोई एक रुपया भी नहीं देता,  बड़ी मुश्किल से दस बीस रूपये हो पाते हैं और मुट्ठी भी आंटा । जाने लोगो को क्या हो गया है ,कोई भी भगवान् के नाम पर भीख देने को राजी नहीं है ।

फ़कीर ने कहा - यह बात तुम बिलकुल सही कह रहे हो , अपना भी ऐसा ही हाल है । कोई भी अल्लाह के नाम पर पैसा देने को तैयार नहीं । गाँव में जाओ तो लोग बच्चों के हाथो से आधी कटोरी आंटा भेज देते हैं जिससे खाने भर का भी पूरा नहीं हो पाता।

बाबा ने आगे कहना जारी रखा- हाँ,लगता है की सभी नास्तिक हो गए हैं । पहले कितना मिलता था , कितना दान करते थे लोग की खाने के अलावा बहुत सा बेंच भी देते थे जिससे नगद पैसा भी बहुत आ जाता था , शाम के लिए शराब का  इंतेजाम भी आराम से हो जाता था ।

फ़क़ीर ने कहा - सही कहा , मैंने भी कई दिनों से चिलम नहीं लगाई , महंगाई इतनी हो गई है की लोगो ने खैरात देना बंद सा कर दिया है ।
बाबा ने कहा - ऐसे तो हम भूखे मर जायेंगे
फ़क़ीर ने कहा - हाँ कुछ उपाय करना पड़ेगा ताकि आमदनी आये
बाबा बहुत देर तक गंभीर मुद्रा में आँख बंद कर के सोचता रहा , फिर उसने आँखे खोली तो कहा की हम थक गए हैं लोगो के दरवाजे दरवाजे जा जा के अब उपाय ऐसा करना पड़ेगा की लोग हमारे पास आये । फ़क़ीर ने सहमति से सर हिलाया।
बाबा ने फ़कीर के कान में बहुत देर तक कुछ समझता रहा , फ़कीर बीच बीच में सहमति में  सर हिलाता रहा।

दो दिन बाद चरवाहे जब अपने पशु को लेके उस मंदिर के पास से गुजरे तो उन्हें बहुत अच्छी खुसबू हवा मे महकती हुई महसूस हुई ,वे जिज्ञासा वश खुसबू के स्रोत की तरफ चल दिए । उन्होंने देखा की मंदिर के परिसर में एक लंगोटी पहने बाबा ध्यान मुद्रा में बैठा है । उसके चारो तरफ धुनि जल रही है और खुसबू उसी में से आ रही है । चरवाहो ने सोचा की कोई बड़ा साधू है और वे श्रद्धा वश वंही बैठ । थोड़ी देर बाद बाबा ने आँखे खोली और सब पर जल छिड़कता हुआ मन्त्र बुदबुदाने लगा । बाबा ने जल की कुछ बुँदे सामने बने ताजाबने  कुण्ड में रखी टुकड़े की हुई लकडियो पर डाला ।

जल पड़ते ही कुण्ड की लकडियो में आग लग गई । चरवाहों ने जब यह दृश्य देखा तो वे बाबा को कोई सिद्ध पुरुष समझ के उसके कदमो में लोट गए । चरवाहों ने बाबा से पूछा की आप कौन हैं ?
बाबा ने उत्तर दिया की वह अब से पहले हिमालय की गुफाओ में तपस्या कर रहा था और कल ही यंहा आया है ,लोगो की मन की मुरादे पूरी करने के लिए ही वह अपनी तपस्या छोड़ के आया है "

चरवाहे बाबा की जय जयकार करने लगे और तुरंत अपनी गाय से दूध दुह के बाबा को भेंट कर दिया । बाबा ने दूध पीते हुए कहा की पास वाले मजार पर भी एक पंहुचा हुआ औलिया आया है जा के उसके भी दर्शन कर लो । जाते वक्त चरवाहों ने श्रद्धा वश एक दो रुपया बाबा को चढ़ा दिया ।

बाबा की बात सुन के सब चरवाहे मजार पर पहुच गए , उन्होंने देखा की एक हरे कपड़ो में बाबा बैठ है जिसके सामने रखे एक कटोरे में  लोबान जल रही है । लोबान से मनमोहक सुगंध आ रही है । फ़क़ीर ने भी चरवाहों को देखा तो अपने पास पड़े लौटे से पानी की अंजलि भरी और लोबान वाले कटोरे में कुछ बड़बड़ाते हुए छिड़क दिया । लोबान की आग  बुझने की वजाय और भड़क गई । चरवाहों का आस्चर्य का ठिकाना न रहा उन्हें फ़कीर के पैर छूते हुए परिचय पूछा । फ़कीर ने बताया की वह शिरडी से सीधा यंहा आया है और लोगो के ऊपर से जिन्न ,भूत प्रेत आदि की बाधा दूर कर के उन्हें धन दौलत से मालामाल कर देता है।
बस फिर क्या था फ़कीर के लिए भी तुरंत दूध का इंतेजाम हो गया और चरवाहों ने एक रूपये दो रूपये अपनी समर्थता के अनुसार फ़क़ीर के चरणों में रखते गए ।

अगली सुबह पास के गाँव के  दर्जनों लोग बाबा और फ़कीर के दर्शनों के लिए पहुच चुके थे , सब अपनी अपनी श्रद्धा के अनुसार फल,मिठाइयां  और कुछ दान दक्षिणा दे रहे थे ।
एक सप्ताह भी नहीं बीता ही दसियों गाँवो के लोग बाबा के मंदिर और फ़कीर के माजर पर मत्था टेक चुके थे । हिन्दू लोग मंदिर में भजन कीर्तन करते तो मुस्लिम लोग मजार पर चादर चढ़ा के और कब्बाली गाते । बड़ी संख्या में लोग मंदिर और बाबा की सेवा में लगे रहते ।
इधर मुस्लिम लोग मजार और फ़कीर की सेवादारी नहीं करते थकते ।

कुछ ही महीनो में मंदिर और मज़ार शहर तक प्रसिद्ध हो गए , बड़ी बड़ी गाडियो में लोग बाबा और फ़कीर के दर्शन करने आते और मन्नते मांगते। खूब चढ़ाव आने लगा मंदिर और मजार में , प्रशासन को जब पता चला तो उसने वंहा बिजली का इंतेजाम करवा दिया मंदिर और मजार तक जाने के लिए पक्की रोड बन गई थी । बस अड्डे और रेलवे स्टेशन से सवारी ढोने वाले वहां सीधा मंदिर और मजार तक जाने लगे । जंहादिन में भी लोग जाने से कतराते थे अब उस वीरान मंदिर मजार के आस पास बड़ी संख्या में  तरह तरह के समान की दुकाने खुल गई थी । हर दुकान से बाबा और फ़कीर का कमीशन बंधा हुआ था ।


पुरुष ही नहीं अब स्त्रियां भी बाबा और फ़कीर की सेवा में लग गई थीं , बाबा के पास हिन्दू औरतो की लाइन लगती जो सौतन से छुटकारा, पति काउनके प्रति  अप्रेम, बच्चा होने जैसी समस्याओ का निबटारा चाहती थी। तो दूसरी तरह मुस्लिम औरते भी यही समस्याएं लेके फ़क़ीर के पास आती।
बाबा और फ़कीर ने दान चढावे, दुकान का कमिशन  आदि का हिसाब किताब रखने के लिए तीन तीन मुनीम रख लिए थे । पचास साल के बाबा फ़कीर अब 30-35 साल के जवान लगने लगे थे ।

दिन ब दिन मंदिर और मज़ार के भक्तो की संख्या बढ़ती जा रही थी , एक दो कंस्ट्रक्शन कंपनिया अब मंदिर और मज़ार के आस पास की जमीनों पर फलैट बना के बेचने का विचार कर रहे थे और इसके लिए बाबा और फ़कीर को मोटी रकम कमीशन के तौर पर  अड्वान्स दे दी गई थी तथा तीन तीन फ्लेट्स मुफ़्त देने का वादा अलग से।

बस यूँ ही कहानी आगे बढ़ती रही ...



Thursday, 17 August 2017

पकवान- कहानी



माथे पर चन्दन का लम्बा तिलक लगाएं स्वामी जी ऊँचे मंच पर बैठे लोगो को आत्मा- परमात्मा पर प्रवचन दे रहे थे । कुछ क्षण रुक पास पड़े मिश्री और इलाइची के पात्र से कुछ मिश्री के टुकड़े और इलाइची उठा मुंह में डालते हुए फिर से प्रवचन देने लगे- भक्तो! कलियुग युग में जो व्यक्ति गुरुओं की सेवा करेगा, धर्म पुरुषो की सेवा करेगा, ब्राह्मण- गाय की सेवा करेगा , दान- पुण्य करेगा वह अपने समस्त पापो से मुक्त हो बैकुंठ धाम जायेगा...... वह स्वर्ग जा सभी सुखों का भोग करेगा.....जो यंहा जितना दान-पुण्य करेगा , धर्म पुरुषो की सेवा करेगा वह स्वर्ग में आन्नद ही आनंद का भोग करेगा उसकी आत्मा वंहा सभी सुख भोगेगी "

उनके प्रवचन पर जनता झूम झूम जा रही थी ,चारो तरफ भक्तिमय माहौल के साथ स्वामी जी के जयकारे गूंज रहे थे।

इसी तरह आत्मा द्वारा  स्वर्ग में अनगिनत  परालौकिक सुखो  के भोगने का आश्वासन दे स्वामी जी ने कुछ घंटे बाद अपने प्रवचन का समापन किया।

घुरहू हाथ जोड़े उठा और स्वामी जी से अपने घर भोजन के लिए आग्रह करने लगा।
घुरहू ने कहा -" महाराज! मेरी पत्नी ने आज  रसगुल्ले, इमरती, शुद्ध दूध की रबड़ी, बर्फी , देशी घी की पूड़ी- कचौड़ी, मोतीचूर के लड्डू, बादाम की खीर, पनीर की सब्जी ...और न जाने क्या क्या बनाया है ... आपस आग्रह है कि आज रात का भोजन मेरे घर कर मुझे कृतज्ञ करें"

स्वामी जी वैसे शायद मना कर देते किन्तु इतने सारे पकवानों का नाम सुन उनके मुंह में पानी आ गया अतः घुरहू का आग्रह ठुकरा न पाएं और चल दिए घुरहू के घर रात का भोजन करने।

घुरहू ने स्वामी जी के  भोजन के लिए साफ- सुधरा आसन बिछा दिया । स्वामी जी घुरहू की श्रद्धापूर्वक आव भगत देख के गदगद हुए जा रहे थे ।

स्वामी जी को आसन पर बैठाने के बाद घुरहू बोला -"महाराज ! जब तक भोजन नहीं आता तब तक कुछ वार्तालाप ही हो जाए....मैं भोजन के बारे में ही बता दूं" और इतना कह घुरहू आने वाले भोजन के बारे में बताने लगा ।
"कढ़ाई में छन-छन करता हूआ शुद्ध देशी घी जिसकी सुगंध ही व्यक्ति का मन मोह ले ,उसमे सिंकती हुई कचौड़ियां जिसमे भरे हुए है  बादाम- काजू , मुन्नका... आहा!... वो सफ़ेद शुद्ध चासनी में डूबे तेज भूरे रंग के गुलाब जामुन.... वाह!... वह गाय के खोये से बनी पिस्ता वाली बर्फी...... जिसपर करीने से काजू कात के लगाये गएँ हैं.... वाह!"

घुरहू स्वाद लेके खाने में एक एक व्यंजन की तारिफ कर रहा था ,तारीफ़ सुन स्वामी जी बेकाबू हो रहे थे  भूंख कंट्रोल से बाहर हुई जा रही थी। आँखों के सामने घुरहू के बताये व्यंजनो के दृश्य सजीव हो उनके इर्द - गिर्द नाचने लगे थे।

तकरीबन आधी रात होने वाली थी किन्तु घुरहू ने अब तक स्वामी जी के सामने भोजन नहीं परोसा था बस व्यंजनो की प्रसंसा किये जा रहा था-
" पहले धार के दूध की गाढ़ी खीर , खीर में केसर, बादाम से हल्का सुनहरा रंग .… वाह .. जैसे अमृत हो... और पनीर की सब्जी..." घुरहू पनीर की सब्जी के बारे में बताने वाला ही था कि उसकी पत्नी एक थाली में चटनी रोटी लेके आई और स्वामी जी के सामने रख चली गई।

 सुखी रोटी और चटनी देख स्वामी जी क्रोध मे खड़े होते हुए बोले-"मुर्ख....अधर्मी ....पापी... कितने घण्टे से तू मुझे  यंहा भूँखा बैठाये हुए है , व्यंजनो के नाम बता बता उसकी तारीफ किये जा रहा है और खाने को यह सुखी रोटी और चटनी !!"

घुरहू हाथ जोड खड़ा हो गया और  बोला- महाराज! जिस तरह से सुबह आप हमें सारा दिन स्वर्ग में मिलने वाले अद्धभुत और वैभवशाली वस्तुओ को बता के खुश कर रहे थे वैसे ही मैं भी आपको स्वादिष्ट व्यंजनो के बारे में बता के खुश कर रहा था .... आप हमें खुश कर रहे थे और मैंने आप को खुश कर दिया .... आप को ये सब व्यंजन मैं स्वर्ग में अवश्य खिला दूंगा.... अभी तो आप चटनी रोटी  खाइये " इतना कह घुरहू के चेहरे पर एक व्यंगात्मक मुस्कान छा गई।

स्वामी जी  घुरहू की बात सुन अवाक रह गए  , उन्हें आशा न थी घुरहू जैसा अनपढ़ उनसे ऐसी बात कर सकता है । वे किंकर्तव्यविमूढ़  हो कुछ क्षण खड़े रहे फिर मुड़े और तेजी से घुरहू के घर से निकल गएँ।

सुबह पता चला  की स्वामी जी वापस अपने धाम चले गए हैं।



Sunday, 23 July 2017

'ओम मणि पद्मे हुम्'

'ओम मणि पद्मे हुम्'

इस मन्त्र के विषय में यह मान्यता फैली है कि संस्कृत का यह मंत्र बौद्ध धर्म शाखा या तिब्बती बौद्ध में प्रचलित है ,यह मंत्र अवलोकितेष्वर यानि करुणा बोधिसत्व का द्योतक है।

 ओम का अर्थ ओम है , मणि का अर्थ गहना( माणिक या रौशनी -चमक) है , पद्मे का अर्थ कमल का फूल है जिसका अर्थ चेंतना किया और हुम् का सत/ आंनद अर्थ है।

यह भी आश्चर्य है कि संस्कृत के विद्वान तो इसे बुद्ध का मंत्र तो मानते ही है पर बौद्ध विद्वान भी इसे बुद्ध का मन्त्र मानते हैं।
जबकि सत्य है कि बुद्ध के समय संस्कृत थी ही नहीं।

संस्कृतवादियों का इस मंत्र को बुद्ध का मंत्र बताने का आशय यह रहता है कि बुद्ध को संस्कृत के बाद का सिद्ध किया जा सके ।

किन्तु यह मंत्र बुद्ध वचन नहीं है बल्कि यह मन्त्र  वज्रयान के तंत्रवाद का है।

ओम मणि पद्मे हुम् का अर्थ करते हुए देवीप्रसाद जी कहते है कि इसका सीधा अर्थ है 'ओम वह मणि जो पद्म पर विराजमान है'।

तंत्रवाद की योगसाधना को शत-चक्र भेद कहा जाता है । तांत्रिकों के अनुसार  इस का सैद्धांतिक आधार शरीर रचना के बारे में है ।
तंत्रवाद के अनुसार दो नाड़ियां हैं जो सुषुम्ना नाड़ी के दोनों ओर समान्तर चलती हैं, सुषुम्ना नाड़ी नितम्ब से लेकर मस्तिष्क तक जाती है और इसी लिए सामान्यतः इसी को रीड की हड्डी माना जाता है।

सुषुम्ना के अंदर एक और नाड़ी मानी जाती है जिसे वज्रख्या कहते हैं इसके बीच एक और नाड़ी है जिसे चित्रिणी कहते हैं। सीधे शब्दों में चित्रिणी सुषुम्ना नाड़ी का अंतरिम भाग है ।

तंत्रवाद में ऐसा माना जाता है कि सुषुम्ना नाड़ी के सात अलग अलग स्थानों पर सात पद्म (कमल) है ।आधुनिक तांत्रिक इसे स्नायुजाल कहते है किंतु प्राचीन तंत्रवाद के जानकार पद्म या कमल को योनि या भग का प्रतीक मानते है। प्राचीन तंत्रवाद में योनि या भग को पद्म से ही दर्शाते थे ।

प्राचीन तंत्रवाद के जानकार एल. डिलवालपोलियो ने कहा  "वज्र जिसका दूसरा नाम मणि है वह पुरुष के लिंग का रहस्यमय नाम है  ठीक उसी प्रकार जैसे योनि या भग का साहित्यिक नाम पद्म है"

प्रचीन कई सभ्यताओं में भी कमल को योनि का प्रतीकात्मक महत्व दिया गया था , इसलिए सुषुम्ना नाड़ी पर सात कमल नारीत्व के साथ स्थान हैं और तंत्रवाद के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के अंदर हैं ।
विभिन्न तंत्रों के अनुसार सात पद्मो के निश्चित आकार के चित्र होते हैं , इन चित्रों में अधिकाँश पद्मो में त्रिकोण चित्र बने होते हैं । तंत्रवाद में त्रिकोण अनिवार्य भग या योनि का प्रतीक होते हैं ।

शत-चक्र भेद के इन पद्मो पर सात शक्तियों जैसे कुलकुण्डलिनी , वाणिनी, लाकिनी आदि उल्लेख होता है।ये सातों शक्तियां प्रत्येक पद्म पर विरजमान होती हैं।

तंत्र साधना में कुण्डलनी शक्ति(सुप्त पड़े नारीत्व) को नितम्बो के पास  सुष्मन्ना नाड़ी के अंतरिम केंद्र में जाग्रत किया जाता है और एक एक पद्म पर कर इसे मस्तिष्क तक लाया जाता है । सुषुम्ना के सबसे ऊपरी कमल को सहस्त्र- दल- पद्म कहा जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है हजार पंखुड़ियों वाला कमल । कई विद्वान इसे हजार पिण्डको( अंडों) वाला ऊपरी मस्तिष्क कहते हैं जिसमे सभी पिंडक कुंडली के रूप में पड़े हैं। तांत्रिकों के अनुसार यह चेतना का सबसे उच्चतम निवास है।

तंत्रवाद के अनुसार पुरुषतत्व सहस्त्र-दल- पद्म में नारीत्व के साथ ही विरजमान है और कुण्डलनी शक्ति जब वँहा तक पहुँच जाती है तो पुरुषतत्व के साथ मिल के एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं। उनका कोई अलग अस्तित्व नहीं रहता ,सब कुछ नारीत्व में विलीन हो जाता है और चेतना का उच्चतम अवस्था अन्तरतल में जाग्रत हो चुकी होती है।

अब आपकेमस्तिष्क में शायद यह प्रश्न भी आ सकता है कि ओम तो संस्कृत का शब्द है तो बौद्ध धर्म में क्या कर रहा है?
पर यह सत्य नहीं है ओम बौद्ध शाखा के तंत्रवाद का शब्द है जो तांत्रिक क्रियाओं में प्रयोग होता था ।

ठीक ऐसे समझिये की तंत्रवाद के इस मन्त्र 'ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' में नारी शक्ति को जाग्रत किया जा रहा है । अब कोई  ऐं ह्रीं क्लीं ' का संस्कृत अर्थ बताये ?

अतः यह कहना की 'ओम मणि पद्मे हुम्' बुद्ध वचन है तो सर्वदा गलत है। बल्कि यह वज्रयान का मंत्र है ।
चित्र-शत-चक्र भेद(सप्त कमल)

क्रमशः

Monday, 17 July 2017

एक शहीद ये भी-



कल दिल्ली में चार सफाई कर्मियों की मौत की खबर पढ़ी, सेफ्टिक टैंक को साफ़ करने के दौरान जहरीली गैसों से उनका दम घुटने के कारण उनकी मौत हो गई।
यह पहली घटना नहीं बल्कि ऐसा कोई दिन ही होता होगा जब देश के किसी न किसी कोने में किसी न किसी सफाई कर्मचारी की मौत होती है ।

यदि कोई सैनिक बार्डर पर दुश्मनों से लड़ता हुआ मारा जाता है तो उसके प्रति पुरे देश की आम और ख़ास जनता में शोक और संवेदनाओं की लहर दौड़ पड़ती है , ऐसा होना भी चाहिए आखिर सैनिक हमारी ही सुरक्षा के लिए शहीद होते हैं।
सफाई कर्मचारी भी हमारी ही सुरक्षा में लगा एक सैनिक ही होता है जो हमारे लिए ही शहीद होता है ,किन्तु जब वह शहीद होता है तो देश में कोई शोक और संवेदनाओं की लहर नहीं होती। उसके शहादत पर कोई चर्चा नहीं होती , शायद ऐसी जातियता की मानसिकता के कारण होता है।

सफाई कर्मचारी ....जो नंग्गे बदन बिना किसी जीवन रक्षक उपकरण के बदबूदार , जहरीली गैसों से भरे गटर में उतर जाता है बिना अपनी जान की परवाह किये ठीक वैसे ही जैसे एक सैनिक हमारी रक्षा के लिए बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के उतर जाता है मैदान में ।
ये सफाईकर्मी जो उतर जाता है गटर साफ करने ताकि शहर में गंदगी न हो ... ताकि हमारे घरो -सड़को में गंदगी न हो और देश की जनता परेशान न हो बीमार न पड़े ....स्वस्थ रहे ।
बार्डर पर दुश्मन पडोसी मुल्क का सैनिक होता है जबकि यहाँ बीमारियां और जनता की परेशानियां जिससे एक सफाई कर्मचारी बखूबी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए लड़ता है ।

सोचिये जब भरी बारिश होती है , शहर के गली मोहल्ले की सड़के पानी और कूड़े करकट से बिलकुल जाम हो जाती है जिनमे पैदल चलना भी नामुमकिन हो जाता है , हमारे घरो तक में पानी भर जाता है जीवन दूभर हो जाता है । तब ऐसे में सफाई कर्मचारी नाम का सैनिक बिना किसी जीवन रक्षक उपकरण के अपनी जान पर खेल, दिन रात जानलेवा गटर में घुस घुस के उसे साफ़ करता है ताकि हमारा जनजीवन सुगम हो सके ।

आउटलुक पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल लगभग 1000 सफाई कर्मचारी गटर साफ़ करते हुए शहीद हो जाते हैं । आउटलुक पत्रिका यह दावा करती है की उसके पास 2015 में मारे गए सफाई कर्मचारियों जिनकी मौत सैफ्टिक टैंक और गटर साफ करते हुई है उनका ब्यौरा है जिसकी संख्या 300 से अधिक है ,ये आंकड़े स्वयं पत्रिका ने एकत्रित किये है जबकि पूर्ण आंकड़े सरकार उपलब्द करवाने में असमर्थ है मृतको की संख्या सालाना 1000 से अधिक भी हो सकती है ।

आगे पत्रिका लिखती है की चैन्नई के तांबरम में रहने वाली नागम्मा अभी साफ़ सफाई का कार्य करती हैं । उनकी दो बेटियां है , उनके पति की मृत्यु 2007 में गटर साफ़ करते हुए थी जिसमें तीन अन्य सफाई कर्मचारियों की भी मौत हुई थी , सरकार ने कोई भी आर्थिक मदद नहीं की और न ही अन्य लोगो ने ।कहते कहते नागम्मा के आँखों में आंसू आ जाते हैं ।

हैदराबाद की दलित बस्ती में एक गन्दी सी झोपडी में बड़ी मुश्किल से गुजर बसर करने वाली श्रीलता बताती है उनके पति की मृत्यु सैफ्टिक टैंक साफ़ करते हुए मौत हुई उनकी 8 साल की बेटी ग्रीष्मा बताती है की वह बड़ी होके डॉक्टर बनना चाहती है क्यों की डॉक्टरों ने उसके पिता का इलाज ठीक से नहीं किया ... पापा गटर से बहार निकाले गए थे न इसलिए कोई डॉक्टर उन्हें छूने को तैयार न था ... मैं बड़ी होके अपने लोगो का ढंग से इलाज करुँगी " यह कह के ग्रीष्मा और उसकी माँ दोनों रोने लगे।

जिस समय आप मेरा लेख पढ़ रहे होंगे उस समय देश में हजारो सफाई सैनिक अपनी जान जोखिम में डाल के गटर और सीवर में उतर रहें होंगे ताकि आम जनता बीमारियो से बची रहे पर वह सैनिक खुद विषाणुओं और जहरीली गैसों से अपनी जान नहीं बचा पाता। मरने वाले सफाई सैनिको के परिवारवाले कितने दयनीय स्थिति में रहते हैं और जिन्दा रहने के लिए कितना संघर्ष करते हैं इसकी कल्पना करना मुश्किल है ।

केंद्र सरकार से लेके राज्य सरकार और जिला प्रशाशन की भयानक अवहेलना झेलते इन सफाई सैनिक परिवरो को भी देश के लोगो की सांत्वना और मदद की जरुरत है .... ठीक वैसे ही जैसे बार्डर पर मरने वाले सैनिक परिवारो को ।

एक बात और, जिस दिन गटर /टैंक  सफाई करते समय सिर्फ एक जाति विशेष के लोग न मर के अपने को उच्च जाति के कहलाने वाले भी मरने लगेंगे उसी दिन सफाई का काम मशीनों द्वारा होने लगेगा।
तब तक हम अभिशप्त हैं अपने भाइयों की मौत पर रोने के लिए ....


Sunday, 16 July 2017

शिव-


शिव की की कल्पना मुख्यतः अवैदिक थी और मूल रूप से अस्ट्रिको/ द्रविड़ संस्कृति की देन  है ।

शिव का तमिल नाम सिवन है जिसका अर्थ लाल या रक्त वर्ण होता है । ऋग्वेद में रूद्र का जिक्र है जो बहुत कुछ शिव के समान ही हैं , जटाधारी , प्रकृति रूप से भयानक ।रूद्र का अर्थ भी लाल ही होता है ।
इसी प्रकार शम्भू शब्द की तुलना तमिल के 'सेम्बू' से की जाती है जिसका अर्थ होता है तांबा या लाल धातु।

रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि वैदिकों का रूद्र कुछ कुछ अवैदिको के शिव / सिवन जैसा ही था अतः थोड़ी कठिनाई के बाद रूद्र शिव में विलीन हो गए इसकी पुष्टि शिव के विषय में कही जाने वाली एक कथा से होती है जिसमे दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शिव को स्थान नहीं दिया गया था ।शिव पार्वती का विवाह भी बेमेल सा है जिसमे पार्वती की माता शिव को दामाद के रूप में बिलकुल पसन्द नहीं करती हैं।
सम्भवतः बाद में वैदिकों और अवैदिको में विवाह संबंधों के कारण शिव को रूद्र के रूप में स्वीकृति मिली , अथवा सांस्कृतिक आदान प्रदान से शिव रूद्र बने। अतः ऑस्ट्रिको / द्रविड़ो के जो ताम्रवर्ण प्रतापी देवता थे वे वैदिकों के मारुतस्वामी रूद्र से मिल गएँ।

धीरे धीरे शिव का रूप अत्यंत विकसित हो गया जिसके एक छोर पर ऑस्ट्रिको/ द्रविड़ो के पारंपरिक शिव जो फक्कड़, दयालु, भांग पीने वाले , भयंकर रूपरंग लिए  जंगली जनजातियो के नायक ,सिंह की खाल ओढ़े ,  नृत्य करने वाले थे तो दूसरे छोर पर वैदिकों के रूद्र जो दार्शनिक रूप में दर्शाए जाने लगे।

एक बात और गौर करने लायक की सिंधु सभ्यता ताम्र सभ्यता थी ,लोहू का अर्थ तांबे के लाल रंग से ही है। सिंधु सभ्यता  में  जो ध्यानस्थ , सींगों का टोप पहने ,चारो तरफ जंगली पशुओँ का जमावड़ा आकृति मिली है वह ऑस्ट्रिको / द्रविड़ो के सिवन या सेम्बू से काफी हद तक मिलती है।

भारत में एक और जाति के लोगो का उल्लेख मिलता है वे हैं किरात , संस्कृत ग्रन्थो में इन्हें मलेच्छ कहा गया है। किरात जाति के लोग तिब्बत से लेके नेपाल,मणिपुर , असम , त्रिपुर, उत्तर प्रदेश ,बिहार तक फैले हुए हैं।
किरात लोग भारत में कब आये यह कहना तो मुश्किल है किंतु इनका अस्तित्व भारत में अति प्रचीन रहा है , आर्यो से भी पहले का ।
महभारत में जब अर्जुन का युद्ध शिव से हुआ था तो वे किरात के भेष में ही थे। चित्रगन्धा किरात राजकुमारी ही थी।
किरात जाति का मुख्य अधिपत्य हिमालय रीजन में था , शिव का भी निवास स्थान हिमालय ही बताया जाता रहा है।

गंगा के कई मैदानी इलाकों में 'कीरा'शब्द प्रसिद्ध है जिसका अर्थ 'साँप ' से लिया जाता है , कीरा शब्द किरात का अपभ्रंस है । शिव जी के गले में साँप की माला है  जो इस बात का द्योतक है कि सांप शिव के अति प्रिय रहे होंगे।
अर्थात किरात जाति कभी शिव की अनुयायी रही होगी या शिव उन्ही की जाति के कबीले के  कोई नायक रहे होंगे ।

बौद्ध ग्रन्थो में नागों को बुद्ध का अनुयाई बताया गया है, नाग जाति के लोग बुद्ध की सुरक्षा करते थे । बुद्ध के सबसे पहले अनुयाई वही लोग बने थे ,बुद्ध को भोजन कराने वाली सुजाता नाग जाति की कन्या थी। दिनकर जी जैसे इतिहासकार कहते है कि लिच्छवी और शाक्य(सक्क)  वंशीय जनजाति किरात भंडार से निकले थे । इसलिए बुद्ध के प्रति नागों में विशेष सम्मान था।

अब बुद्ध और शिव में क्या कुछ सम्बन्ध हो सकता है?



Thursday, 29 June 2017

बरसात की एक रात-


शाम  से ही घने -श्याम मेघों का जमवाड़ा आसमान में शुरू हो गया था , कई दिनों की बदन झुलसाउ गर्मी के बाद काले मेघों का दीदार  नैसर्गिक आंनद की अनुभूति करवा रहा था ।

तक़रीबन डेढ़ -दो घण्टे जी भर के उमड़ने -घुमड़ने  बाद काले मेघों ने अपने कंधे पर लादे वजन को कम करना आरंभ कर दिया , कंधे से मुक्त हुई जल की बूंदे धरा से मिलने के लिए बैचैनी  यूँ भागीं जैसे अपने प्रीतम से मिलने कोई प्रेमिका।

झमा-झम वर्षा ....

मैंने दुकान में से झांक के बाहर देखा तो भगदड़ सी मची हुई थी, लोग वर्षा से बचने के लिए इधर-उधर छुपने की जगह तलाश रहे थे। जिसको जंहा जगह वंही छुपने की कोशिश कर रहा था , मानो वर्षा की बूंदे न होके आग के गोले हों जो उन्हें जला के भस्म कर देंगे अथवा वे खुद कागज़ के बने हों बस पानी पड़ते ही गल जायेंगे।

कुछ ही देर में मेरी दुकान के शैल्टर के नीचे बारिश से बचने के लिए काफी लोग एकत्रित हो गएँ थे ।

मुझ से रुका नहीं जा रहा था  , मन कर रहा था कि भाग के बाहर जाऊं और बारिश में खूब नहाऊं। न जाने कितने दिन बीत गए थे वर्षा की बूंदों को अपनी हथेलियों से पकडे हुए । पानी में छप-छप पैर मार के किसी छोटे बच्चे की तरह उछले हुए।

कुछ देर अपने को नियंत्रित किया ,किन्तु  स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी में गिरती बूंदों की चमक ने आख़िर अपना काम कर ही दिया । मैंने तुरन्त अपने  हैल्पर से दुकान बन्द करने को कहा । पहले तो वह तैयार न हुआ ,कहने लगा की ऐसी बारिश में दुकान बंद कर के कैसे घर जाएंगे? भीग जायेंगे।

मैं मुस्कुरा के कहा  "बेवकूफ़ !आज भीगना ही तो है ..... इतना रूमानी मौसम रोज नहीं होता"।
वह मुझे आश्चर्य से देखने लगा ,फिर थोड़ा जोर देने पर दुकान का शटर डाउन कर दिया ।
मैंने अपना मोबाइल और पर्स एक प्लास्टिक की थैली में रखा और शटर का ताला लगा के सड़क पर खड़ी मोटरसाइकिल के पास आ गया।

शैल्टर के नीचे खड़े लोग मुझे देखने लगे थे ,जैसे कह रहे हों " बेटे भीग ले .... बीमार पड़ेगा तब पता चलेगा "

मैंने लोगो को चिढ़ाने वाले अंदाज में उनकी तरफ देखा जैसे कह रहा हूँ " डरपोक!" और मोटरसाइकिल में किक मार के चलता बना ।

बारिश में मोटरसाइकिल चलाते हुए भीगने का मजा ही कुछ और होता है खास कर तब जब लोग अपनी मोटरसाइकिल्स को किनारे लगा के किसी पेड़ या छज्जे के नीचे दुबके पड़े हों। आप उन पर उपहास की दृष्टि डालते हुए  उनके सामने से हुर्र- हुर्र करती हुई अपनी मोटरसाइकिल पर निकल जाएं।

लगभग एक किलोमीटर की दूरी ऐसे ही गर्व से भीगते और बारिश का जम के मजा लेते हुए निकाल गया। रास्ते में एक नाला पड़ता है , जिसकी दीवार के सहारे कई बंजारों ने अपनी अस्थाई झोपड़ियां बनाई हुई है ।

जैसे ही उन झोपड़ियों के पास पहुंचा अचानक मेरी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी। देखा तो एक स्त्री और उसके तीन छोटे छोटे बच्चे जो की दस साल से कम ही रहे होंगे बारिश में भीग के अपनी झोपडी की छत पर फटा हुआ तिपाल बिछा रहे हैं । अंदर पूरा सामान गीला हो चुका था , तेज बारिश के कारण झोपड़ी की सड़ चुकी प्लास्टिक  तिरपाल जो छत का काम करती थी बुरी तरह से टपकने लगी थी जिससे सारा सामान भीग गया । झोड़पी के बाहर कच्चा चूल्हा भी टूट चुका था। स्त्री और उसके बच्च चिंता में  भीगते हुए फ़टी हुई तिरपाल से अपने सामान को खराब होने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थें। मैं सोचने लगा की ये लोग क्या खाएंगे और कैसे सोयेंगे रात में यदि बारिश यूँ ही पड़ती रही तो? 

एक दूसरी झोपडी में सड़क का गंदा पानी घुस गया था ,जिसे पूरा परिवार गिलास और टूटे हुए कटोरों से निकालने की कोशिश कर रहा था । वे झोपडी स  जितना पानी निकालते उससे अधिक वापस अंदर जा रहा था।

ऐसा ही हाल लगभग हर झोपडी का था । मैं काफी देर तक यूँ ही खड़ा उन अस्थाई झोपडी वाले बंजारों  बारिश से लड़ने की जद्दो-जहद को देखता रहा । बारिश उनके लिए एक अभिशाप थी।

अब बारिश की बूंदे मुझे अंगारे लगने लगे थे , ये अंगारे मेरे बदन के साथ -साथ मेरे हिर्दय को भी भस्म किये जा रहे थे । अब मैं चाह रहा था कि बारिश उसी क्षण  बंद हो जाये।

Tuesday, 27 June 2017

बारात-कहानी

"अरे ओ घुरहू....... " हरिकेश पाण्डेय ने खेत की मेढ़ पर खड़े लगभग  चिल्लाते हुए आवाज लगाई।

कंधे पर फावड़ा लिए अपने खेत की तरफ जाते हुए घुरहू ने जब पाण्डेय जी की 'गर्जना' सुनी तो वंही ठिठक कर रुक गया। घुरहू ने तुरन्त भय से दोनों हाथ जोड़े लिए और सर को झुकाते हुए कहा- " पाय लागू पण्डे जी "

"हम्म बड़ी मस्ती में जा रहा है ? क्या बात है ? " पाण्डेय जी ने  पूछा ।

" पाण्डे जी ... उ हमरे बड़का बेटवा चंद्रवा का बिआह पक्का हो गइल ,अगले महीनवा में " घुरहु का चेहरा ख़ुशी से खिल गया किन्तु नजरे झुकी ही रही।

" अच्छा, वही चंद्रवा जो बम्बई गया है कमाने क्या? पाण्डेय जी ने पूछा ।

" हाँ जी , उहै चंद्रवा .... बम्बई में कौनो फैक्ट्री में  सुपरवाइजर है । अब बिआह लायक होइ गइल बाय और कमाई भी ठीक बाय ओकर " घुरहु ने कहा

पाण्डेय जी घुरहू की इस बात पर थोड़ा असहज होते हुए कहा - " ठीक है , चमरौटी में सबन के लड़के धीरे धीरे बाहर निकल रहें और शहर में काम धाम कर के अच्छा पैसा काम रहें है , अइसन ही चली तो यंहा खेतो में काम कौन करेगा? हुक्का- पानी बन्द करना पड़ेगा का तुम लोगन का ?"

घुरहु बुरी तरह सहम गया पांडेय जी की धमकी से  हाथ जोड़ते हुए कहने लगा -
" पांड़े जी, हम हैं न मजदूरी करने के लिए , अब लडिके बाले थोडा पढ़ लिख लेहल त दुइ पैसा कमाए चली गइलन "

"चल ठीक है जैसी तुम लोगो की मति ....अब जा  इहाँ से " - पाण्डेय जी ने घुरहु को झिड़कते हुए कहा , घुरहु ने पाण्डेय जी के पैर छुए और तेजी से खेतो की तरफ निकल गया ।

उत्तर प्रेदश का यह एक छोटा सा गाँव था , जिसमे करीब 80 घर होंगे  ,जिसमे 20-25 घर दक्षिण दिशा में बसे चमरौटी टोले में और बाकी के या तो  सवर्णो या उससे कुछ नीची जातिओ के।

गाँव से बहार जाने के लिए एक ही मुख्य रास्ता था जो की सवर्णों के टोले से होके गुजरता था ,

ठीक एक महीने बाद ,घुरहु के घर में शादी की तैयारी हो रही थी । चंद्रपाल मुम्बई से अपनी शादी के सभी जरुरी सामान ले आया था, नया सूट और काले चमकते जूते ,सेहरा आदि सभी कुछ। मुंबई में रहने के कारण उसे शहर के रहन -सहन की कुछ आदत हो गई थी इसलिए वह अपनी शादी भी शहर के रिवाज की तरह करना चाहता था । बैंड बाजा, घोड़ी,शहरी कपडे आदि सब का उपयोग करने का अरमान था उसे अपनी शादी में ।

चंद्रपाल ने पास के कसबे से अंग्रेजी बैंड और घोड़ी भी माँगा ली थी  साथ ही बारात के लिए  एक ट्रैक्टर -ट्राली और दुल्हन लाने के लिए  जीप ।


 जैसे ही अंग्रेजी बैंड और सजी हुई घोड़ी चमरौटी टोले में पहुंची  के लोग उन्हें सुनने और देखने के लिए जमा होने लगे।आज तक उनके टोले से किसी की भी बारात में न तो अंग्रेजी बाजा आया था और न ही घोड़ी पर चढ़ के किसी ने बारात ही निकाली थी इसलिए कोतुहल जबरजस्त था चमरौटी टोले में ।

जैसे ही बैंड बाजे वालो ने बैंड पर धुन बजानी शुरू की बच्चे ख़ुशी से उछलने लगे।बुजुर्ग जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में सजी घोड़ी और बैंड बाजा नहीं देखा था अपनी बिरादरी की शादी में वे सब काम छोड़ बैंड वाले के पास जमीन पर ही बैठ के उन्हें देखने लगे थे । कई तो उत्सुकतावश घोड़ी को छू भी आते ।

घुरहू सीना फुलाए  घूम घूम के सब तैयारियों को जल्दी जल्दी पूरा करवाने में व्यस्त था ।

 आस पास के बिरादरी वाले भी चंद्रपाल की बारात निकासी देखने के लिए जमा होने लगे थे ।

तय समय पर  बारात निकासी होनी शुरू हो गई । चंद्रपाल सूट पहन के घोड़ी पर बैठे था ,सर पर सजे सेहरे की कलगी दूर से ही चमक रही थी मानो कोई राजकुमार बैठा हो।

बैंडबाजे वाले कभी भंगड़ा बजाते तो कभी फ़िल्मी धुन,  पुरे टोले के बच्चे बैंड पर नाच नाच के गिरे जा रहे थे । घोड़ी के साथ औरते स्थानीय भाषा  में गीत गाती चल रही थी , कुछ पुरुष घोड़ी के साथ चल रहे थे तो कुछ पहले ही जाके गाँव से बहार खड़ी  बारात की  ट्राली में बैठ गए थे ।

 चंद्रपाल की बारात घोड़ी और बैंड बाजे के साथ नाचते-गाते  मुख्य सड़क पर आ गया गई थोड़ी ही देर में  बारात   सवर्णों के टोले में प्रवेश कर गई।

 अभी कुछ दूर ही पहुँचे थे वे लोग  कि लगभग 20-30 लोगो की  भीड़ लाठी डंडो से लैस ठाकुर हरदेव के घर से निकल के चंद्रपाल की बारात पर टूट पड़ी , ऐसा लग रहा था की वे लोग पहले से तैयारी कर के बैठे थे ।

 इस अप्रत्याक्षित हमले से बारात में भगदड़ मच गई, चारो तरफ चीख-पुकार से माहौल गूंज उठा । बैंड वाले अपना बैंड छोड़ के भाग चुके थे ,घोड़ी वाला भी कंही गायब हो गया था।

हमलावर ना तो स्त्री देख रहे थे और ना ही  पुरुष सब पर लाठी -डंडे बरसा रहे थें । एक हमलावर  ने चंद्रपाल को घोड़ी से खींच लिया और जमीन पर पटक दिया ।
हमलावर के खींचने से सूट चर्र कर के फट गया ,सेहरा उछल के दूर जा गिरा । चंद्रपाल के गिरते ही उस पर अनगिनत लाठियों से प्रहार शुरू हो गया । कुछ ही क्षणों में कंही से उसका हाथ टूट गया तो कंही से पैर, सर पर लाठी लगने से खून की धारा बह के सड़क पर पडी धूल में मिल रही थी।
थोड़ी देर चीखने के बाद चंद्रपाल का शरीर शिथिल पड़ गया ।

  हमला करने वाले अभी भी शान्त न हुए थे ,वे लाठी डंडों से वार करने से साथ- साथ भद्दी गालियां देते हुए कह रहे थे- तुम चमा%# की इतनी हिम्मत की हमारे दरवाजो के सामने से घोड़ी पर चढ़ के बारात।निकालो!!..... भो#$% बहुत गर्मी चढ़ी है तुम लोगो को .....माद%^*@


चंद्रपाल बेहोश पड़ा था , घुरहु तथा अन्य बारातियो को भी गंभीर चोटे आई । हमलावरों का खेल तक़रीबन 10 मिनट चला , उसके बाद वे हमलावार बारातियो को चीखते पुकारते हुए पास के घरो में गायब हो गए ।

जो बाराती पहले ही गाँव से बाहर खड़ी ट्राली और जीप में बैठ गए थे  वे चीख पुकार सुन के घटनास्थल पर पहुंचे । जिस जीप  में चंद्रपाल की बारात जानी थी अब उसी में उसे और अन्य घायलों को जिला अस्पताल में भर्ती कराने ले जाया जा रहा था।

चंद्रपाल की माँ दहाड़े मार के रोते हुए  घायल चंद्रपाल और घुरहू को हवा कर रही थी। बदहवासी में हाथ का कोई पंखा ना मिला तो जीप में रखे अखबार को मोड़ के ही हवा करने लगी थी।

मुड़े हुए अखबार के मुख्य पेज पर एक खबर छपी थी - एक दलित बनेगा भारत का राष्ट्रपति' 

Thursday, 1 June 2017

जानिए क्या गौतम ही बौद्ध धर्म के संस्थापक थे ?

  एक आम धारणा यह है कि गौतम(गोतम) बुद्ध ने सर्वप्रथम बौद्ध धर्म की स्थापना की ।बुद्ध को हिंसा या शव को देख वैराग्य उत्पत्न हुआ और उसके बाद उन्होंने गृह छोड़ के जंगल में ज्ञान प्राप्त किया तथा बौद्ध धर्म की स्थापना की।

किन्तु ,यदि हम बौद्ध साहित्य जैसे की दीपवंश जो की पालि वंश - साहित्य की सर्वप्रथम रचना है ( इतिहासकारो ने इसका काल 307-247 ईसा पूर्व माना है) उसके अनुसार देखते हैं तो गौतम से पहले भी प्रत्यक्ष रूप से तीन अन्य बुद्धों का जिक्र है ।

दीपवंश के सत्रहवें परिच्छेद( महिंदस्स परिनिब्बान) में कहा गया है -
अभयं वट्ठमान ...... सासने ।(6)
से लेके
तिस्सस्स ........ दग्गमानसो ( 86)

अर्थात , चारो बुद्धों के शासन में चार पुरों( नगरों) के पृथक पृथक नाम थे
1- अभय - ककुसन्ध बौद्ध के समय लंका में प्रथम धम्मोपदेश स्थल रहा ।
2- वर्धमान- कोणागमन ( कोनागमन)बुद्ध के समय
3- विशाल- कस्सप बुद्ध के समय
4- अनुराधपुर- गौतम बुद्ध के समय

दीपवंश कहता है कि गौतम से पहले ककुसन्ध फिर कोणागमन उसके बाद कस्सप और फिर अंतिम गोतम बुद्ध हुए।

इन चारों बुद्ध अवतारों( शास्ताओं) के समय कौन कौन से राजा थे यह भी बताया गया है-
1- अभय- ककुसन्ध बुद्ध के समय यह अभय नगर का राजा था।
2- समीद्द( समृद्ध) - कोनागमन बुद्ध के समय वर्धमान नगर का राजा था।
3-जयन्त - यह कस्सप बुद्ध के समय विशाल नगर का राजा था ।
4- देवानांम्पिय तिस्स -यह गौतम बुद्ध के समय अनुराधपुर का राजा था।

चारो बुद्धों के अवशेष इस प्रकार थे -
1- ककुसन्ध बुद्ध का अवशेष था धम्मकारक
2- कोनागमन बुद्ध का अवशेष था काय-बंध( करधन)
3- कस्सप बुद्ध का अवशेष था उनकी जल शिटिका
4- गौतम बुद्ध का अवशेष था उनकी अस्थियां।

चारो बुद्धों ने अलग अलग वृक्षो के नीचे ध्यान लगाया था।

1- ककुसन्ध ने शिरीश
2-कोनागमन ने उंदुबुर
3-कस्सप ने न्यग्रोथ वृक्ष के नीचे
4- गौतम ने अस्सत्थ(पीपल) के नीचे

चारो बुद्धों के काल में विपत्तियां( उपद्रव)
1-काकुसन्थ के समय प्रज्वरक ( ज्वार महामारी)
2-कोनागमन के समय दुर्वृष्टि ( वर्धमान नगर में विवाद)
3- कस्सप बुद्ध के समय विशाल नगर में उपद्रव हुआ ।
4- गौतम के समय यक्षो का उपद्रव हुआ ।

चारों बुद्धों के प्रधान शिष्य थे -
1- ककुसन्ध का महादेव
2-कोनागमनक सुमन
3- कस्सप का महान
4 -बुद्ध का महिद्दी( महिंदर)

दीपवंश प्रथम बुद्ध ककुसन्ध के बारे में कहता है कि सर्वप्रथम उन्होंने ही लंका ( उस समय उसका नाम ताम्रपार्नि ) देखा । उस समय लंका में पुन्नकरनक नाम का ज्वार महामारी फैली थी । सिंहली जनता दुःख से तड़प रही थी तब ककुसन्ध बुद्ध अपने चालीस हजार भिक्खुओ के साथ जम्बुद्वीप से वँहा( अभयपुर) पधारे और लोगो को रोगों से मुक्ति दिलाई। राजा अभय के आग्रह पर ककुसन्ध बुद्ध ने रुचिनन्दा भिक्खुनी से शिरीष बोधिशाखा मंगाई और अभय पुर के बोधिशाखा प्रतिष्ठित की।

इतना तो ऐतिहासिक प्रमाणिक है कि गोतम बुद्ध से पहले अन्य बुद्ध हो चुके थे , अतः यह कहना की बौद्ध धर्म गोतम ने चलाया यह धारणा मिथ्या ही है ।गोतम बौद्ध धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि शास्ता थे।

भाषा वैज्ञानी राजिन्द्र प्रसाद जी मेजर फ़ोर्ब्स के जनरल ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी जून अंक 1836 का हवाला देके कहते हैं ककुसन्ध का काल 3101ईसा पूर्व मानते हैं और कोनागमन ( कनकमुनि) बुद्ध का 2099ईसा पूर्व


Saturday, 27 May 2017

क्या रामायण बुद्ध के बाद की रचना है?

  वाल्मीकि रामायण में जब हमुमान लंका में सीता जी की खोज करते हुए जाते हैं तो वो लंका का वैभव देख आश्चर्य करते हुए कहते हैं -

 स्वर्गोस्य देवलोकाsयमिन्द्रस्येयं पूरी भवते ( वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड ,सर्ग -9 श्लोक 31)

हमुमान लंका को स्वर्ग के समान कहते ,इंद्रलोक के जैसा वैभवशाली कह आश्चर्यचकित हो उठते हैं।
अब जानिए की लंका इंद्रलोक या स्वर्ग की तरह वैभवशाली क्यों थी। वाल्मीकि रामायण फिर कहती है -
' भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि'( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15
अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं ।

चैत्य शब्द वाल्मीकि रामायण में बहुत बार आया है , अयोध्याकाण्ड में ही कम से कम तीन बार आ गया है।

अब जानिए चैत्य शब्द का अर्थ-
चैत्य- बुद्ध मंदिर ( संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ पेज 440)
चैत्य- चैत्यमायतने बुद्ध बिम्बे( मेडिनिकोष)
अर्थात चैत्य ,बौद्ध मंदिर को कहते हैं।

कहने का अर्थ हुआ की लंका निश्चय ही बौद्ध नगरी रही होगी जंहा बौद्ध चैत्य बहुतायत थे ।

इसके अलावा , अयोध्या कांड सर्ग 109 के 34 वें श्लोक में कहा गया है-


'यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् '

जिसका अर्थ गीता प्रेस की वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार दिया है- जिस प्रकार चोर दंडनीय होता है उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध( बौद्ध मतावलंबी ) भी।

इसके अलावा 15 वीं शताब्दी के गोविंराजकृत व्याख्या में इस श्लोक में आये शब्द 'तथागत ' की व्याख्या करते हुए कहते हैं ' तथागत बुद्धतुल्यम'
अर्थात तथागत का अर्थ बुद्ध जैसा ।

सुरेंद्र कुमार शर्मा (अज्ञात) पुरातत्व वैज्ञानिक ई.बी. कॉडवेल का हवाला देके बताते हैं कि सुंदर कांड ,सर्ग 9 से 13 तक में रावण के अंतःपुर के रात्रिकालीन दृश्य का चित्रण है ,जो अश्वघोष रचित ' बुद्धचरितम( 5/57-61) के गोतम के अंत पुर के दृश्य का अनुकरण है जो की बुद्ध आख्यान का आवश्यक अंग है जबकि वाल्मीकि रामायण का अनावश्यक ।

रामायण में छेद वाली कुल्हाड़ी का जिक्र है, प्रसिद्ध पुरातत्व वैज्ञानिक डाक्टर हँसमुख धीरजलाल सांकलिया ने निष्कर्ष निकाला है कि ईसा पूर्व 300 से 500 से पहले भारत में छेद वाली कुल्हाड़ी का प्रयोग नहीं होता था।

तो, क्या हम यह कह सकते हैं कि रावण दरसल बौद्ध अनुयायी था ? और रामायण की रचना बुद्ध के बहुत बाद की है? शायद पहली ईसा से कुछ पहले या बाद की ?



Tuesday, 23 May 2017

जानिए क्या बुद्ध ही कृष्ण थे?

  अच्छा! क्या आपको लगता है कि चक्र एक अच्छा हथियार हो सकता है? फिर कृष्ण ने ऐसा हथियार क्यों चुना जो अच्छा नहीं था ? कंही चक्र  को जानबूझ के है 'हथियार ' तो नहीं बनाया गया है ?
यदि चक्र को हथियार के रूप में हम देखते हैं तो किंदवंतियो और कथाओं में कृष्ण ही एक अकेले  ऐसा पात्र लगते हैं जो चक्र का इस्तेमाल करते हैं  । कृष्ण के चक्र का नाम सुदर्शन था जिसका अर्थ होता है 'दिखने में अच्छा' या ' जिसको देख के अच्छा लगे' , क्या हथियार को देख के किसी को अच्छा लग सकता है ? हरगिज नहीं! हथियार तो संहारक होता है ,मृत्यु लाता है , भय लाता है । फिर कैसे वह 'सुदर्शन' हो सकता है?

इतिहास में बुद्ध  के साथ भी चक्र जुड़ा हुआ है , बुद्ध ने धम्म चक्र ( धम्म चक्क -पवत्तन) चलाया था जिसके द्वारा आधी दुनिया में बौद्ध धम्म फैला दिया । उनके धम्म  चक्र के दर्शन इतने सु-दर्शन थे की लोग अनायास ही खिंचे चले आते थे ।

कंही बुद्ध का ही धम्म चक्क ही तो कृष्ण का सुदर्शन चक्र तो नहीं था?

कृष्ण के भाई बलराम जिसे शेषनाग का अवतार समझा जाता है वह द्योतक है कि कृष्ण का नागों से घनिष्ठ सबंध था।


बुद्ध का भी आदिवासी नाग जाति से घनिष्ठ उन्होंने नागों को अपने धर्म में दीक्षित किया । मुचलिन्द नाम के नाग जाति के व्यक्ति ने उनकी प्रकृतिक के प्रोकोप से उनकी रक्षा की थी। नालन्दा और संकस्या जैसे प्रमुख बौद्ध विहारों में नागों के प्रति विशेष श्रद्धा रखी जाति थी और इनका उत्थान नाग पूजा स्थलों से हुआ था।


कंही बुद्ध के प्रिय नागजाति के मुचलिन्द ही तो बलराम नहीं थे?


कृष्ण के जीवन के अंतिम समय उनके अपने सगे संबंधियों यानि  यदुवंश का नाश हो जाता है ,कौरव सहित सभी सगे सम्बन्धिय युद्ध में मारे जाते हैं । कृष्ण बिलकुल अकेले किसी अज्ञात जगह पर अपनी जीवन लीला समाप्त करते हैं।

बुद्ध की मृत्यु भी एक गुमनाम देहात में हुई ,परिचारिका के लिए केवल एक भिक्षु उनके साथ था ।उस समय तक युद्ध में उनके सगे संबंधियों यानि  शाक्य काबिले का नाश हो चुका था । उनके दोनों सरंक्षक राजाओं की दयनीय स्थति में मृत्यु हो चुकी होती है। जैसे कृष्ण के हितैषी कौरव और पांडवो की  ।

कंही बुद्ध को ही कृष्ण का चोंगा तो नही पहना दिया गया ?

क्या कहते हैं आप सब?

अगले लेख में कुछ और रोचक तथ्यों के साथ ...

Saturday, 20 May 2017

जानिए कौन थी ऑस्ट्रिक जातियां-


 प्राचीन सभ्यताओं में एक अति प्राचीन सभ्यता रही थी आग्नये सभ्यता( ऑस्ट्रिक, नाग, द्रविण , कोल , किरात आदि )  यह सभ्यता आर्यो के आने से पहले भारत में व्यापक रूप से मौजूद थी । हिन्दू सभ्यता में मौजूद बहुत सी प्रथाएं आग्नये संस्कृति की ही देन है , जैसा की उदहारण के लिए चंद्रमा को देख तिथि गिनने की कला आग्नये संस्कृति की ही देन है । अमावस्या के लिए ' कुहू' और पूर्णिमा के 'राका' शब्द आग्नये शब्द भंडार से ही लिए गए हैं। कई इतिहासकारों का मत है की चावल की खेती भी उन्ही की देन है और चावल को देख के  पुनर्जन्म की परिकल्पना भी आग्नये संस्कृति की देन है जिसे बाद में आर्यो ने अपनाया और विकसित किया गया  । रामधारी सिंह दिनकर , सुनीति बाबू जैसे इतिहासकारों का यंहा तक कहना है कि गंगा शब्द आग्नये शब्द भंडार से ही आया है । आग्नये परिवार की अनेक भाषाएं भारत से लेके दक्षिणी चीन तक बिखरी हुई हैं , उनमे से कई नदी को गंग ही कहते हैं ।उत्तरी भारत के कई ग्रामीण तो नदी का पर्याय ही गंगा समझते है , आग्नेय भाषाओं में नदी के लिए ' कग, घंघ ' जैसे शब्द है।


इतिहासकार कहते हैं कि भारत में हाथी पालना, पक्षी पालना का आरंभ आग्नये जातियो ने ही किया था , भारत का निम्न कहा जाने वाला विशाल समुदाय आग्नये समुदाय से ही आया है ।
हिन्दू पुराणों में जो कथा किंदवंतियो का भंडार है वह आग्नये सभ्यता से ही आया है ।
आर्यो, द्रविड़ो , कोल , किरात वंश जब आपस में मिले होंगे तो एक दूसरे की लोक कथाएं भी एक दूसरे के घरों में प्रवेश करने लगी होंगी।

दिनकर जी तो आगे बढ़ के यंहा तक कहते हैं कि राम कथा की रचना के लिए आग्नये जाति के बीच प्रचलित लोक कथाओं का सहारा लिया गया है ।पाम्पा पुर के वानरों और लंका के राक्षसों की जो विचित्र कल्पनाये मिलती है उनका आधार आग्नये लोगो की लोक कथाएं ही रही होंगी।

लोक कथाएं और किद्वंतिया पहले ग्रामीण लोगो में  फैलती है उसके बाद साहित्य में सम्लित होती है।
बौद्ध जातकों की जो कथाएं हैं वे लोक कथाओं से ऊपर उठ के बौद्ध साहित्य तक पहुंची और उसके बाद पुराणों ने उनकी नकल की ,इसी कारण पुराणों और बौद्ध जातक कथाओं में कई समानता मिलती है ।

इतिहासकारो के अनुसार देवर - देवरानी, जेठ जेठानी की प्रथा आग्नये सभ्यता की देन है । सिंदूर प्रयोग और अनुष्ठानों में  नारियल पान रखने की प्रथा भी आग्नये सभ्यता की देन है । सिंदूर रजस्वला
का प्रतीक होता था जो की कृषि अनुष्ठानों में प्रजन का द्योतक था । सिंदूर के बारे में सुरेंद्र मोहन भट्टाचार्य अपने ' पुरोहित दर्पण' में साफ़ कहते हैं कि सिंदूर प्रथा आर्यो की प्रथा नहीं थी बल्कि आर्यो ने आर्येतर जाति से ग्रहण किया है। सिंदूर का न कोई वैदिक नाम है और न सिंदूर दान का कोई मन्त्र । सिंदूर मूलतः नाग लोगो की वस्तु है।

अवतारों में मत्स्य, वरहा, कच्छ की कल्पनाये आर्यो ने आग्नये जातियो से आई हो इसमें कोई बड़ी बात नहीं क्यों की आर्यो ने इन्हें अपना तो लिया था किंतु इनका महत्व उनके लिए विशेष नहीं रहा ।
एक बात और ध्यान दीजिए की ब्राह्मणों का सारा कठोरतम पहरा वेदों पर ही रहा ,उसने शूद्र और  स्त्रियों को वेदों से दूर रखा जबकि पुराणों पर ऐसी कठोरता नहीं बैठाई।
निश्चय पुराणों की कहानियों में ऐसे मिश्रण थे जो अर्योत्तर जातिओं से आये थे इसलिए ब्रहामण उन्हें अपना नही मानता था ।



Sunday, 14 May 2017

नगरीय सभ्यता और ग्रामीण सभ्यता-

 बौद्ध धर्म का मजबूत स्तंभ उसका ' संघ' था , यह संघ व्यापारियों और शिल्पियों का संघ था जिसमे कई श्रेणियां होती थी और उस श्रेणी के प्रमुख को सेट्ठ कहते थे ।यह श्रेणियां मुख्यतः व्यापार पर आधारित होती थी जिनकीं  संघ में मजबूत भागीदारी होती थी।

यदि हम यह कहें कि बौद्ध धर्म को फलने- फूलने में जो कारक थे वे यही श्रेणियां थी तो गलत न होगा , इन्ही के अनुदान पर मठ और विहार का भरण पोषण होता था । चुकी श्रेणियां व्यापर पर निर्भर थी और व्यापार नगरीय सभ्यता पर ।

व्यापर का संचालन सुचारू रूप से नगरों में ही चल सकता है। हम देख सकते हैं कि सिन्दू सभ्यता भी नगरीय सभ्यता थी, वँहा व्यपार ही और शिल्प ही मुख्य उद्योग था ।  सिन्धु सभ्यता का व्यपारिक रिश्ते बेबीलोन , सीरिया  आदि प्राचीन नगरीय सभ्यताओं
से थे , सिन्धु घाटी उत्खनन से कई सील मोहरे मिली हैं जो व्यापर के लिए उपयोग होती थीं।

वैदिक संहिताओं में ' ग्राम' शब्द कई बार आया है किंतु 'नगर' शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। विद्वानों के अनुसार वैदिक संहितो और  धर्म सूत्रों में वैदिक सभ्यता ग्राम सभ्यता है। पुराणों में जरूर नगरों का जिक्र है किंतु नगरों के निर्माता आर्य नहीं बल्कि मय वंशीय हैं जिन्हें अवैदिक अर्थात दानव/असुर कहा गया है।

यह निश्चित है कि आर्यो के ग्राम सभ्यता के कारण ही जाति प्रथा इतनी मजबूत हो गई , अपने पूर्वजो का धंधा छोड़ के दूसरा धंधा चुन लेना जितना आसान नगरीय सभ्यता में आसान होता है उतना ग्राम सभ्यता में नहीं। यह  सिद्धान्त आप आज भी देख सकते हैं कि शहरो में जातीय बंधन कमजोर होता है जबकि गाँवों में यह कठोरता से लागू हो जाता है ।आर्य व्यवस्था ग्रामीण व्यवथा थी इसलिए यह इतनी मजबूत और टिकाऊ हो सकी।

आर्य के प्रमुख देवता इंद्र का एक नाम पुरिन्द्र भी है जिसका अर्थ होता है नगरों ( घनी आबादी वाले शहर/ दुर्ग को नष्ट करने वाला । ऋग्वेद में बाकायदा  इंद्र अनार्य राजा शंबर के नगरों को नष्ट करता हुआ भी बताया गया है।

नगर के व्यापारियों को 'पणि' कहा गया है ऋग्वेद में , पणियों को लालची और धनी बताया गया है जो इंद्र के सामने नहीं टिकते थे । पणियों / शिल्पियों/ कारीगरों  की नगरों से ही संचालित होता था । गौर तलब है कि आर्य सभ्यता में शिल्पी/ कारीगर भी शूद्र श्रेणी में घोषित किये गए थे, जबकि बौद्ध संघ के श्रेणी में इनका मजबूत संघ होता था ।

शिल्प, कला- कौशल, कारीगरी तथा उद्योग नगरीय सभ्यता के लक्षण है ,बिना नगरीय सभ्यता के इनका विकास नही हो सकता । सिंधु सभ्यता के विध्वंश और और फिर बौद्ध सभ्यता के नष्ट किये जाने के बाद भारत वर्ष में नगर संस्कृति को प्रधानता किसी भी समय नही मिली । आर्य संस्कृति का ग्राम या देहात आधारित अर्थशास्त्र का निरन्तर बने रहना जातीय भेद की कठोरता में अधिक से अधिक सहायक हुआ ।

फ़ोटो सिंधु सभ्यता में व्यापार के लिए प्रयोग होने वाली सील-

Saturday, 13 May 2017

समझदार - कहानी

बाहर से किसी के दरवाज़े के खटखटाने की आवाज़ आई तो सुमित झट से पढ़ना छोड़ चारपाई से उतरा और जोर से आवाज़ लगाई -
"आ रहा हूँ मम्मी.....'

बाहर सुधा थी, सुमित की मां।

सुमित ने दरवाजा खोला तो सच में सुधा ही थी , सुधा ने मुस्कुरा के पूछा -
" क्या कर रहे थे? '
" होमवर्क कर रहा था .... " सुमित ने पहले सुधा की तरफ देखा और फिर सुधा के हाथ में थमी हुई पन्नी को गौर से देखा , एक क्षण के लिए उसकी आँखों में चमक आ गई और दूसरे ही क्षण गायब हो निराशा में बदल गई।

सुधा ने उसके चेहरे की उदासी पढ़ ली थी , वह तुरंत अपने हाथ में पकड़ी हुई पन्नी को आगे करते हुए बोली-
" इमरती लाइ हूँ तेरे लिए .... तुझे बहुत पसंद है न!" सुधा ने  प्लास्टिक की थैली पकड़ाते हुए कहा ,किन्तु न जाने क्यों  सुमित की आँखों से आँखे नहीं मिलाई । सुधा ने अपना हैंडबैग खूंटी पर टांगा और तौलिया ले सीधा बाथरूम में चली गई।

सुमित ने इमरती की थैली खोल के देखी तक नही ,थैली को अलमारी में पटक वह गुस्से फिर चारपाई पर जा के किताब खोल के पलटने लगा ।

सुधा बाथरूम के झरोखे से उचक के सुमित की सारी हरकत देख रही थी। एक दर्द भरी बेबसी की आह उसके मुंह से बरबस ही निकल गई, दो आंसू की बूंदे आँखों से लुढ़क के बालों से झरते पानी में मिल के अस्तित्वविहीन हो गए थे।

बाथरूम से निकल के सुधा खाना बनाने लगी , सुमित अब भी चारपाई पर  बैठा किताब में नजरें गड़ाया था किंतु सुधा को पता था कि सुमित पढ़ नहीं रहा है बल्कि गुस्से और उदासी में कंही गुम था।

खाना बनाने के बाद सुधा ने सुमित को खाना परोसा, पर सुमित अब भी खामोश और उदास था । अनमने ढंग से उसने एक रोटी खाई और उठ गया , जब सुधा ने इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि उसे ज्यादा भूंख नही है और सुधा के आने से पहले ही उसने मैगी बना के खा ली थी।

पर सुधा जानती थी की सुमित झूठ बोल रहा था ।
सुधा ने भी अनमने ढंग से एक-आध रोटी खाई और बाकी खाना उठा के रख दिया।

थोड़ी देर में सुधा और सुमित अपने अपने बिस्तर पर थे , बहुत देर तक सुधा सोने की कोशिश करती रही पर नींद उसकी आँखों से जैसे कोसो दूर हो। उसकी आँखों में दर्द के साथ उसकी पुरानी यादें ऐसे घूमने लगी जैसे कोई फिल्म की रील चला दे।

तीन  साल पहले तक सुमित के पिता रतनलाल  एक सिलाई कारीगर थे और एक फैक्ट्री में काम करते थे । सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक पता चला की रतनलाल को टीबी की बीमारी है । खांसते- खांसते मुंह से खून तक आ जाता था , बीमारी का इलाज करवाते करवाते घर का सब कुछ बिक गया यंहा तक की सुधा के तन के जेवर तक ।
फैक्ट्री से एडवांस कर्ज भी लिया किन्तु कोई फायदा न हुआ अतः एक दिन रतनलाल सुधा और सुमित को छोड़ के चल बसे।

सुमित उस समय पांचवी कक्षा में था ।घर का खर्चा , सुमित की पढाई और फैक्ट्री से एडवांस लिए कर्जे को चुकाने के लिए सुधा ने फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया । चूंकि सुधा कारीगर नहीं थी अतः  कम वेतन में धागा काटने का काम मिला।
लगभग आधा वेतन एडवांस लिए रुपयों की भरपाई में कट जाता और जो बचाता उससे घर का खर्च और सुमित की पढाई बड़ी मुश्किल से हो पाती।

" सुमित! नींद नहीं आ रही है क्या?" सुधा ने करवट बदलते सुमित से पूछा ।
" हूँ! आ रही है ..... " सुमित ने धीरे से जबाब दिया।
" बहुत जरुरी है क्या सुमित तेरे लिए क्या वह फोन? " सुधा ने लेटे लेटे फिर पूछा।
"मेरे सारे दोस्तों के पास है , वो लोग इंटरनेट भी चलाते हैं जिसमे पढाई की सभी चीजे मिल जाती है ।गेम भी खेलते हैं ....." पहले तेजी से कह और फिर माध्यम स्वर में अपनी बात पूरी की सुमित ने ।

" हूँ.... "सुधा ने आँख बंद किये हुए कहा ।

" हूँ क्या? आप पिछले चार महीने से कह रही हैं कि दिला दूंगी पर रोज टाल देती हैं।..... वह संतोष है न ! अब तो उसके पास भी बड़ा सा फोन आ गया है । फोन में कोर्स से जुडी तरह तरह चीज़ो को देखता है । टीचर ने जो प्रोजेक्ट दिया था वह भी उसने इंटरनेट से देख के मुझ से पहले पूरा कर लिया है.....अब मैं कोई छोटी क्लास में नही हूँ .... आठवी में आ गया हूँ .... अब मुझे इंटरनेट वाले फोन की जरूरत है ,पर आप हैं कि समझती नहीं" सुमित ने जैसे अपने दिल का गुबार निकाल दिया हो।

"हूँह.... " सुधा ने फिर गहरी सांस लेते हुए कहा ।
"फिर वही हुँह...... आप इसके अलावा कुछ नहीं कह सकती.....पापा होते न तो मैं आपसे कहता भी नहीं , वो मुझे कब का दिला चुके होते" -सुमित ने झल्लाते हुए कहा और चादर से मुंह ढक के सो गया।

सुधा ने कुछ नहीं कहा बस छत की तरफ एक टक देखती रही। यंहा तो घर का खर्च और पढाई का खर्च ही नहीं पूरा हो पा रहा था उस पर 8-10 हजार का फोन कैसे लेके दे सुमित को ? एडवांस भी देना बंद कर दिया था फैक्ट्री मालिक ने , कोई जानकार भी नहीं था उसका जो इतनी रकम उसे उधार देता। बेबसी के कारण उसकी आँखों से आंसुओ की धार बह रही थी जो नीचे बिछी चादर को ऐसे गीला कर रही थी जैसे गिलास भर पानी उड़ेल दिया हो।

सुबह सुधा उठी और सुमित के लिए नाश्ता बना के स्कूल भेज दिया उसके बाद खुद भी फैक्ट्री के लिए निकल गई।


शाम को सुधा आई तो उसके हाथ में नए फोन का एक पैकेट था , जैसे ही सुमित ने फोन का पैकेट देखा तो मारे ख़ुशी के उसके मुंह से चीख निकल गई और वह सुधा से लिपट गया । सुधा हलके से मुस्कुरा दी ।
सुमित ने पैकेट खोल के देखा तो उसमें नया फोन था ठीक वैसा ही जैसा उसके दोस्त के पास था ।

सुमित के ख़ुशी का ठिकाना न था।

दो दिन बाद।

"सुमित! तू फोन क्यों नहीं चला रहा है? फोन कँहा है तेरा?" सुधा ने सुमित से पूछा।
" फोन तकिये के नीचे रखा हुआ है" सुमित ने लापरवाही से कहा।

सुधा ने फोन देखने के लिए तकिया उठा के देखा तो उसके मुंह से आश्चर्य से चीख निकल गई।
तकिये के नीचे फोन नहीं उसका मंगलसूत्र रखा हुआ था । वह मंगल सूत्र जो उसने सुमित के फोन खरीदने के लिए बेंच दिया था ।

सुमित ने पास आके कहा " मम्मी ! तुमने मेरे  फोन के लिए इसे बेंच दिया था न! यह आपके लिए कितना कीमती है यह मैं जानता हूँ.... पापा की यह आखरी निशानी है न! आपने इसे कितने दुःखो के बाद भी नहीं बेचा था ......मुझे आज सब पता चल गया इसलिए मैंने फोन वापस कर दिया और आपका मंगलसूत्र फिर उसी दुकान से खरीद लाया जंहा आप इसे बेच के आई थी....मैं इतना भी जिद्दी नहीं हूँ । मैं बिना फोन के पढ़ सकता हूँ , मुझे नहीं चाहिए इंटरनेट - सिंटरनेट ...." इतना कह सुमित सुधा से लिपट गया और रोने लगा।

इस बार सुधा की आँखों में ख़ुशी के आंसू थे , सुमित अब वाकई समझदार हो गया था ।

बस यंही तक थी कहानी....


Wednesday, 10 May 2017

और बुद्ध का घर छोड़ना.....


बुद्ध के बारे में यह भ्रंति फैली हुई है की बुद्ध शव को देख दुखो से घबरा के अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़ के घर से भाग( घर छोड़ दिया) गए थे , पर यह केवल भ्रंति है और  इसमें सच्चाई नहीं ।

बुद्ध का नाम सिद्धार्थ था और वे शाक्य जनजाति से थे , उनके पिता शाक्य गणराज्य के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके थे । शाक्य गणराज में शाक्यों का अपना एक संघ था और राज्य के सभी फैंसले यह संघ ही करता था । संघ का नियम था की गण राज्य के प्रत्येक युवक को 20 साल का होने पर संघ का सदस्य बनना पड़ता था  । अत: सिद्धार्थ को भी 20 साल का होने पर सदस्य बनाया गया । सिद्दार्थ 8 साल तक संघ के सक्रीय सदस्य रहें ।
शाक्य गणराज के पूर्व में कौलिय गणराज्य था और रोहिणी नदी दोनों राज्यो की विभाजक रेखा थी , अक्सर नदी के पानी को लेके दोनों राज्यो में झड़प होती रहती थी ।

परन्तु एक बार पानी को लेके शाक्यों और कोलिय किसनो में गंभीर झड़प हुई , बात युद्ध तक अ पहुची । शाक्य सेनापति ने कौलियो के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए संघ की अनुमति प्राप्त करने के लिए सभा बुलाई । सभा में युद्ध करने का प्रस्ताव पारित हो गया , अंत में सेनापति ने सभी सदस्यों से एक बार फिर पूछा की युद्ध से किसी को आपत्ति तो नहीं है ?
इस पर सिद्धार्थ ने खड़े होके युद्ध पर आपत्ति करते हुए कहा की यह मामला बैठ के भी सुलझाया जा सकता है , युद्ध से युद्ध के बीज बो उठते है और स्थाई हल नहीं निकलता । सिद्धार्थ ने कहा कीकौलिय हमारे पडोसी है और झगडे का सही कारण पता कर उसका निवारण किया जाए इसके लिए  पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई जाये जो दोनों पक्षो के मसलो को शांति पूर्वक हल करे।
इस तरह सिद्धार्थ के विरोध करने पर सभा अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दी गई ।
अगले दिन सेनापति ने अनिवार्य सैनिक भर्ती का प्रस्ताव रखा , सिद्धार्थ ने उसका विरोध किया और कहा की न वे अनिवार्य सैनिक बनेंगे और न ही युद्ध में भाग लेंगे ।

इस पर संघ ने सिद्धार्थ पर तीन दण्डो का प्रवधान रखा
1- फांसी
2- देश निकाला परिव्राजकके रूप में
3- परिवार के लोगो का सामाजिक बहिस्कार तथा सम्पति जब्त

तब सिद्धार्थ ने संघ से प्रार्थना की कि कृपया परिवार का सामजिक बहिस्कार न करें और न ही उनकी सम्पति छीने , अपराधी मैं हूँ इसलिए चाहे मुझे देश निकाला दे दें या फांसी पर चढ़ा दें ।
उनकी इस बात पर संघ में काफी विचार विमर्श हुआ , अत: यह निर्णय लिया गया की सिद्धार्थ को  परिव्राजक के रूप में देश निकाला दे दिया जाए ।
घर आके सिद्धार्थ ने यह बात अपने परिवार वालो को बताइये तो वे बहुत दुखी हुए,पत्नी यशोधरा साथ आना चाहती थी पर सिद्धार्थ ने समझाया की यह संघ की निति के विरुद्ध है और उन्हें अकेले ही देश छोड़ना होगा । अंत में सिद्धार्थ अपनी पत्नी और परिवार वालो को समझाने में सफल हो जाते हैं ।

उसके बाद कपिलवस्तु में उनका प्रब्रज्य संस्कार के बाद सिद्धार्थ ने अपनी यात्रा आरम्भ की और अनोमा नदी की ओर चल पड़े।और वंहा से शुरू हुआ सिद्धार्थ के बुद्ध बनने सफर।
अपने पिता की मृत्यु पर बुद्ध कपिलवस्तु वापस लौटे , उसके बाद उनकी माता और पत्नी यशोधरा भी बौद्ध संघ में शामिल हुईं और भिक्षुणी बनी। थेरी गाथाओं में लगभग 75भिक्षुणीयो का उल्लेख है जिसमें यशोधरा और बुद्ध की माता का नाम है ।

Monday, 1 May 2017

अमेरिकी मजदूर दिवस और भारतीय सेवक

वर्णव्यवस्था धर्म में तथाकथित  तीनो उच्च वर्णो की सेवा करने का कर्तव्य सबसे निचले अर्थात शूद्र वर्ण के लिए निर्धारित किया गया है।
किसान, शिल्पी, दासों आदि को शूद्रों की श्रेणी में रखा गया है, व्यास स्मृति में एक लंबी सूची दी हुई है कि कौन से श्रमिक( कामगार) शूद्रों की श्रेणी में आते हैं।

मनुस्मृति कहती है कि शूद्र चाहे खरीदा हो या न खरीदा हो वह तीनो उच्च वर्णो का सेवक है ।

वर्ण व्यवस्था में अपने को सबसे शीर्ष पर बैठाने वाला यह जानता था कि वह नँगा नही घूम सकता कपडा तो पहनना ही होगा। जूता ,चप्पल तो पहनना ही होगा ।खाना खाने के लिए बर्तन की जरूरत तो होगी ही , यज्ञ के लिए घी की जरूरत तो होगी ही। घर भी चाहिए रहने के लिए, घर को साफ़ भी रखना होगा ,कपडे भी धोने ही होंगे ।

किन्तु, वह न तो पहनने के लिए जूते ही बना सकता था ,न कपडे, न बर्तन और न ही यज्ञ के लिए घी । न ही वह घर की सफाई कर सकता था,न मरे हुए पशु ही उठा सकता था न खेत में अन्न ही उगा सकता था ।हल की मुठिया तक पकड़ना उसने अपने लिए पाप घोषित किया हुआ था ।जीवन की  सब कामो के लिए स्वयं घोषित शीर्ष उच्च वर्ण को दूसरों पर निर्भर रहना होता था ,अगर वह जरूरत के लिए हर चीज ख़रीदे तो उसके लिए धन की जरूरत होती । धन बिना परिश्रम के नहीं कमाया जा सकता और परिश्रम को उसने शूद्रता घोषित किया हुआ था ।

तब उसने अपनी सभी जरूरतों के लिए 'दान व्यवस्था' लागू करवाई, दान केवल शीर्ष वर्ण को ही दिया जा सकता था श्रमिको को नही। श्रमिक तो बिना खरीदे गुलाम थे ।

कृष्ण तक कहते हैं कि सभी को अपने वर्णधर्म का पालन करना चाहिए यही उनका( ईश्वर) का बनाया नियम है ,शूद्र का वर्ण धर्म सेवा करना है।

शूद्रों को सेवा के लिए किसी तरह मेहनताना मिले ऐसा धार्मिक व्यवस्था नही थी। शूद्र को सेवा पिछले जन्म के 'पापो'के कारण करनी थी इसलिए उसे अपनी सभी सेवाये जैसे जूते, कपडे, अन्न, सफाई,बर्तन , घी आदि मुफ्त देनी थी । इस सेवा के बदले धर्मसूत्र कहता है कि सेवादारों को सवर्णो के उतरे कपडे , जूठन , टूटे बर्तन आदि ही मिलनी थी ।

सेवक धन रख के कंही सम्पन्न न हो जाए और वह तथाकथित उच्च वर्णो की सेवादारी से मुखर न हो जाए इसलिए मनु महाराज निर्देश देते हैं कि स्त्री के साथ सेवक भी धन नही रख सकते थे।

सब अमानवीय यातनाएं सहने के बाद भी सेवको(शूद्रों) ने कभी अपनी स्थिति के प्रति रोष क्यों नहीं प्रकट किया?क्या कारण रहा की सेवक वर्ग अपने शोषण के प्रति कोई आंदोलन नहीं खड़ा कर पाया ?

निश्चय ही इसका कारण धर्म रहा , धर्म की घुट्टी ऐसी पिला दी गई थी की शूद्र वर्ग सेवा करना  ही अपना कर्तव्य समझता रहा । उसे यह अहसास दिला दिया गया था कि वह जो सेवक(शूद्र) योनि मे पैदा हुआ है वह उसके पिछले जन्मों के पापो नतीजा है ,यदि वह इस जन्म में बिना न नुकार के सवर्णों की सेवा करता है तो अगले जन्म में वह भी सवर्ण बनेगा । सेवक स्वयं और बाल बच्चे समेत अपने मालिक का सेवक होता , काम का कोई घण्टा निर्धारित न था । 24 घण्टे मालिक की सेवा में उपस्थित रहना पड़ता था ,क्या पता कब मालिक उन्हें बुला लें!

अमेरिका में वर्णव्यवस्था नहीं थी न ही वँहा के सेवको को यह धर्म का यह भय था कि यदि इस जन्म में अपने मालिको से अपने अधिकारों की मांग रखेगा तो अगले जन्म में फिर सेवक बनेगा। इसलिए वँहा के सेवको(मजदूरों) में चेंतना का विकास हुआ और अपने शोषण के विरुद्ध उठ खड़े हुए ।
उन्होंने आंदोलन किया अपने हको को लेके ,अपने काम करने के घण्टे निर्धारित करवाये ।

सोचिये यदि अमेरिकी मजदूरों में अपने हकों को लेके चेंतना का विकास न हुआ होता और वह आंदोलन भारत न पहुंचता तो  भारतीय सेवक आज भी धर्म के उसी 24x7 के नियम पर काम कर रहे होते , उन्हें पता ही नही होता की काम करने के भी घण्टे निर्धारित होते हैं।

खैर, अपने मजदूर भाइयो को मज़दूर दिवस की हार्दिक बधाई....
फ़ोटो सभार गुगल






Saturday, 15 April 2017

कमाई- कहानी


 रात धीर धीरे अपने यौवन की ओर कदम बढ़ा रही थी  , सड़क पर अब इक्का-दुक्का  तेज भागती मोटरगाड़ियों की हैडलॉट्स चकाचौंध ही दिख रही थी जो दूर से रौशनी बिखेरित हुई आती और पल भर में अँधेरे में गुम हो जातीं।

चार व्यक्ति  बड़े से पार्क के एक सूनसान कोने में बैठे शराब पीने मस्त थे । ये तीसरी बोतल खोली थी उन चारो की जो पी रहे थे  , बोतल खाली होने तक नशे में धुत्त हो झूमने लगे थे । खाली बोतल को पैग बनाने वाले शख्स ने लापरवाही से बोतल एक ओर फेंकी ,बोतल लुढ़कती हुई थोड़ी दूर पड़ी एक ईंट से टकराई तो 'टन्न' की आवाज़ हवा में  गूँज उठी ।

'टन्न' की आवाज़ जैसे ही अर्धनिन्द्रा में लेटी रूबी के कानों में पड़ी  तो उसकी आँख खुल गई  ,इधर उधर देखने के बाद उसे अहसास हुआ की आवाज़ पार्क में से आ रही थी उसे समझते देर न लगी  की यह आवाज शराब की खाली बोतल की ही थी। वह बुदबुदाई-

"खाली शराब की बोतल! यानी पांच रुपये की एक बोतल !! अगर दो हुई तो!! दस रुपये में बिक जाएँगी ।" ऐसा सोचते हुई वह झट से उठ बैठी उसने देखा की उसकी चाची-चाचा  अब भी सो रहे हैं।

रूबी, उम्र रही होगी 15 साल के करीब । पश्चिम बंगाल के 24 परगना की रहने वाली, बाप की मृत्यु बचपन में ही हो गई तो माँ ने ईंट भट्टे मज़दूरी कर के किसी तरह अपना और रूबी का पेट भरा ।
अभी पिछली साल माँ भी एक बीमारी में चल बसी तो रूबी बिलकुल अकेली हो गई, घर के नाम पर सिर्फ एक 10x10 की झोपड़ी थी ।

रूबी का इकलौता रिस्तेदार या यूँ कहिये की सहारा था उसका चाचा बदरू ,कई साल पहले गरीबी से तंग बदरू पश्चिम बंगाल छोड़ के दिल्ली काम की तलाश में आया तो कंही काम न लगा और न ही रहने की जगह मिली। कई दिनों तक यूँ ही भटकने के बाद कूड़ा बीनने का काम कर लिया फिर एक पार्क की दीवार से लगा अस्थाई झुग्गी बना ली ।ऐसा नहीं था कि वह अकेला था , उस जैसे कई परिवार वंही जुग्गी बना के रहते थे जिनमे से कुछ भीख मांगते तो कुछ कूड़ा बीनने का काम करते।कुछ दिनों बाद बदरू  अपनी पत्नी को भी ले आया ,अब दोनों कूड़ा बीनते और झुग्गी में बिजली न होने के कारण सड़क पर ही सो जाते।

रूबी बदरू के पास आ गई, चाचा चाची पर बोझ न बने इसलिए कूड़ा बीनने में मदद करने लगी।

आज भी सभी लोग सड़क पर ही सो रहे थे , बोतल की आवाज़ सुन रूबी उठी और बिना किसी बताये वह तेजी से पार्क के उस कोने में चल पड़ी जंहा से उसे खाली बोतल की आवाज़ सुनाई दी थी, वह जल्दी से बोतल उठा लेना चाहती थी की इससे पहले कोई और उठा ले ।

वह तेजी से उस जगह पहुँच गई जंहा बोतल पड़ी थी । इधर शराबियों ने जब रूबी के कदमो की आहट सुनी तो बैंच के पीछे छुप गएँ ,उन्होंने सोचा की शायद पुलिस है ।
फिर ,जब कूड़ा बीनने वाली लड़की को  बोतले बीनते हुए देखा तो उनकी आँखों में चमक आ गई । चारो में इशारे हुए और रूबी को किसी कबूतरी की तरह दबोच लिया गया ।

रूबी चीखना चाहती थी किन्तु दो मजबूत हाथ उसके मुंह पर ऐसे जम गए थे जैसे चिपका दिए गए हो।

चारो रूबी को खींच के कोने में ले गए और तन पर एक कपडे न छोड़े,  उनकी दरिन्दगी चरम पर थी ।एक एक कर के सभी ने बलात्कार किया , रूबी असहनीय दर्द और शरीर के घावों से कब की बेहोश हो चुकी थी ।


सुबह के चार बजने वाले होंगे , हल्का उजाला फैलने वाला ही था कि रूबी की बेहोशी टूटी । वह चीखती हुई उठ बैठी , देखा तो कोई नहीं था ।वो चारो जा चुके थे , फिर रूबी ने अपने शरीर पर न नजर डाली अनगिनत घाव थे यंहा तक की गुप्तांग से अब भी खून रिस रहा था । रूबी किसी तरह उठी और पास पड़ी अपनी फ़टी हुई सलवार- समीज को दर्द से कराहते हुए पहना और लड़खड़ाती हुई अपनी झुग्गी की तरफ चल दी।

रूबी ने देखा की अब भी उसकी चाची और चाचा सो रहे है , उसने झकझोर के अपनी चाची को जगाया । चाची को जगाते  ही रूबी फूट फूट के रोने लगी, चाची ने जब रूबी की दयनीय हालत देखी तो समझ गई की रूबी के साथ बहुत गलत हुआ है।
चीख पुकार सुन के बदरू भी जाग गया , उसने जब सारी बात सुनी तो रूबी पर ही बहुत गुस्सा हुआ गलियां देने लगा की उसे इतनी रात को पार्क में बोतल बीनने जाने की क्या जरूरत थी?

चाची ने किसी तरह बदरू को चुप करवाया और थाने जा के रिपोर्ट लिखनवाने को राजी किया । तीनो थाने पहुंचे तो सिपाही ने उन्हें  रोक लिया और आने का कारण जनाना चाहा ।
बदरू के बताने पर की रूबी के साथ बलात्कार हुआ है तो सिपाही बिफर गया और डांटते हुए बोला-
" साले ... भो@$# के ..... खुद धंधा करवाता है और पैसे न मिलने पर झूठी रिपोर्ट लिखवाने आ गया! .... भाग यंहा से "
" अरे साब! आप ऐसे कैसे कह रहे हैं ....."हम ऐसे आदमी नहीं है हमारी बच्ची के साथ सच में जबरजस्ती हुई है " बदरू ने गिड़गिड़ाते हुए कहा ।
" जबरजस्ती हुई है ! साले तेरी लड़की वंहा गई क्यों ? .... धंधा ही करने गई थी न !वो उठा के ले तो गए नहीं थे तेरी लड़की को .... सब समझता हूँ तुम जैसे लोगो की चाल.... तेरी झोपडी पट्टी की सब लड़कियां ऐसे ही करती है .... साले बांग्लादेशी है न तू? अभी सुबह सुबह साहब का दिमाग मत खराब कर वर्ना तुझे ही अंदर कर दूंगा" सिपाही ने इस बार कड़ी चेतावनी जारी कर दी।

सिपाही द्वारा बेज्जती करने के बाद तीनों वँहा से निराश हो अपनी झुग्गी में आ गएँ ।

कुछ महीने बाद रूबी गर्भवती हो गई, बदरू और उसकी पत्नी बड़े दुखी हुए। बदरू रोज रूबी को कोसता,उसकी पत्नी भी रूबी से नाराज रहती । एक दिन बदरू की पत्नी यनीं रूबी की चाची ने रूबी का गर्भपात का निश्चय किया और इस की सलाह लेने के लिए वह अपनी एक पड़ोसन के पास पहुंची ।

पड़ोसन ने जब रूबी के बारे में सुना तो उसने खुश होते हुए कुछ समझाया रूबी की चाची को जिससे सुन रूबी की चाची भी खुश हो गई। घर आके  जब उसने पड़ोसन की सलाह बदरू को सुनाई तो वह भी खुश हो गया।

उस दिन के बाद बदरू और उसकी पत्नी ने रूबी से कुछ नहीं कहा बल्कि उसका  गर्भपात न करवाने के लिए भी राजी हो गएँ।

रूबी की चाची ने रूबी को समझाते हुए कहा - देख रूबी अब जो गया सो हो गया .... इसमें बच्चे की क्या गलती? तू बच्चे को जन्म..हम पालेंगे बच्चे को... बच्चे तो ऊपरवाले की देन होते हैं ... यंहा कौन से हमारे रिस्तेदार हैं जो हमारी बदनामी होगी?"

रूबी ने जब यह सुना तो अपने चाचा-चाची की नेकदिली पर उसे ख़ुशी हुई।


थोड़े  महीने बाद रूबी ने एक बच्चे को जन्म दिया , बदरू और उसकी चाची बहुत प्रसन्न हुए ।

कुछ दिनों बाद रूबी को अपने बच्चे के साथ रेडलाइट पर भीख मांगते हुए देखा गया । उसकी चाची की पड़ोसन ने यही समझाया था कि आज कल किसी लड़की की गोद में बच्चा हो तो लोग सहानभूति से अधिक भीख देते हैं।

अब रूबी कूड़ा बीनने से अधिक कमा ले रही थी, बदरू और उसकी पत्नी की 'कमाई' बढ़ गई थी।

बस यंही तक थी कहानी.....

फोटो साभार गूगल-

Tuesday, 4 April 2017

सर्वशक्तिमान ईश्वर और जीव के चार वर्ग-

  " अरे केशव!...... सुनो तो जरा!" किसी ने पीछे से तेज  आवाज दी ।
केशव ने मुड़ के देखा तो ये मुन्ना बाबू थे, मुन्ना बाबू पड़ोस में ही रहते है केशव के । काफी पढ़े लिखे और किसी कंपनी में ऊँचे ओहदे पर थे, पड़ोस में रहने के कारण कभी कभी मिलना हो जाता है उनसे । कभी ज्यादा बात चीत नहीं हुई बस अभिवादन कर हाल चाल पूछने तक ही सीमित रही।

" नमस्ते मुन्ना जी ..... क्या हाल हैं?" केशव ने पूछा।
" नमस्ते....सब ठीक हैं...." मुन्ना बाबू ने जबाब दिया।
" कहिये कैसे याद किया? " केशव ने मुस्कुरा के पूछा।
" कुछ नहीं!सुना है आज कल तुमने ईश्वर /भगवान/ अल्लाह /गॉड सब को मानना छोड़ दिया है...एक दम 'नास्तिका वाले' हो गए हो?" मुन्नाबाबू ने व्यंगात्मक मुस्कुराहट लिए पूछा ।

केशव ने कुछ जबाब नहीं दिया मुन्नाबाबू की बात का केवल मुस्कुरा दिया।

" का.... माने !बिलकुल भी नहीं मानते ईश्वर को?" मुन्नाबाबू ने फिर जोर देके पूछा शायद उन्हें केशव का चुप रहना रास नहीं आया और वो कुछ ठोस जबाब चाहते थे ।

"आप मानते हैं ईश्वर को?"केशव ने उनसे पूछा।

"हाँ हाँ क्यों नहीं? उल्टा हम से ही पूछ रहे हो? हम तो मानते हैं  सर्वशक्तिमान ईश्वर को, उसी ने हमें- तुम्हें ये पेड़ पौधे और पूरा ब्रह्माण्ड बनाया है .... वो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है " मुन्नाबाबू के जबाब में गर्व था । कुछ देर रुक वो फिर बोले-
" केशव भाई... तुम्हारी तरह नहीं की जिस सर्वशक्तिमान ने तुम्हे बनाया उसी को नकार दो .... हम प्रबल रूप से मानते हैं कि ईश्वर है "

" तो आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है ? " केशव ने सर्द लहजे में पूछा।
" बिलकुल ... वह सर्वशक्तिमान है ....सब कुछ कर सकता है जो इंसान के बस की नहीं और न ही तुम्हरे विज्ञान के बस की " मुन्नाबाबू का गर्व अब दुगना था।

"तो ठीक है ! क्या आपका सर्वशक्तिमान ईश्वर सामने वाले  10 मंजिला फ्लैट के टॉप से कूद के आत्महत्या कर सकता है ?" केशव ने फ़्लैट की तरफ इशारा करते हूए पूछा।

शायद ऐसे सवाल की आशा न थी मुन्नाबाबू को ,अतः वो आश्चर्य से केशव को देखने लगे ।
"यदि आप कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह बिल्डिंग से कूद भी सकता है ..... है कि नही?" केशव ने आगे कहा।

मुन्नाबाबू अब भी खामोश थे ,वह एक टक देके जा रहे थे । मुन्नाबाबू को खामोश देख केशव वंहा से चलने के लिए पैर उठाया ही था कि जैसे मुन्नाबाबू को होश आया हो ।उन्होंने केशव को रोकते हुए कहा - "अरे इतनी जल्दी क्या है जाने की ? चलो यह तो मानते हो की ग्रन्थो में ऐसी वैज्ञानिक बाते पहले के लोग लिख गएँ है जिनको आज के वैज्ञानिक मानते है"

" जैसे?" केशव ने वापस रुकते हुए कहा।
" जैसे .... ग्रन्थो में बहुत पहले ऋषियों ने लिख दिया था कि जीवन चतुष्टय है.... अंडज, जेरज , स्वदेज और उद्भिज्ज । यह तो वैज्ञानिक थ्योरी है जिनको प्राचीन ऋषि लिख गएँ और आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं"  एक बार फिर मुस्कुराहट फैल गई थी मुन्नाबाबू के चेहरे पर लगता था कि अब चित ही समझो केशव को।

"हम्म.... अंडज यानि अंडों से पैदा होने वाला जीव, जेरज अर्थात पेट की झिल्ली में लिपटे हुए जन्मना, स्वेदज अर्थात पसीने से पैदा होने वाले और उदभिज्ज् जो धरती से पैदा हो जैसे पेड़ पौधे....,ठीक? " केशव ने पूछा।
"बिलकुल ठीक!..... अब बताओ वैज्ञानिक मान्यता है कि नहीं यह? " मुन्नाबाबू ने तपाक से पूछा।

" न! यंहा भी गड़बड़ है " केशव ने मुस्कुराते हुए कहा ।
" कैसे गड़बड़ है?" मुन्नाबाबू ने फिर आश्चर्य से पूछा।

" गड़बड़ यह है साहब की जिन जूं आदि प्राणियों को आपके ग्रन्थ स्वेदज यानि पसीने से पैदा बताते हैं वे दरसल गांदगी से पैदा होते हैं और सब अंडज है ... स्वेदज एक तरह का फालतू वर्ग है।ठीक वैसे ही जैसे राहु केतु ग्रह ।
उदभिज्ज वर्ग भी पूरी तरह सही नहीं है, समुन्द्री सेवाल ,काई जैसे पौधे धरती फोड़ के पैदा नहीं होते अतः सभी पेड़ पौधों को एक ही वर्ग में रखना अज्ञानता ही है।
इसके अलावा एक कोशीय जीव न तो अंडज हैं न जेरज और न किसी चतुष्टय वर्ग में ही आते हैं ..... आपके त्रिकाल दर्शी  ग्रंथकार 'वैज्ञानियो' को शायद इसका पता न था " केशव कहता जा रहा था और मुन्नाबाबू बिना कुछ बोले एक टक सुने जा रहे थे ।

" स्पंज नामक प्राणी के बारे में तो सुना होगा आपने? बताइये आपके ग्रन्थकार वैज्ञानिक अपने किस चतुष्टय वर्ग में रख गएँ है इसे ? केशव ने सवाल किया मुन्नाबाबू से ।

मुन्नाबाबू जैसे हड़बड़ा के नींद से जागे हों , वह लगभग अटकते हुए बोले-
"आं.... वो... बो..." इतना कह चुप हो गएँ।


केशव आगे बढ़ गया ..... इस बार मुन्नाबाबू ने आवाज नही लगाई ।


Wednesday, 29 March 2017

तंत्रवाद और सिंधु सभ्यता-

 नवरात्रों का मूल है दुर्गा पूजा ,दुर्गा  पूजा का संबंध तंत्रवाद से रहा  है या यूँ कहें कि दुर्गा पूजा तंत्रवाद का ही हिस्सा है तो गलत नहीं होगा ।बंगाल में दुर्गा पूजा पर तांत्रिक क्रियाएं प्रसिद्ध हैं, शाक्त मत जिसकी आराध्य देवियां है वह मूलरूप से तंत्रवाद ही है।

दुर्गा का ही एक प्रसिद्ध रूप है शाकम्भरी देवी, शाकम्भरी का अर्थ है ' शाक सब्जी अथवा जड़ी बूटी पैदा करने वाली या शाक सब्जियों और जड़ी बूटियों का पोषण करने वाली' ।

स्वयं शाकम्भरी देवी भी मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य ( सर्ग-81 -93) में यह कहती हैं कि ' हे देवतो ,इसके बाद मैं जीवनपोषक साग सब्जियों के साथ सारे विश्व का पालन पोषण करुँगी ।साग सब्जी भारी वर्षा के दिनों में मेरे अपने शरीर से उत्पन्न होंगे तब मैं पृथ्वी पर शाकम्भरी के नाम से प्रसिद्ध होंगी '।

मार्कण्डेय पुराण में शाकम्भरी देवी का कथन कोई नई धारणा नहीं है बल्कि यह मान्यता अति प्राचीन  उस मान्यता को ही दोहराना था जिसमे पृथ्वी को माता कहा गया है । हम जानते हैं कि तंत्रवाद मातृसत्तामक (स्त्री पक्ष) की देन है जिसमे पुरुष लगभग नगण्य रहता है और स्त्री मुख्य केंद्र रहती है ।

वाम का अर्थ स्त्री भी होता है और वाममार्ग बिना तंत्रवाद के पूर्ण नहीं ।

पिछले लेख में मैंने चित्र सहित बताया था की हड़प्पा के उत्खनन से एक आयातकार मुद्रा  प्राप्त हुई है जिसपर एक नग्न स्त्री का चित्र है जो उल्टा बनाया गया है ।उसकी दोनों टांगे खुली हुई है और उसके गर्भ से एक पौधा निकल रहा है ।उस मुद्रा के ऊपर 6अक्षर बने हुए है जिसे अभी पढ़ा नहीं जा सका है किंतु संभवतः शाकम्भरी नाम पर कुछ प्रकाश डालते हैं।

तन धातु में स्त्रन प्रत्यय लगने से तंत्र शब्द बना है ,तन धातु का अर्थ है विस्तार करना या फैलाना ।
मूलतः  वंश का विस्तार या संतानों की वृद्धि   ही तंत्रवाद है।

देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय जी ने मोनियर विलियम्स का हवाला देके यह सिद्ध किया है कि हरिवंश पुराण और भागवत पुराण में तंत्र शब्द का प्रयोग ' संतानोत्पत्ति 'के अर्थ में किया गया है । यह बात आप  साधा।रण भाषा के संतान या तनय के अर्थ से भी जान सकते हैं।

तंत्रवाद के कुछ ठोस और भौतिक अवशेष सिंधु सभ्यता से प्राप्त हुए हैं ,जैसे शाकम्भरी की मुद्रा, स्त्री देवियों की मूर्तियां आदि। मार्शल तथा  प्राणनाथ जैसे वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि वास्तव के बहुत से आधार हैं कि सिंधु सभ्यता की अधिकांश कला और चित्रलिपि का तांत्रिक वस्तुओं के साथ गहरा संबंध है। सिंधु घाटी सभ्यता की संपत्ति पृथ्वी के उत्पादनों पर आधारित थी ,इसलिए स्वभाविक है कि कृषि चरण के विश्वास तंत्रवाद के रूप में विद्यमान रहे होंगे और धार्मिक क्रियाएं( जादू टोने द्वारा उत्पादकता में वृद्धि की मान्यता)  स्त्री द्वारा सम्पन्न होते रहे होंगे ।।हम इसका सबूत सिंधु मुद्रा में छपी उस चित्र में देखते हैं जंहा वृक्ष देवी ( शाकम्बरी) को प्रसन्न करने के लिए बकरे की बलि दी जा रही है और इस क्रिया को करवाने के लिए सात पूजारने नियुक्त हैं।

स्त्री का रजस्वला होना उत्पादकता की निशानी है अतः तांत्रिक क्रियाओं में रजस्वला का विशेष महत्व है/ था। हड़प्पा में स्त्री मूर्तियां मिली है जो लाल रंग से पुती हुई थी, लाल रंग रक्त अर्थात रजस्वला या उत्पादकता का प्रतीक । आज भी कई भील जातियां अपने खेतों में बीज बोने से पहले कोने में सिंदूर से रंगा हुआ पत्थर रख देते हैं ताकि उत्पादन अच्छा हो।सिंदूर प्रतीकात्मक होता है स्त्री के मासिक धर्म का अतः स्त्री का मासिक धर्म तंत्रवाद में पवित्र माना गया है।

किन्तु, जब पितृसत्तामक(वैदिक) समाज में स्त्री के हाथ से धार्मिक कार्य का नियंत्रण निकल गया तो उसके प्रति विरोधी पक्ष भी तैयार कर लिया गया । रजस्वला स्त्री अपवित्र घोषित कर दी गई , तंत्रवाद को अपमान की नजर से देखा जाने लगा।